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केरल से शुरू हुई कम्युनिस्टों की सरकार, यहीं खत्म हो गई, भारत में कैसे बेमानी हो गए कार्ल मार्क्स?

कार्ल मार्क्स के सिद्धांतों वाली कम्युनिस्ट दलों की पहली सरकार 1957 में केरल में बनी थी. आज के नतीजों से भारत में कम्युनिस्टों की कोई सरकार नहीं बची. भारत में कार्ल मार्क्स का प्रभाव वैसा बिल्कुल नहीं है जैसा कभी हुआ करता था. इसके पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण माने जाते हैं. यहां का समाज केवल अमीर बनाम गरीब के आधार पर नहीं चलता. देश में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति प्रभावशाली रही, इसलिए शुद्ध मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष का मॉडल पूरी तरह फिट नहीं बैठा.

केरल से शुरू हुई कम्युनिस्टों की सरकार, यहीं खत्म हो गई, भारत में कैसे बेमानी हो गए कार्ल मार्क्स?
केरल से शुरू हुई कम्युनिस्टों की सरकार, यहीं खत्म हो गई, भारत में कैसे बेमानी हो गए कार्ल मार्क्स?

कई लोगों का मानना है कि भारतीय कम्युनिस्ट दल बदलती अर्थव्यवस्था और नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के अनुसार खुद को तेजी से नहीं बदल पाए. पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में लंबे वाम शासन के बाद हुए सत्ता परिवर्तन ने यह साफतौर पर साबित किया कि वामपंथ का जनाधार किस कदर घटा है. अब केरल के मतगणना आंकड़ों का हाल सबके सामने है.

कार्ल मार्क्स और फ़्रेडेरिक एंगेल्स का कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो भले 1848 में आया हो लेकिन पहली कम्युनिस्ट राजनीतिक व्यवस्था क़ायम हुई रूस में. सात नवंबर 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने रूस की झाड़शाही को उखाड़ फेका और कम्युनिस्ट सत्ता में आए. रूसी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव व्लादीमीर इलियच लेनिन के नेतृत्व में सरकार बनी. अंतिम ज़ार शासक निकोलस द्वितीय को गद्दी से उतार दिया गया. लेकिन रूसी क्रांति किसान-मज़दूरों की क्रांति कम बुद्धिजीवियों द्वारा की गई क्रांति अधिक थी. जिसमें रोल प्रचार का था.

रूस में सत्ता परिवर्तन के बाद लेनिन ने कथित तौर पर युद्धों के प्रति तटस्थ रहने का फ़ैसला किया मगर व्यवहार में रूसी शासन ने पूरे पूर्वी यूरोप को अपने अधीन कर लिया. आख़िरकार 30 मार्च 1922 को रूस, यूक्रेन, बेलारूस और ट्रांसकाकेशियन देशों का एक साझा मंच बना, जिसे सोवियत संघ कहा गया. यह 15 देशों के इस संघ को USSR कहा गया.

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कार्ल मार्क्स.

70 साल में ही ख़त्म हो गई रूस की क्रांति

इन सब देशों की संस्कृति साझा नहीं था और न ही रूसी कम्युनिस्ट पार्टी उस समय की दुनिया के संबंधों से ख़ुद को अलग कर पाई. अमेरिकी नीतियों के साथ भीषण विरोध के बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध में रूस (सोवियत संघ) की पूरी भागीदारी थी. नतीजा यह हुआ कि शीत युद्ध के समय रूस (USSR) का सारा जोर हथियार बनाने उनका संग्रह करने और उन्हें बेचने पर रहा.

सोवियत संघ सामरिक रूप से तो अमेरिका का प्रतिद्वंदी रहा किंतु आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह नाकाम रहा. उधर अमेरिका उसे कूटनीति में उलझाये रहा. सोवियत कूटनीति की सबसे बड़ी नाकामी अफ़ग़ानिस्तान में रही. मध्य एशिया में उसकी नीति सदैव विफल रही. अंततः 1991 आते-आते सोवियत संघ बिखर गया. कम्युनिस्टों का यह देश 70 साल की उम्र भी पूरी नहीं कर सका. जब सोवियत संघ टूटा तब वह दाने-दाने को मोहताज था.

चीन का ज़ोर उत्पादन और व्यापार पर

इसके विपरीत चीन को पूंजीवाद से आज़ादी एक अक्तूबर 1949 में मिली. माओत्सेतुंग के नेतृत्व में चीन ने सर्वहारा क्रांति की और इस तारीख़ को पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (PRC) की घोषणा हुई. लेकिन चीन ने सोवियत संघ से सबक़ लिया. उसने चीन में हथियार जुटाने के कार्यक्रम चलाने की बजाय छोटी-छोटी चीज़ों से ले कर हैवी मशीनरी तक बनाने में स्वावलंबन पर जोर दिया. इसी का नतीजा है कि चीन आज हर वस्तु का उत्पादन कर रहा है और उसने पूंजीवादी देशों को अपना बाज़ार बना लिया. उसने पहले तो अपने देश की बढ़ती आबादी को क़ाबू किया, और उत्पादन पर कारगर काम किया.

चीन ने मार्क्स से उलट साम्यवादी सोच को अपनाया.

जब सोवियत संघ के विघटन के बाद दुनिया भर की बड़ी कंपनियों ने सस्ते मज़दूरों की खोज के लिए तीसरी दुनिया में विनिवेश शुरू किया तब चीन ने इन कंपनियों के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध कराया. उसने इन कंपनियों के उत्पाद के लिए सहायक सामग्री भी बनाई.

सस्ते उत्पादों का बाज़ार है चीन

नतीजा आज अमेरिकी कंपनी का उत्पाद हो या जर्मनी, फ़्रांस अथवा UK का, उसकी असेम्बलिंग का काम चीन में होता है. इसके अतिरिक्त उसने अपने युवाओं को USA, UK आदि उन्नत देशों के विश्व विद्यालयों में पढ़ाई के लिए भेजा और फिर वापस बुला लिया. इन युवाओं के तकनीकी ज्ञान का लाभ चीन को मिला. यही कारण है कि आज AI के जमाने में रोबोट से ले कर हर जीवनोपयोगी वस्तु का उत्पादन चीन कर रहा है. उसके उत्पाद सस्ते हैं और इसी के बूते विश्व के उन्नत देश भी उपभोक्ता वस्तुएं चीन से आयात करते हैं.

चीन का कम्युनिज्म भले ही मार्क्स की समानता की व्याख्या से भिन्न हो लेकिन लोक कल्याण की भावना तो है. असमानता चीन के समाज में बहुत अधिक है, भ्रष्टाचार भी है लेकिन उत्पादन की प्रचुरता के चलते वहां लोगों को नौकरियां मिली हुई हैं. इसलिए चीन का कम्युनिस्ट शासन स्थायी बना हुआ है.

चीन व्यापार के मामले में पूंजीवादी देशों के समक्ष चुनौती बना हुआ है.

चीन ने मार्क्स से उलट अपना साम्यवादी दर्शन दिया

आज समृद्धि में वह अमेरिका को टक्कर दे रहा है. तकनीक और इंफ़्रास्ट्रक्चर में भी. अमेरिका को व्यापार में किसी से ख़तरा है तो चीन से. इस तरह कम्युनिस्ट चीन व्यापार के मामले में पूंजीवादी देशों के समक्ष चुनौती बना हुआ है. उसके पास रूस और अमेरिका के मुक़ाबले परमाणु बम कम हैं पर हथियार अब वह भी बना रहा है तथा उसके पास निर्यात के लिए बाज़ार भी उपलब्ध है.

रूस का विश्व को कम्युनिस्ट बनाने का अभियान फुस्स हो गया, वह आर्थिक रूप से टूट गया है. यह बात अलग है रूस का कम्युनिस्ट एलीट खूब धनवान है परंतु अपनी जनता को वह न जॉब उपलब्ध करवा पा रहा है न उनको उनकी ज़रूरतों के मुताबिक़ चीज़ें. इस मौलिक अंतर की वजह है रूस की क्रांति के पीछे वह बौद्धिक वर्ग था, जो अपने कमरों में बैठ कर साम्यवाद के हसीन सपने देख रहा था. जबकि चीन में माओत्सेतुंग ने किसान-मज़दूरों को इकट्ठा कर छापामार लड़ाई लड़ी थी.

कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो ने सब कुछ उलट-पुलट दिया

लेकिन हमें कम्युनिज्म के इतिहास को भी देखना चाहिए. वर्ष 1848 में एक ऐसे दर्शन की स्थापना की गई जिसने उसके पूर्व के हज़ारों वर्षों के इतिहास, साहित्य और दर्शन को उलट दिया. जन कल्याणकारी राज्य की प्लेटो की दीक्षा का नया रूप सामने रखा. मानव जीवन के इतिहास में राज्य की यह पहली और अभिजात्य तथा दास वर्ग आदि सबको चौकने वाली घटना थी. फ़्रेंच दार्शनिक कार्ल मार्क्स और जर्मन चिंतक तथा पूंजीपति फ़्रेडेरिक एंगेल्स ने द कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो जारी किया.

इस मैनिफ़ेस्टो ने मानव जीवन के इतिहास में एक ऐसे राज्य की कल्पना की, जिसमें अभिजात्य (एलीट और स्लेवरी) सब समान होंगे. सबके अधिकार समान होंगे और संपत्ति का भी समान बंटवारा होगा. राज्य अपनी शक्ति के बूते यह समानता लाएगा. यह एक चमत्कारी घोषणापत्र था और इसके पहले कभी भी इस तरह की समानता की कल्पना तक नहीं हुई थी. वर्ग संघर्ष के इस सिद्धांत को ला कर कार्ल मार्क्स और फ़्रेडेरिक एंगेल्स ने दुनिया को बदल दिया.

वर्ग संघर्ष की अवधारणा

यह दर्शन इतना अधिक आकर्षक था कि देखते ही देखते यूरोप, अमेरिका, अफ़्रीका और एशिया के तख़्तनशीं बादशाहों, सम्राटों और महाराजाओं के सिंहासन हिलने लगे. अभी तक समाज के भीतर विभिन्न वर्गों के अस्तित्त्व को तो स्वीकार किया गया था लेकिन उनके अंदर लगातार चल रहे द्वन्द को नहीं. इस संघर्ष की धार को तेज कर निजी संपत्ति के उन्मूलन और एक वर्गहीन, राज्यहीन समाज की स्थापना का लक्ष्य काल्पनिक प्रतीत होता था. परंतु 19 वीं सदी के मध्य में एलीट (शासक वर्ग) और स्लेवरी (दास या मज़दूर-किसान) के बीच एक दूरी बन रही थी.

समानता के सिद्धांत का अंकुर तो फ़्रेंच राज्य क्रांति (1789) के साथ ही फूटने लगा था. फ़्रांस के निरंकुश राजा लुई 16 वें के अत्याचारों से क्षुब्ध आम जनता ने समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे की नींव रखी थी. फ़्रांस की यह राज्य क्रांति 1789 से 1799 तक चली.

केरल में लेफ्ट गठबंधन 35 सीटों तक सिमट गया है.

शुरुआत फ़्रांस की राज्य क्रांति से

उथल-पुथल के इसी दौर में लुई वंश का शासन तो समाप्त हो गया किंतु मौक़े का लाभ उठा कर 17 मई 1804 में नेपोलियन बोनापार्ट का तानाशाही का दौर शुरू हुआ. वह 6 अप्रैल 1814 तक फ़्रांस का सम्राट रहा. इसके बाद 20 मार्च 1815 से 22 जून 1815 तक वह पुनः फ़्रांस का सम्राट रहा. इस दौर में उसने अपना साम्राज्य बढ़ाया भी और कुछ हिस्सा अमेरिका को बेचा भी. रूस से युद्ध करने की गलती कर वह अपना साम्राज्य गंवा बैठा. इटैलियन मूल का नेपोलियन 19 वीं सदी के बड़े प्रतापी शासकों में रहा. नेपोलियन के पतन के साथ ही सम्राटों का युग समाप्त होने लगा और यूरोप में गणतंत्र व्यवस्था पनपने लगी. अमेरिका में तो 18 वीं सदी के उत्तरार्ध में ही गणतंत्र क़ायम हो गया और जन प्रतिनिधि चुने जाने लगे थे. वहां तो नाम का भी कोई राजा, बादशाह या सम्राट नहीं था. ब्रिटेन में पार्लियामेंट तो आ गई थी लेकिन निर्वाचित प्रधानमंत्री राजा से हर आदेश की सहमति लेता था.

औद्योगिक क्रांति के बाद की व्यवस्था

इस तरह के गणतंत्र और गणराज्यों में एलीट प्रत्यक्ष तौर पर तो शासन नहीं कर रहा था परंतु उसके पास अचल संपत्ति थी. कृषि योग्य ज़मीनें थीं. इस एलीट को चुनौती देने के लिए नया पूंजीपति वर्ग उभर रहा था. इस पूंजीपति की सोच में पूंजी का संग्रह कर अचल संपत्ति ख़रीदना नहीं बल्कि पूंजी को बाज़ार में लगा कर मुनाफ़ा कमाना और पुनः पूंजी को बाज़ार में लगा देना था. इस वर्ग का मक़सद पूंजी पर अधिकार जमाये रखना था.

उत्पादन के साधन बदल रहे थे. अब व्यापार की वृद्धि के लिए बाज़ार तलाशे जा रहे थे. पूंजीपति शासक को ख़रीद रहा था ताकि शासन में भले वह प्रत्यक्ष तौर पर हिस्सा नहीं ले किंतु शासन चले उसके व्यापार के अनुकूल ही. दुनिया भर में औद्योगिक रूप से पिछड़े देशों पर यह नया पूंजीपति वर्ग क़ब्ज़ा कर रहा था. उसे उत्पादन के लिए सस्ते और ज़रख़रीद मज़दूर चाहिए थे. कच्चा माल चाहिए था. इसने कृषि प्रधान देशों को अन्न उपजाने की बजाय व्यापार के अनुकूल फसलें उगाने पर ज़ोर दिया. ज़बरदस्ती इंडिगो (नील) और कॉटन (कपास) की फसलें उगवाना शुरू किया. यह कॉंट्रैक्ट फ़ार्मिंग की शुरुआत थी.

कार्ल मार्क्स ने पढ़ाई क़ानून की लेकिन राजनीतिक रूप से वे बहुत सजग थे.

कार्ल मार्क्स त्राता बन कर आए

इस तरह की फ़ार्मिंग में किसान अपनी मर्ज़ी और अपनी ज़रूरतों के अनुरूप फसल नहीं उगा सकता था. बल्कि वह वही फसलें उगाता जिनकी व्यापार में ज़रूरत हो. इस वजह से पूरी दुनिया में त्राहि-त्राहि मच गई. किसान भूमिहीन होने लगे. अन्न की कमी हो गई. अकाल और भुखमरी तथा छूत की बीमारियों से लोग मरने लगे. इस तरह उद्योगों को सस्ते मज़दूर मिले. किंतु हर शोषण के विरुद्ध आवाज़ भी उठती है.

इन पूंजीपति देशों द्वारा शासित देशों में विद्रोह होने लगे. इसी का नतीजा था कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो. इसे तैयार करने वाले दार्शनिक कार्ल मार्क्स का आज जन्म दिन है. पांच मई 1818 को जन्मे कार्ल मार्क्स ने इस विद्रोह में चेतना पैदा की और इसकी व्याख्या की. इसी की अभिव्यक्ति कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो है. जर्मनी के राइन प्रांत स्थित ट्रियर एक यहूदी परिवार में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. इनके जन्म के छह वर्ष बाद इनका परिवार ईसाई बन गया.

क़ानून की पढ़ाई और साम्यवाद का दर्शन

कार्ल मार्क्स ने पढ़ाई क़ानून की लेकिन राजनीतिक रूप से वे बहुत सजग थे. दुनिया भर में उस समय जिस तरह से उपनिवेश बन रहे थे, उन देशों के समाज का अध्ययन उन्होंने किया और असंतोष को समझा. ख़ासकर भारत के संदर्भ में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के अत्याचारों का खुलासा भी किया. 1857 में हुए भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का उन्होंने गहराई से अध्ययन किया. इस आंदोलन पर उन्होंने लेख भी लिखे और सटीक सवाल भी उठाए थे. उनका साथ एक पूंजीपति फ़्रेडेरिक एंगेल्स ने दिया. उनके कम्युनिज्म के सिद्धांतों पर अमल रूस और चीन ने किया. दुनिया भर में कम्युनिस्ट आंदोलन शुरू हुए और कम्युनिस्ट पार्टियों का गठन हुआ. यह दिलचस्प है कि किसी पूंजीवादी गणतंत्र में चुनी हुई सरकार 1957 में एक भारतीय राज्य केरल में बनी. इसके बाद किसी न किसी भारतीय राज्य में कम्युनिस्ट सरकार रही. लेकिन 4 मई 2026 को भारत से कम्युनिस्ट सरकारों का सफ़ाया हो गया.

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