Kerala Varma Pazhassi Raja: भारतीय स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में जब भी पहले क्रांतिकारी योद्धाओं की बात आती है, तो 1857 के विद्रोह से भी दशकों पहले दक्षिण भारत के जंगलों से एक गर्जना सुनाई दी थी. यह गर्जना थी ‘केरल के शेर’ (Lion of Kerala) कहे जाने वाले केरल वर्मा पझस्सी राजा की. पझस्सी राजा एक ऐसे अद्वितीय योद्धा थे जिन्होंने अपने जीवनकाल में हैदर अली, टीपू सुल्तान और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी जैसे तीन सबसे शक्तिशाली दुश्मनों को धूल चटाई. उन्हें ‘कोटिओट राजा’ और ‘पायची राजा’ के नाम से भी जाना जाता है.

पझस्सी राजा का जन्म 3 जनवरी, 1753 को मालाबार (Keralam) की हरी-भरी पहाड़ियों में हुआ था. कोट्टायम राजवंश के इस राजकुमार का बचपन इन्हीं जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों के बीच बीता. उन्हें वायनाड के इलाके की इतनी गहरी समझ थी कि वह दुश्मन को उन जंगलों में भूलभुलैया की तरह फंसा सकते थे. यही कारण था कि उन्होंने अपने लोगों को लामबंद किया और पहले मैसूर साम्राज्य और बाद में अंग्रेजों के खिलाफ एक ऐसी छापामार (Guerilla) जंग छेड़ी, जिसका जवाब उस समय की सबसे आधुनिक सेनाओं के पास भी नहीं था.
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पझस्सी राजा के संघर्ष को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है:
- हैदर अली के खिलाफ (17731782)
- टीपू सुल्तान के खिलाफ (17841793)
- अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम संघर्ष (17931805)
मैसूर के साथ पहला संघर्ष: हैदर अली की चुनौती
1766 में हैदर अली ने मालाबार पर आक्रमण किया. हैदर ने कोझिकोड के जमोरिन को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और कर लगाने शुरू किए. जब मैसूर की सेना पझस्सी के क्षेत्र में बढ़ी, तो उन्होंने सीधे युद्ध के बजाय घात लगाकर हमला करने की रणनीति अपनाई. जल्द ही पझस्सी की वीरता के किस्से पूरे कोट्टायम साम्राज्य में फैल गए.
हालांकि, उनकी बढ़ती लोकप्रियता से उनके अपने चाचा वीरा वर्मा ईर्ष्या करने लगे. वीरा वर्मा की सत्ता लोलुपता ने पझस्सी के खिलाफ कई षडयंत्र रचे, जिससे घर के भीतर ही एक बड़ी दुश्मन की दीवार खड़ी हो गई. हैदर अली ने भी इसका फायदा उठाया और चिराक्कल के राजा के साथ मिलकर पझस्सी को कुचलने के लिए ट्रिपल एलायंस बनाया.
रणनीतिक चातुर्य और थलसेरी का घेरा
पझस्सी राजा जानते थे कि अंग्रेजों के लिए थलसेरी (Thalassery) का बंदरगाह कितना महत्वपूर्ण है. यह अंग्रेजों के लिए हथियारों और व्यापार का केंद्र था. हैदर अली ने थलसेरी की आर्थिक नाकाबंदी कर दी. इस मौके पर पझस्सी राजा ने अंग्रेजों के साथ गठबंधन किया और मैसूर की सेना पर पीछे से हमला कर दिया. 1780 में पझस्सी और अंग्रेजों की संयुक्त सेना ने सरदार खान (मैसूर के जनरल) को पराजित किया. यह पझस्सी की एक बड़ी कूटनीतिक और सैन्य जीत थी.
टीपू सुल्तान और पझस्सी की बगावत
1784 में मैंगलोर की संधि के बाद अंग्रेजों ने मालाबार को टीपू सुल्तान को सौंप दिया. पझस्सी राजा इस विश्वासघात से क्रोधित थे. उनके भाई रवि वर्मा ने टीपू को भारी कर देना स्वीकार कर लिया और वायनाड भी उसे सौंप दिया. पझस्सी ने अपने ही भाई और टीपू के खिलाफ विद्रोह कर दिया.
करीब सात वर्षों तक पझस्सी के छापामारों ने वायनाड की पहाड़ियों में टीपू की सेना को चैन से बैठने नहीं दिया. टीपू ने फ्रांसीसी जनरल लाली के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी, लेकिन दक्कन के युद्धों में व्यस्त होने के कारण टीपू को अपनी सेना हटानी पड़ी. पझस्सी ने इसका फायदा उठाकर कतिरूर और कुट्टियाडी किले को फिर से जीत लिया.
अंग्रेजों के खिलाफ अंतिम युद्ध: कोटिओट वॉर (1793-1805)
1792 में श्रीरंगपट्टनम की संधि के बाद मालाबार अंग्रेजों के हाथ में आ गया. अंग्रेजों ने दमनकारी कर व्यवस्था लागू की. पझस्सी के चाचा वीरा वर्मा ने अंग्रेजों के साथ मिलकर एक अपमानजनक संधि की, जिसके तहत कोट्टायम के शासकों को केवल अंग्रेजों का एजेंट बना दिया गया.
पझस्सी राजा ने इसे गुलामी माना और बगावत कर दी. उन्होंने कोट्टायम में कर वसूली रोक दी और अंग्रेजों को चेतावनी दी कि वे उनके काली मिर्च के बागानों को नष्ट कर देंगे. अंग्रेजों ने पझस्सी के महल को लूट लिया, जिसके बाद वह जंगलों में चले गए और वहां से कोटिओट युद्ध (Cotiote War) की शुरुआत की.
अंतिम समय और महान बलिदान
1797 में अंग्रेजों को पझस्सी से शांति समझौता करना पड़ा, लेकिन यह अल्पकालिक था. जब सर आर्थर वैलेजली (जो बाद में नेपोलियन को हराने वाले ड्यूक ऑफ वेलिंगटन बने) मालाबार के कमांडर बने, तो उन्होंने पझस्सी को पकड़ने के लिए सड़कों और चौकियों का निर्माण कराया. 1803 तक पझस्सी की सेना कन्नूर और थलसेरी तक फैल चुकी थी. वैलेजली को तीन साल की नाकामयाबी के बाद वापस लौटना पड़ा.
पझस्सी को पकड़ने के लिए अंग्रेजों ने 3000 पगोडा का इनाम रखा. अंततः एक स्थानीय गद्दार की मुखबिरी के कारण अंग्रेजों को उनकी गुप्त लोकेशन मिल गई. 30 नवंबर, 1805 को कर्नाटक सीमा के पास मविला टोड नामक धारा के किनारे ब्रिटिश सेना ने उन्हें घेर लिया. एक भीषण मुठभेड़ के बाद, भारत माता का यह महान सपूत वीरगति को प्राप्त हुआ. पझस्सी राजा का बलिदान व्यर्थ नहीं गया. उन्होंने यह साबित कर दिया कि यदि संकल्प दृढ़ हो, तो दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को भी घुटनों पर लाया जा सकता है.





