नई दिल्ली: देश में चुनावों को लेकर कुछ दशकों से जो तमाशा देखने को मिल रहा है कि पूछिए मत। कभी EVM पर रार तो कभी SIR पर तकरार। और मामला शीर्ष अदालत तक पहुंचता है। आज सत्ता का सुख भोग रही बीजेपी ने भी कभी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को संदेह से देखा था। फिलहाल चुनावी प्रक्रिया को लेकर जो सबसे ज्यादा विवाद था वह था … SIR यानि कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का, जिससे जुड़े विवादों के महाभारत का आज सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने अंत कर दिया है।

यह कहना सही होगा कि देश की राजनीति और चुनावी व्यवस्था से जुड़े सबसे अहम मामलों में से एक, SIR पर सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। यह मामला बिहार और पश्चिम बंगाल में कराए गए SIR अभियान को लेकर दाखिल याचिकाओं से जुड़ा था। इस लीगल स्टोरी के जरिए आपकी सुविधा के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मुख्य प्वाइंट के जरिए समझाया है…
SIR पूरी तरह कानूनी है और चुनाव आयोग को क्लीन चिट मिली
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग के पास संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून Representation of People Act के अनुसार वोटर लिस्ट का विशेष पुनरीक्षण करने का अधिकार है। अदालत ने कहा कि SIR किसी भी नजरिए से कानून के खिलाफ नहीं है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए किसी प्रक्रिया को अवैध नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह सामान्य प्रक्रिया से अलग है। अदालत के मुताबिक, चुनाव आयोग ने पूरी तरह अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल किया है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को भी क्लीन चिट दे दी है।
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लोकतंत्र में नई जान फूंकने के लिए SIR है जरूरी
कह सकता हूं कि शीर्ष अदालत के इस फैसले की सबसे चर्चित टिप्पणी रही, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि SIR “लोकतांत्रिक प्रक्रिया में नई जान फूंकता है”। अदालत ने माना कि अगर वोटर लिस्ट में फर्जी, मृत या डुप्लीकेट नाम बने रहते हैं तो फिर निष्पक्ष चुनाव कैसे हो सकते हैं। लोकतंत्र मुर्दों को तंत्र नहीं हा। ऐसे में निष्पक्ष चुनावी प्रक्रिया प्रभावित हो सकती हैं। कोर्ट ने कहा कि साफ और बिल्कुल सटीक वोटरों की सूची ही लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। इसलिए चुनाव आयोग द्वारा की गई यह कवायद, जायज है , संविधान की मूल भावना के अनुरूप है, स्वस्थ लोक तंत्र के लिए उचित है।
चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता, लेकिन सत्यापन कर सकता है
याचिकाकर्ताओं की सबसे बड़ी दलील थी कि SIR के जरिए चुनाव आयोग अप्रत्यक्ष रूप से नागरिकता जांच रहा है, जबकि यह अधिकार केंद्र सरकार या सक्षम न्यायिक संस्थाओं के पास है। सुप्रीम कोर्ट इस दलील को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता का अंतिम फैसला नहीं कर सकता, लेकिन वोटर लिस्ट की शुद्धता बनाए रखने के लिए दस्तावेजों का सत्यापन जरूर कर सकता है। कोर्ट ने माना कि यह प्रक्रिया चुनावी पारदर्शिता के लिए जरूरी है और इसे “नागरिकता ट्रायल” नहीं माना जा सकता।
असंवैधानिक नहीं है SIR , इसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि SIR प्रक्रिया मनमानी नहीं है। अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है तो उसे आपत्ति दर्ज कराने और अपील करने का अधिकार है। इस बिंदु को हाई लाईट करते हुए अदालत ने माना कि प्रक्रिया में पारदर्शिता और शिकायत निवारण की व्यवस्था होने के कारण इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को निष्पक्ष तरीके से प्रक्रिया लागू करनी होगी ताकि किसी भी नागरिक के अधिकारों का हनन न हो।





