कांग्रेस नेता राहुल गांधी का सियासी अंदाज अब तेजी से बदलता दिख रहा है. लंबे समय से आलोचक उन पर यह सवाल उठते रहे हैं कि क्या वे पार्टी के भीतर बड़े और मुश्किल फैसले लेने का साहस रखते हैं. लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में तमिलनाडु, केरल और अब कर्नाटक में जिस तरह के फैसले सामने आए हैं, उससे पार्टी के अंदर यह धारणा मजबूत हो रही है कि राहुल गांधी अब पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक, व्यावहारिक और निर्णायक भूमिका में नजर आ रहे हैं.

कांग्रेस के अंदर माना जा रहा है कि दक्षिण भारत को बचाए रखना राहुल गांधी की सबसे बड़ी राजनीतिक प्राथमिकता बन चुका है. फिलहाल कांग्रेस दक्षिण के पांच राज्यों में से चार में या तो सत्ता में है या गठबंधन सरकार का हिस्सा है. ऐसे में बीजेपी के खिलाफ दक्षिण भारत कांग्रेस का सबसे मजबूत राजनीतिक किला माना जा रहा है. यही वजह है कि 2028 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव और आने वाले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी लगातार ऐसे फैसले ले रहे हैं, जो पार्टी को लंबे समय तक फायदा पहुंचा सकें.
तमिलनाडु में सही निकला राहुल का आंकलन
इस बदलाव का पहला संकेत तमिलनाडु में देखने को मिला. पार्टी सूत्रों के मुताबिक विधानसभा चुनाव से पहले राहुल गांधी चाहते थे कि कांग्रेस केवल डीएमके पर निर्भर रहने के बजाय अभिनेता से राजनेता विजय के साथ किसी समझौते की संभावनाएं तलाशे. पार्टी के कई वरिष्ठ नेता इस सोच से सहमत नहीं थे और उनका मानना था कि डीएमके से दूरी बनाना जोखिम भरा हो सकता है. लेकिन राहुल गांधी का आकलन था कि विजय की राजनीति में एंट्री ने तमिलनाडु का समीकरण बदल दिया है और कांग्रेस को समय रहते खुद को नए हालात के मुताबिक ढालना होगा. आखिरकार विजय को बड़ा जनसमर्थन मिलने के बाद राहुल गांधी की लाइन को पार्टी में गंभीरता से देखा जाने लगा.
इसके बाद दूसरा बड़ा संकेत केरल में मिला. यहां कांग्रेस नेतृत्व ने अनुभवी नेता केसी वेणुगोपाल की तुलना में वीडी सतीशन को भविष्य के मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर ज्यादा महत्व दिया. इसे पार्टी के भीतर पीढ़ीगत बदलाव और संगठनात्मक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है. माना गया कि राहुल गांधी ने दिल्ली की सत्ता राजनीति से ज्यादा राज्य स्तर पर आक्रामक नेतृत्व को प्राथमिकता दी. दिलचस्प बात यह रही कि सतीशन के समर्थन में अपेक्षाकृत कम विधायक थे, लेकिन इसके बावजूद राहुल गांधी की राय भारी पड़ी.
अब सबसे ज्यादा चर्चा कर्नाटक को लेकर हो रही है. माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की जगह भविष्य में डीके शिवकुमार को कमान सौंपे जाने की तैयारी चल रही है. कांग्रेस के अंदर इसे केवल सत्ता संतुलन नहीं, बल्कि 2028 चुनाव की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. सिद्धारमैया अब भी बड़े जनाधार वाले नेता माने जाते हैं और अहिंदा (AHINDA यानी अल्पसंख्यक, पिछड़ा हिन्दू वर्ग और दलित) समीकरण पर उनकी मजबूत पकड़ है, लेकिन पार्टी नेतृत्व सरकार के कार्यकाल के बीच बढ़ती एंटी इनकंबेंसी को लेकर भी सतर्क है.
कांग्रेस रणनीतिकारों का मानना है कि चुनाव से पहले नेतृत्व परिवर्तन सरकार के खिलाफ माहौल को कमजोर कर सकता है और संगठन में नई ऊर्जा भर सकता है. डीके शिवकुमार को संगठन पर मजबूत पकड़ और संसाधन जुटाने की क्षमता के कारण कांग्रेस के लिए बेहद अहम माना जा रहा है. खासकर इसलिए क्योंकि कर्नाटक दक्षिण भारत में बीजेपी का सबसे बड़ा राजनीतिक गढ़ माना जाता है.
राहुल के तेवर के पीछे बड़ा राजनीतिक संदेश
इसके पीछे एक और बड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है. 2023 में राहुल गांधी ने कथित तौर पर डीके शिवकुमार से वादा किया था कि ढाई साल बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. अब पार्टी के अंदर यह चर्चा है कि राहुल गांधी उस वादे को निभाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं, भले ही इसमें कुछ देरी हो रही हो.
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इन तीनों घटनाओं को साथ रखकर देखें तो कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी की कार्यशैली में साफ बदलाव दिखाई देता है. पहले जहां वे अलग-अलग गुटों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करते थे, वहीं अब वे जीत की संभावना और लंबी राजनीतिक रणनीति को ध्यान में रखकर सीधे हस्तक्षेप करने से भी नहीं हिचक रहे.
पार्टी के कई नेता निजी बातचीत में कह रहे हैं कि राहुल गांधी अब ‘अपनी राजनीतिक समझ पर पहले से ज्यादा भरोसा’ करने लगे हैं. ऐसे समय में जब राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस कई चुनौतियों से जूझ रही है, दक्षिण भारत को बचाए रखना राहुल गांधी की राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र बनता जा रहा है. और यही रणनीति आने वाले समय में कांग्रेस की दिशा तय कर सकती है.




