अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का सीधा असर कच्चे तेल (Crude Oil) के बाजार पर पड़ा है. ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक 4 फीसदी का भारी उछाल आया है, जिससे तेल ( Brent Crude) 109 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है. भारतीय कमोडिटी बाजार भी इस वैश्विक झटके से अछूते नहीं रहे हैं. मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज (MCX) पर कच्चे तेल के भाव तेजी से ऊपर की तरफ भागे हैं. मई महीने की डिलीवरी वाले कच्चे तेल के सौदे में करीब 3.59 फीसदी (349 रुपये) की तगड़ी तेजी दर्ज की गई. इस उछाल के बाद भाव 10,073 रुपये प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गया, जिसमें 9,898 लॉट का भारी कारोबार हुआ. जुलाई के कॉन्ट्रैक्ट्स का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा. इसमें 3.68 फीसदी की बढ़त देखी गई, जिसके बाद कीमत 9,694 रुपये प्रति बैरल हो गई.

ग्लोबल मार्केट का हाल बेहाल, उछली कीमतें
अगर हम अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति का आकलन करें, तो वहां भी घबराहट का माहौल साफ नजर आ रहा है. ग्लोबल बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड का जुलाई कॉन्ट्रैक्ट 3.35 फीसदी उछलकर 109.26 डॉलर प्रति बैरल पर जा पहुंचा. वहीं, न्यूयॉर्क में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) का जून डिलीवरी भाव भी करीब 4 फीसदी की छलांग लगाकर 105 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गया. कोटक सिक्योरिटीज की कमोडिटी रिसर्च एवीपी, कायनात चैनवाला के मुताबिक, इस पूरे हफ्ते में क्रूड की कीमतों में 6 फीसदी से ज्यादा की बढ़त देखी गई है. इस बेतहाशा तेजी के पीछे की सबसे बड़ी वजह अमेरिका-ईरान के बीच गहराता विवाद है, जिसने सप्लाई चेन में भारी रुकावटों का डर पैदा कर दिया है.
होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा खतरा
इस पूरे भू-राजनीतिक संकट का मुख्य केंद्र ‘होर्मुज स्ट्रेट’ बना हुआ है. यह दुनिया के सबसे अहम ऑयल ट्रेड रूट्स में से एक माना जाता है. इस इलाके में जहाजों पर हो रहे हमलों, जब्ती की घटनाओं और अमेरिकी नौसेना की नाकेबंदी ने कच्चे तेल की आवाजाही को लगभग सीमित कर दिया है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) ने एक गंभीर चेतावनी दी है कि भले ही आने वाले महीनों में तनाव थोड़ा कम हो जाए, लेकिन अक्टूबर तक बाजार में तेल की भारी किल्लत बनी रह सकती है. ओपेक (OPEC) और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) भी 2026 के मार्केट बैलेंस को लेकर आशंकित हैं. जानकारों का स्पष्ट मानना है कि जब तक होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता पूरी तरह साफ नहीं होता, तब तक क्रूड इन्वेंट्री का सामान्य होना बेहद मुश्किल है.
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आम आदमी की बढ़ी चिंता
वैश्विक स्तर पर हालात को सुधारने की कूटनीतिक कोशिशें भी फिलहाल नाकाम साबित हो रही हैं. शुक्रवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बातचीत हुई थी. बाजार को उम्मीद थी कि इससे ईरान विवाद या ऊर्जा सुरक्षा के मुद्दे पर कोई समाधान निकलेगा, लेकिन यह बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई. विश्लेषकों का कहना है कि जब तक कोई भरोसेमंद शांति समझौता नहीं हो जाता, तब तक क्रूड ऑयल मार्केट में भू-राजनीतिक जोखिम का यह दबाव बना रहेगा. उपभोक्ता के लिए इस पूरी खबर का मतलब यह है कि अगर कच्चा तेल इसी तरह महंगा होता रहा, तो ट्रांसपोर्टेशन की लागत बढ़ेगी. इसका सीधा असर खाद्य पदार्थों, सब्जियों और रोजमर्रा के हर सामान की कीमतों पर पड़ेगा.
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