उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर गठबंधन का दरवाजा खोल दिया है. कानपुर में ओवैसी ने कहा है कि अगर भाजपा को रोकना है तो समान विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ने के लिए उनकी पार्टी तैयार है. ओवैसी ने यह भी संकेत दिया है कि उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर फैसला 2 अक्टूबर तक हो सकता है. हालांकि, अभी तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने ओवैसी के प्रस्ताव में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

इसके पीछे सबसे बड़ा सवाल है कि ओवैसी के साथ अब तक जिन दलों ने चुनावी तालमेल किया, उन्हें क्या हासिल हुआ? अगर आंकड़ों में देखेंगे तो ओवैसी के साथ गठबंधन करने से पार्टियों को नुकसान ही हुआ. बिहार में ओवैसी को फायदा हुआ, लेकिन सहयोगी को नुकसान हुआ. ऐसे ही हर प्रदेश में ऐसा ही पैटर्न देखने को मिलता है. यही वजह कि 2022 के विधानसभा चुनाव में AIMIM के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली पार्टी भी अभी तक अपने पत्ते नहीं खोल रही है.
तेलंगाना में सबसे अलग रहा ओवैसी का गठजोड़
ओवैसी की राजनीति का सबसे मजबूत आधार तेलंगाना रहा है. 2018 के विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम और तत्कालीन तेलंगाना राष्ट्र समिति के बीच औपचारिक सीटबंटवारे वाले गठबंधन के बजाय दोस्ताना तालमेल था. एआईएमआईएम ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा और 7 सीटें जीतीं. दूसरी ओर, पार्टी ने कई अन्य क्षेत्रों में तत्कालीन टीआरएस के उम्मीदवारों का समर्थन किया. हालांकि, TRS को इसका फायदा न मिला और मुस्लिम वोट कांग्रेस के खाते में गए.
महाराष्ट्र में गठबंधन, एआईएमआईएम को एक सीट
महाराष्ट्र में एआईएमआईएम ने प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन आघाड़ी के साथ गठबंधन किया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने एक सीट जीती, जबकि वंचित बहुजन आघाड़ी कोई सीट नहीं जीत सकी. यह चुनावी तालमेल इस लिहाज से महत्वपूर्ण था कि इसमें मुस्लिम और दलित राजनीति को एक साथ लाने की कोशिश दिखाई दी, लेकिन सीटों में इसका फायदा दोनों दलों को समान रूप से नहीं मिला.
बिहार में ओवैसी को फायदा, बाकी को नुकसान
बिहार के 2020 विधानसभा चुनाव में एआईएमआईएम ने उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. इस गठजोड़ में एआईएमआईएम ने 5 सीटें जीतीं, जबकि बसपा को एक सीट मिली और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी अपना खाता नहीं खोल सकी. यह परिणाम ओवैसी की पार्टी के लिए इसलिए अहम था क्योंकि सीमांचल क्षेत्र में एआईएमआईएम ने अपनी मजबूत चुनावी मौजूदगी दर्ज कराई.
उत्तर प्रदेश में तस्वीर बिल्कुल अलग
उत्तर प्रदेश में ओवैसी की पार्टी ने 2022 विधानसभा चुनाव से पहले ओम प्रकाश राजभर के भागीदारी संकल्प मोर्चा के साथ तालमेल किया था, लेकिन चुनाव से पहले ही राजभर समाजवादी पार्टी के साथ चले गए और यह मोर्चा बिखर गया. इसके बाद एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश में अलग से चुनाव लड़ा. एआईएमआईएम ने 2022 में 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली. यानी यूपी में ओवैसी का चुनावी प्रयोग सीट में तब्दील नहीं हो सका.
2024 में बना पीडीएम मोर्चा, लेकिन खाता नहीं खुला
लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में एआईएमआईएम ने पल्लवी पटेल की अपना दल कमेरावादी समेत कई दलों के साथ मिलकर पीडीएम न्याय मोर्चा बनाया. इस गठबंधन का राजनीतिक आधार पिछड़ा, दलित और मुस्लिम सामाजिक समीकरण को एक साथ लाने की कोशिश था, लेकिन लोकसभा चुनाव में इस मोर्चे का कोई उम्मीदवार जीत हासिल नहीं कर सका. यानी यूपी में 2022 की अकेले चुनाव लड़ने की रणनीति हो या 2024 का गठबंधन प्रयोग, दोनों ही सीटों के लिहाज से एआईएमआईएम के लिए सफल नहीं रहे.
अब 2027 में फिर गठबंधन की तलाश
अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले ओवैसी का रुख पहले के मुकाबले कुछ अलग दिखाई दे रहा है. एआईएमआईएम ने उत्तर प्रदेश में चुनावी तैयारी शुरू कर दी है. पार्टी ने पहले करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की संभावना जताई थी, लेकिन ओवैसी ने बाद में कहा कि अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है कि कितनी और किन सीटों पर पार्टी चुनाव लड़ेगी. अब ओवैसी ने फिर गठबंधन की संभावना को खुला रखा है. उनका कहना है कि उनकी पार्टी को गठबंधन में सम्मान और बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए.