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एक्सपायर दवा कचरा नहीं, है एक बड़ा खतरा, कैसे करें सेफ्ली डिस्पोज?​

बीमार हुए तो डॉक्टर ने बताईं तीन दवाएं, जो आप खरीदकर घर ले आए. बीमारी ठीक हुई तो दवा की जरूरत भी खत्म हो गई. लेकिन दोचार गोलियां और आधी बची सिरप की बोतल दराज में रखी रह गई. महीनों बाद घर में सफाई अभियान चलाया तो देखा, दवा तो एक्सपायर हो चुकी है. अब […]

बीमार हुए तो डॉक्टर ने बताईं तीन दवाएं, जो आप खरीदकर घर ले आए. बीमारी ठीक हुई तो दवा की जरूरत भी खत्म हो गई. लेकिन दोचार गोलियां और आधी बची सिरप की बोतल दराज में रखी रह गई. महीनों बाद घर में सफाई अभियान चलाया तो देखा, दवा तो एक्सपायर हो चुकी है. अब क्या करें? ज्यादातर लोग इन्हें सीधे डस्टबिन में डाल देते हैं. लेकिन क्या दवा को बाकी कचरे की तरह सीधे डस्टबिन में फेंक देना सही है? क्योंकि दवा के अवशेष मिट्टी, पानी और एनवायरमेंट तक पहुंच सकते हैं.

इस दवा को सेफ तरीके से फेंका न जाए तो इससे एनवायरमेंट को भी नुकसान पहुंचता है. चलिए आपको बताते हैं इससे जुड़े कई जरूरी आंकड़े और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, जानें…

कितनी दवाइयां बन जाती हैं कचरा?

ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि अलगअलग देशों में घरों में खरीदी गई दवाओं का करीब 3 से 50 फीसदी तक हिस्सा इस्तेमाल नहीं हो पाता. फ्रांस में 2018 में घरों से करीब 17,600 टन इस्तेमाल न हुई या एक्सपायर दवाएं निकली थीं.

शारदा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च के डिपार्टमेंट ऑफ फॉर्माकोलॉजी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में भी हालात अलग नहीं हैं. दिल्लीNCR के 956 लोगों पर हुई एक स्टडी में 73 फीसदी लोगों ने बताया कि वो एक्सपायरी दवाएं कूड़े में ही फेंकते हैं. 93 फीसदी लोगों ने कहा कि घर से ऐसी दवाएं इकट्ठा करने की कोई सरकारी व्यवस्था होनी चाहिए.

कूड़े में फेंकी दवा कहां जाती है?

कूड़े में पहुंची दवा लैंडफिल तक जा सकती है. बारिश और नमी के साथ उसके कुछ अवशेष मिट्टी या पानी में पहुंच सकते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन कहता है कि एक्सपायर्ड और जरूरत न रहने वाली दवाएं फार्मास्यूटिकल वेस्ट का हिस्सा हैं. इन्हें गलत तरीके से फेंकने से हेल्थ और एनवायरमेंट दोनों को नुकसान हो सकता है.

ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. कनिका शर्मा कहती हैं, घर पर पड़ी एक्सपायरी दवाइयों को सीधे कूड़े, नाली या टॉयलेट में डिस्कार्ड नहीं करना चाहिए. ये दवाएं पर्यावरण, मिट्टी या पानी में जाकर हेल्थ से रिलेटेड इश्यूज क्रिएट कर सकती हैं.

सबसे बड़ा असर वॉटर पॉल्यूशन के रूप में सामने आ सकता है. दवाओं के कुछ केमिकल पानी या नदियों में पहुंचने पर परेशानी पैदा कर सकते हैं. इन्हें वाटर ट्रीटमेंट प्लांट से पूरी तरह रिमूव करना भी आसान नहीं होता. इसका असर नदियों, खेतों और पीने के पानी तक पहुंच सकता है.

एंटीबायोटिक का कचरा क्यों ज्यादा चिंता की बात?

खासकर एंटीबायोटिक्स और कुछ दूसरी दवाइयों का कचरा चिंता की बात है. डॉ. कनिका शर्मा बताती हैं कि अगर एंटीबायोटिक्स के अवशेष लगातार इनवायरमेंट में पहुंचते रहें तो बैक्टीरिया ऐसे मैकेनिज्म डेवलप कर सकते हैं, जिनसे दवाइयां उन पर बेअसर होने लगती हैं. इसे एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस कहा जाता है.

दवाओं के संपर्क में आने वाले पेट एनिमल्स और दूसरे जानवरों के लिए भी खतरा हो सकता है. घर में छोटे बच्चे या पेट एनिमल्स हों तो खुले में पड़ी दवाएं उनके लिए भी नुकसानदायक हो सकती हैं.

बची हुई दवा का क्या करें?

हर बची हुई दवा एक्सपायर नहीं होती. कई बार बीमारी ठीक हो जाती है, डॉक्टर दवा बदल देते हैं या इलाज का तरीका बदल जाता है. क्युरियस मेडिकल जर्नल में छपी एक स्टडी के हिसाब से ओडिशा में 385 लोगों पर हुई स्टडी में 82.1 फीसदी लोगों ने बची दवाएं डस्टबिन में डालने की बात कही, जबकि सिर्फ 2.6 फीसदी लोग उन्हें फार्मेसी में वापस करते थे.

डॉ. कनिका शर्मा के मुताबिक आइडियली दवाओं के लिए टेकबैक मैकेनिज्म होना चाहिए. कई जगह, जैसे कुछ हॉस्पिटल्स की फार्मेसी में नियरएक्सपायरी ड्रग्स के लिए सिस्टम अपनाया जाता है. अगर ऐसा कोई ऑप्शन उपलब्ध नहीं है तो दवाओं को सामान्य घरेलू कूड़े में डालते समय उन्हें सेग्रेट करना चाहिए. भारत में दवाएं वापस लेने की व्यवस्था कुछ जगहों पर शुरू भी हुई है. केरल में nPROUD यानी न्यू प्रोग्राम फॉर रिमूवल ऑफ अनयूज्ड ड्रग्स प्रोजेक्ट के तहत घरों से इस्तेमाल न हुई दवाएं इकट्ठा करने और उन्हें डेडिकेटेड प्वाइंट पर सेफली नष्ट करने की व्यवस्था की गई है. कुछ जगहों पर कलेक्शन बॉक्स भी लगाए गए हैं.

भारत में कई कोशिशें ऐसी भी हुई हैं, जहां लोग घरों में बची दवाएं इकट्ठा करके जरूरतमंदों तक पहुंचाने की कोशिश करते रहे हैं. कुछ अस्पताल ड्रॉप बॉक्स लगाते हैं. नोएडा के मेडिसिन बाबा के नाम से फेमस ओमकार नाथ शर्मा भी लोगों से बची दवाएं इकट्ठा करते थे. लेकिन बची हुई हर दवा को दोबारा इस्तेमाल करना सही नहीं है. दवा की एक्सपायरी, उसे कैसे रखा गया था, पैकिंग और किस मरीज को उसकी जरूरत है, ये सब जरूरी है.

सरकार बना रही है गाइडलाइन

मई 2025 में सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन ने एक्सपायर्ड और इस्तेमाल न होने वाली दवाओं को सही तरीके से फेंकने को लेकर स्टेट्स और यूनियन टेरिटरीज के ड्रग कंट्रोलर्स को गाइडलाइन भेजी थी और दवाओं के सेफली डिस्पोज मैनेजमेंट पर जोर दिया था.

पीडियाट्रिक नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. कनव आनंद कहते हैं कि बची या एक्सपायर हो चुकी दवाइयों को सीधे कूड़े में फेंकना इंसानों और पर्यावरण दोनों के लिए खतरा पैदा कर सकता है. कूड़े के ढेर या ठीक से मैनेज न होने वाली लैंडफिल साइट पर ये दवाइयां बच्चों, कूड़ा उठाने वालों, जानवरों या कबाड़ बीनने वालों के हाथ लग सकती हैं. एक्सपायर टैबलेट और सिरप को दोबारा बेचने या गलत इस्तेमाल किए जाने का खतरा भी रहता है.

बारिश का पानी दवाइयों के अवशेषों को मिट्टी, भूजल और आसपास के जल स्रोतों तक पहुंचा सकता है. एंटीबायोटिक्स, हार्मोन, दर्द की दवाइयां, मानसिक बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाइयां और कैंसर की दवाइयां फेंके जाने के बाद भी पूरी तरह निष्क्रिय नहीं होतीं. इनके अवशेष पानी में रहने वाले जीवों को प्रभावित कर सकते हैं.

टॉयलेट में नहीं फेंकनी चाहिए

पुरानी दवाओं को सिंक या टॉयलेट में बहा देने से भी परेशानी खत्म नहीं होती. दवा सीवेज के रास्ते पानी तक पहुंच सकती है. दवाओं को खुले में जलाना भी सुरक्षित नहीं है, क्योंकि धुएं के साथ हार्मफुल केमिकल निकल सकते हैं.

डॉ. कनव आनंद कहते हैं पॉसिबल हो तो बची हुई या एक्सपायर दवाइयों को मेडिसिन टेकबैक या कलेक्शन पॉइंट पर जमा करना चाहिए.ये पॉइंट फार्मेसी, अस्पताल या किसी ऑथराइज्ड लोकल प्रोग्राम में हो सकता है. अगर ऐसा कोई कलेक्शन ऑप्शन नहीं है तो नॉर्मल टैबलेट और कैप्सूल को क्रश किए बिना मिट्टी या इस्तेमाल की हुई कॉफी जैसी ऐसी चीज के साथ मिलाकर जिसे आसानी से दोबारा इस्तेमाल न किया जा सके, सीलबंद बैग या कंटेनर में रखा जा सकता है. दवा की पैकिंग पर लिखी पर्सनल डिटेल भी हटा देना चाहिए.

इन बातों का रखें ध्यान

सुई और सिरिंज को पंक्चरप्रूफ शार्प्स कंटेनर में ही डालना चाहिए. कैंसर की दवाइयां, साइटोटॉक्सिक दवाइयां, इंजेक्शन, ओपिओइड और दूसरी हाईरिस्क दवाइयों को प्रॉपर डिस्पोज कराने के लिए अस्पताल या फार्मेसी में वापस करना ज्यादा सुरक्षित है. यानी अगली बार दराज में बची दवा को कचरा समझकर डस्टबिन में डालने से पहले सोचिएगा जरूर कि दवा खत्म होने के बाद भी उसका असर खत्म नहीं होता.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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