क्या दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स डोनाल्ड ट्रंप को रास्ते से हटाने की कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश रची जा रही है? वॉशिंगटन के हिल्टन होटल में जो हुआ, उसने न केवल अमेरिका के सुरक्षा तंत्र की धज्जियां उड़ा दीं, बल्कि पूरी दुनिया को तीसरे विश्वयुद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है. बटलर और फ्लोरिडा के बाद, यह ट्रंप पर तीसरा और सबसे घातक हमला है.

सवाल गहरा है- इस खेल का मास्टरमाइंड कौन है? क्या ये ईरान का बदला है या फिर अमेरिका के भीतर बैठा वो ‘डीप स्टेट’, जिसके लिए ट्रंप एक ऐसी फांस बन चुके हैं, जिसे निकालना मुमकिन नहीं? आइए जानें, पर हमला, किसी सिरफिरे का अटैक है या बड़ा षड्यंत्र, जिसके पीछे ईरान भी हो सकता है.
अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दुनिया की सबसे ताकतवर शख्सियत, लेकिन कुछ घंटे पहले हिल्टन होटल में जो कुछ हुआ. उससे ना सिर्फ पूरा अमेरिका हिल गया, बल्कि ट्रंप के सबसे ताकतवर होने का दंभ भी टूटता दिखा, क्योंकि हमलावर ना सिर्फ हाई सिक्योरिटी तोड़कर होटल में दाखिल हुआ, बल्कि वो ट्रंप और उनके मंत्रियों के पास तक जा पहुंचा. अगर कमांडो फोर्स एक्शन में नहीं आती तो कुछ भी हो सकता था.
ट्रंप पर हमले का मास्टरमाइंड कौन?
अब सवाल उठ रहा है कि इस हमले के पीछे कौन है? हमला किसने कराया? क्या हमले के पीछे ईरान है या फिर हमले के पीछे डीप स्टेट है. हांलाकि इससे पहले ही डोनाल्ड ट्रंप पर दो बार हमला हो चुका है, जिसमें वो बाल-बाल बचे थे. जिस वक्त हमले के पीछे डीप स्टेट को बताया गया, लेकिन इस बार परिस्थितियां बिल्कुल अलग है.
अमेरिका-ईरान युद्ध से पूरा अरब दहक रहा है. हो सकता है कि इसके पीछे ईरान हो या फिर डीप स्टेट और ईरान में कोई गठठबंधन हो गया हो, जिसके बाद ट्रंप पर हमले का प्लान बनाया गया हो.
जानें कब-कब हुआ ट्रंप पर हमला
- ट्रंप पर पहला हमला 13 जुलाई 2024 में पेंसिल्वेनिया में हुआ था. जब रैली के दौरान ट्रंप के कान को छूकर गोली निकली थी.हमलावर को मार गिराया था.
- दूसरी बार हमला फ्लोरिडा में उनके गोल्फ कोर्स पर हुआ था, जब ट्रंप गोल्फ खेल रहे थे, तभी फायरिंग हुई थी. ट्रंप इसमें बाल-बाल बचे थे.
- अब तीसरा हमला वाशिंगटन के हिल्टटन होटल में हुआ था, जहां ‘व्हाइट हाउस कॉरस्पोंडेंट्स डिनर’ के दौरान एक हमलावर घुस आया था, जिसे ट्रंप के कमांडो ने पकड़ लिया.
हांलाकि इस बार ईरान का नाम भी सामने आ रहा है, क्योंकि कई कनेक्शन ईरान से जुड़ रहे हैं. उसके गठबंधन देशों से जुड़ रहे हैं. सवाल उठ रहा है कि क्या वार्ता रद्द होने का कनेक्शन है या फिर ट्रंप से ईरान युद्ध का बदला लिया जा रहा है, क्योंकि ईरान ये समझ चुका है कि वो आमने-सामने से जंग नहीं जीत सकता है.
हमले के पीछे क्या ईरान का कोई कनेक्शन?
कल वाशिंगटन के होटल में हुए लोन वुल्फ अटैक का ईरान से कोई कनेक्शन हो सकता है, जिस हमले में डोनाल्ड ट्रंप बाल-बाल बचे. ऐसे कई संकेत हैं, क्योंकि इस्लामाबाद में वार्ता रद्द होने के 11 घंटे बाद ये हमला हुआ. हो सकता है कि इससे ईरान बौखला गया हो.
ईरान अभी भी अमेरिका का सीधा मुकाबला नहीं कर सकता. इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं. वो ट्रंप से बदला दूसरे रास्ते से लेना चाहता है, क्योंकि ट्रंप के पहले कार्यकाल में IRGC चीफ सुलेमानी की हत्या हुई थी.
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में ईरान से भीषण युद्ध शुरू हुआ है, जिसमें ईरान को जबरदस्त नुकसान हुआ है. आधे ईरान का खात्मे का दावा अमेरिका कर चुका है. ईरान इसलिए भी बौखला रहा है. अमेरिका ने ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई की हत्या की है. युद्ध के दौरान एय़रस्ट्राइक में खामेनेई को मार गिराया था. इसके अलावा अमेरिका ईरान का यूरेनियम छीनने का प्लान बना रहा है, जिससे ईरान का परमाणु प्रोग्राम रोक सके. इसलिए भी ईरान ट्रंप पर हमला करवा सकता है.
क्या हमले के पीछे ईरान गठबंधन के देश?
ऐसे भी कयास हैं कि हमले के पीछे ईरान गठबंधन के देश शामिल हो सकते हैं. ईरान का मंसूबा है. अगर ट्रंप रास्ते से हट गए तो वो परमाणु हथियार बना पाएगा, जबकि रूस का प्लान है. अगर ट्रंप यूरोप में दखल नहीं देंगे तो यूरोप पर रूस का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा.
चीन की सुपरपावर बनने की चाहत है, जबकि ट्रंप इस पर अंकुश लगाते रहे हैं. नॉर्थ कोरिया के सुप्रीम लीडर किम जोंग भी कोरियाई प्रायद्वीप में दबदबा बनाना चाहते हैं, जबकि ट्रंप साउथ कोरिया का साथ दे रहे हैं.
हांलाकि ईरान के कनेक्शन पर ट्रंप ने खुद इनकार किया है. अब सवाल उठ रहा है कि ईरान नहीं तो फिर कौन? आखिर ट्रंप को रास्ते से हटाकर किसका फायदा हो सकता है. आखिर क्यों ट्रंप का होना उन्हें खटक रहा है?
इस राज से पर्दा उठाने के लिए वाइट हाउस ने जांच एजेंसियों को फरमान जारी कर दिया है, जिससे ये पता लग सकता है कि आखिर ट्रंप की जान कौन लेना चाहता है. ईरान या फिर डीप स्टेट क्योंकि इस वक्त दोनों के लिए ट्रंप एक कांटे की तरह हैं, क्योंकि ईरान युद्ध खत्म करना चाहता है और प्रतिबंध हटाना चाहता है, जबकि डीप स्टेट ट्रंप के सत्ता में रहने से अपने फायदे से हाथ धो रहे हैं. इसलिए वो रास्ता से हटाने की प्लानिंग कर सकते हैं. दोनों ही किरदार शक के दायरे में हैं, क्योंकि बार-बार हमला होना शक पैदा करता है. ईरान के अलावा डीप स्टेट पर भी पेंटागन की निगरानी है.
हमले के पीछे क्या डीपस्टेट की साजिश?
माना जाता है कि अमेरिका में डीपस्टेट की जड़ें बहुत गहरी हैं. FBI, CIA, NSA जैसी इंटेलिजेंस एजेंसियां, ब्यूरोक्रेट्स, मीडिया और बड़े कॉर्पोरेट हाउस मिलकर एक सीक्रेट सरकार चलाते हैं. ये षड्यंत्रों के जरिए चुने हुए राष्ट्रपति की नीतियों को अपने हिसाब से मोड़ने की कोशिश करते हैं, जबकि ट्रंप खुद बिजनेसैन रहे हैं. इसलिए इस गठबंधन को हावी नहीं होने दे रहे. इसी वजह से वो डीप स्टेट की आंख की किरकिरी बन चुके हैं.
ट्रंप ऐसे फैसले ले रहे हैं, जो उनके रिश्तेदारों और करीबियों को फायदा उठा रहे हैं, जिससे डीप स्टेट के नेटवर्क से जुड़े लोगों की बेचैनी बढ़ रही है. हो सकता है. इसी वजह से वो ट्रंप को रास्ते से हटाने का प्लान बना रहे हों.
अमेरिका में चुने हुए नेताओं से अलग एक छिपा हुआ नेटवर्क चलता है, जिसे डीप स्टेट कहा जाता है. इसमें ब्यूरोक्रेट्स, इंटेलिजेंस एजेंसियां, मिलिट्री लीडर्स और बड़े बिजनेसमैन जुड़े होते हैं. ईरान युद्ध जारी रखने के पीछे इन सभी के अपने-अपने हित हैं. ईरान के साथ यूक्रेन युद्ध को भी अमेरिकी हथियार कंपनियां जारी रखना चाहती हैं, ताकि लगातार हथियार बेचकर मोटा मुनाफा कमाती रहें.
वहीं अमेरिकी इंटलिजेंस से जुड़े कई ताकतवर लोगों का युद्ध जारी रखने के पीछे अपना फायदा है, वो युद्ध के नाम पर देश में पावर और कंट्रोल अपने पास बनाए रखना चाहते हैंं, कई विपक्षी नेता भी अमेरिकी डीप स्टेट से जुड़े हैं. अगर ट्रंप युद्धविराम में विफल होते हैं तो उनका और रिपब्लिकन पार्टी का ग्राफ तेजी से गिरेगा, जिससे विपक्षी नेताओं को फायदा होगा.
ट्रंप पर हमले के पीछे का खेल क्या?
माना जाता है के डीप स्टेट से जुड़े पेंटागन के कई टॉप जनरल भी फिलहाल युद्ध जारी रखना चाहते हैं, ताकि ट्रंप का ध्याना मेक अमेरिका ग्रेट अगेन मिशन से भटकाया जा सके. इससे उनके खिलाफ विरोध भड़काया जा सके.
अब सवाल उठ रहा है. ट्रंप पर हमले की जांच में किसका नाम सामने आता है. अगर इसमें डीप स्टेट से जुड़े लोग शामिल हुए तो अमेरिका में राजनीतिक संकट गहरा सकता है. अगर इसमें ईरान का नाम सामने आया तो युद्ध औऱ भीषण हो सकता है. ईरान पर अरब देश भी हमला कर सकते हैं. अमेरिका परमाणु हमला भी कर सकता है. यूरेनियम पर कब्जे का ऑपरेशन आरंभ कर सकता है. होर्मुज पर अमेरिका पूर्ण नियंत्रण कर सकता है, लेकिन ये इतना आसान नहीं होगा. इसलिए अमेरिका को नाटो का साथ चाहिए होगा, जो अभी तक युद्ध में शामिल नहीं हुए हैं.
हांलाकि ट्रंप पर हमला होने से नाटो की संवेदना जुड़ सकती हैं. अगर ईरान का नाम आया तो ट्रंप भी ईरान के खात्मे के लिए नाटो को साथ बुला सकते हैं, लेकिन ईरान भी चीन-रूस और नॉर्थ कोरिया के साथ मिलकर अमेरिका को काउंटर करेगा, जिससे अरब का युद्ध पूरे विश्व में फैल सकता है यानी ट्रंप पर हमले की घटना तीसरे विश्वयुद्ध का कारण बन सकती है. इसलिए बड़ी बारीकी और एहतियात के साथ जांच होनी जरूरी है, क्योंकि सवाल पूरी दुनिया पर मंडराते खतर का है.
ब्यूरो रिपोर्ट-टीवी9 भारतवर्ष
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