दुनिया में बदलते राजनीतिक हालात और युद्धों की वजह से वैश्विक व्यापार लगातार प्रभावित हो रहा है. ऐसे समय में भारत और रूस एक ऐसे समुद्री व्यापार मार्ग पर साथ काम करने की तैयारी कर रहे हैं, जो आने वाले सालों में दुनिया के व्यापार का नक्शा बदल सकता है.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, रूस के प्रधानमंत्री मिखाइल मिशुस्तिन ने हाल ही में रूस की सरकारी परमाणु ऊर्जा कंपनी रोसाटॉम को भारत के साथ नॉर्दर्न सी रूट पर माल ढुलाई के लिए समझौता करने की मंजूरी दे दी है. यह कदम भारत और रूस के बीच आर्कटिक क्षेत्र में सहयोग को नई दिशा देगा.
क्या है नॉर्दर्न सी रूट?
नॉर्दर्न सी रूट रूस के उत्तरी आर्कटिक तट से होकर गुजरने वाला समुद्री रास्ता है. यह बारेंट्स सागर से शुरू होकर बेरिंग स्ट्रेट तक जाता है. अब तक इस रास्ते का इस्तेमाल मुख्य रूप से रूस अपने घरेलू माल और आर्कटिक में मौजूद तेलगैस परियोजनाओं के लिए करता था, लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण आर्कटिक की बर्फ धीरेधीरे पिघल रही है. इससे यह रास्ता पहले के मुकाबले ज्यादा समय तक जहाजों के लिए खुला रहने लगा है. रूस चाहता है कि भविष्य में यह मार्ग यूरोप और एशिया के बीच एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक कॉरिडोर बन जाए.
नॉर्दर्न सीरूट की बड़ी बातें
- नॉर्दर्न सी रूट आर्कटिक महासागर के पूर्वी और पश्चिमी हिस्सों को जोड़ने वाला समुद्री व्यापार मार्ग है.
- यह मार्ग यूरोप और एशिया के बीच सबसे छोटा समुद्री रास्ता माना जाता है.
- NSR की कुल लंबाई लगभग 13,000 किमी है, जबकि स्वेज नहर मार्ग करीब 21,000 किमी लंबा है.
- इस रूट से यात्रा का समय करीब एक महीने से घटकर दो सप्ताह से भी कम हो सकता है.
- यह पूरा मार्ग रूस के एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन और आर्कटिक महासागर के भीतर स्थित है.
- यह बारेंट्स सागर से शुरू होकर बेरिंग स्ट्रेट तक जाता है.
- इस मार्ग का इस्तेमाल मुख्य रूप से साइबेरिया के बंदरगाहों तक माल पहुंचाने के लिए होता है.
- साल में केवल करीब दो महीने ही इस मार्ग के कुछ हिस्से बर्फ से मुक्त रहते हैं.
भारत को क्या होगा फायदा?
भारत के लिए यह सिर्फ एक नया समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक दोनों लिहाज से बड़ा अवसर है. अभी यूरोप जाने वाला ज्यादातर समुद्री जहाज स्वेज नहर से होकर गुजरते हैं, लेकिन अगर नॉर्दर्न सी रूट का इस्तेमाल बढ़ता है, तो कुछ यूरोपीय देशों तक पहुंचने की दूरी करीब 40% तक कम हो सकती है. इससे माल की डिलीवरी में लगभग दो सप्ताह तक की बचत हो सकती है. हाल के सालों में रेड सी, होर्मुज स्ट्रेट और बाबअलमंदेब जैसे समुद्री रास्तों पर तनाव बढ़ा है. ऐसे में भारत और रूस जैसे देश अब वैकल्पिक समुद्री मार्ग तैयार करना चाहते हैं.
भारतरूस व्यापार को मिलेगा बढ़ावा
ने 2030 तक आपसी व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. नॉर्दर्न सी रूट इस लक्ष्य को हासिल करने में अहम भूमिका निभा सकता है. रूस पहले ही भारत को बड़ी मात्रा में कच्चा तेल भेज रहा है. आने वाले समय में इसी रास्ते से LNG, कोयला, उर्वरक और महत्वपूर्ण खनिज भी भारत तक पहुंचाए जा सकते हैं.
सिर्फ व्यापार नहीं, जहाज निर्माण में भी मौका
भारत की दिलचस्पी सिर्फ माल ढुलाई तक सीमित नहीं है. दोनों देशों के बीच आर्कटिक जहाज निर्माण, समुद्री इंफ्रास्ट्रक्चर और भारतीय नाविकों को आर्कटिक क्षेत्र में जहाज चलाने की ट्रेनिंग देने पर भी चर्चा हो रही है. अगर यह सहयोग आगे बढ़ता है तो भारत का शिपबिल्डिंग सेक्टर भी मजबूत हो सकता है और देश को नई तकनीक सीखने का मौका मिलेगा.
रूस को भारत की जरूरत क्यों?
यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. ऐसे में रूस अब एशियाई देशों के साथ व्यापार बढ़ाना चाहता है. चीन पहले से ही इस परियोजना में बड़ा भागीदार है, लेकिन रूस नहीं चाहता कि यह पूरा प्रोजेक्ट सिर्फ चीन पर निर्भर हो. इसलिए भारत जैसे बड़े और भरोसेमंद पार्टनर को शामिल करना रूस की रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है.
आसान नहीं है यह रास्ता
नॉर्दर्न सी रूट को पूरी तरह सफल बनाना आसान नहीं होगा. आर्कटिक में साल के कई महीनों तक बर्फ जमी रहती है. कई जगह जहाजों को आइसब्रेकर जहाजों की मदद लेनी पड़ती है. वहां बंदरगाह और अन्य सुविधाएं अभी सीमित हैं. बीमा, निवेश और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी इस परियोजना के सामने बड़ी चुनौती हैं. यानी यह रास्ता अभी तुरंत स्वेज नहर की जगह नहीं लेगा, लेकिन भविष्य में इसकी अहमियत काफी बढ़ सकती है.
भविष्य की तैयारी
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि भारत और रूस का यह समझौता आज की जरूरत से ज्यादा भविष्य की तैयारी है. अगर आने वाले सालों में आर्कटिक समुद्री व्यापार तेजी से बढ़ता है, तो शुरुआती दौर में जुड़े देशों को सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है. भारत इस परियोजना के जरिए सिर्फ नया व्यापारिक रास्ता नहीं, बल्कि दुनिया के बदलते व्यापारिक नक्शे में अपनी मजबूत हिस्सेदारी भी सुनिश्चित करना चाहता है.