
HRA और ओल्ड टैक्स रिजीमImage Credit source: AI
जब भी टैक्स बचाने की बात होती है, ज़्यादातर लोग सेक्शन 80C या हेल्थ इंश्योरेंस तक ही सोच पाते हैं. लेकिन सैलरी पाने वालों के लिए हाउस रेंट अलाउंस (HRA) एक ऐसा फायदा है, जिससे लाखों रुपये तक की इनकम टैक्स से बाहर हो सकती है. खास बात ये है कि HRA पर कोई सीधी ऊपरी सीमा तय नहीं है, जबकि बाकी छूटों की लिमिट फिक्स होती है.
यही वजह है कि आज भी बड़ी संख्या में टैक्सपेयर्स ओल्ड टैक्स रिजीम को चुनते हैं, क्योंकि वहां HRA का फायदा मिलता है. नया टैक्स सिस्टम भले आसान लगे, लेकिन उसमें ये बड़ी छूट नहीं मिलती है.
HRA पूरी तरह अनलिमिटेड क्यों नहीं है?
भले ही HRA पर कोई तय कैप नहीं है, लेकिन टैक्स छूट निकालने का फॉर्मूला तय है. छूट की रकम तीन चीजों में से जो सबसे कम हो, वही मानी जाती है. आपको कंपनी से कितना HRA मिला, आप अपनी सैलरी के मुकाबले कितना किराया दे रहे हैं और आप मेट्रो शहर में रहते हैं या नॉन-मेट्रो में इस पर HRA निर्भर करता है. हालांकि, यहां सैलरी का मतलब सिर्फ बेसिक नहीं होता, बल्कि बेसिक सैलरी, महंगाई भत्ता और कमीशन भी इसमें जुड़ता है. यानी HRA की असली ताकत आपके सैलरी स्ट्रक्चर और किराए पर निर्भर करती है.
ओल्ड बनाम न्यू टैक्स सिस्टम
टैक्स एक्सपर्ट नीरज अग्रवाल (पार्टनर, नांगिया एंड कंपनी LLP) के मुताबिक, HRA ओल्ड टैक्स रिजीम की सबसे मजबूत छूटों में से एक है. जब HRA को सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, तो ओल्ड टैक्स सिस्टम कई मामलों में न्यू सिस्टम से ज्यादा फायदेमंद हो जाता है. उदाहरण के तौर पर, 15 लाख सालाना सैलरी वाला व्यक्ति अगर HRA क्लेम नहीं करे, तो नया टैक्स सिस्टम सस्ता पड़ सकता है. लेकिन जैसे ही HRA जुड़ता है, तस्वीर बदल जाती है और ओल्ड टैक्स रिजीम में टैक्स देनदारी कम हो जाती है.
ज्यादा सैलरी वालों को HRA से और फायदा
मान लीजिए आपकी सालाना सैलरी 30 लाख रुपये है और आप मुंबई जैसे मेट्रो शहर में रहते हैं. अगर आपकी बेसिक और DA अच्छी है और आप रेंट भी ज्यादा देते हैं, तो HRA से लाखों रुपये की इनकम टैक्स फ्री हो सकती है. ऐसे मामलों में ओल्ड टैक्स सिस्टम न्यू टैक्स सिस्टम पर साफ बढ़त बना लेता है. यही वजह है कि कॉर्पोरेट सेक्टर के बड़े शहरों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स HRA को सबसे बड़ा टैक्स सेवर मानते हैं.
बजट 2026 से क्या उम्मीदें हैं?
अब बड़ा सवाल है कि बजट 2026 में HRA को लेकर क्या बदलना चाहिए? टैक्स एक्सपर्ट्स मानते हैं कि मौजूदा सिस्टम जमीनी हकीकत से पीछे छूट चुका है. आज बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, गुरुग्राम और नोएडा जैसे शहरों में किराया मुंबई-दिल्ली जितना ही महंगा है, लेकिन टैक्स नियमों में इन्हें अब भी नॉन-मेट्रो माना जाता है. नीरज अग्रवाल का कहना है कि इन तेजी से बढ़ते शहरों को मेट्रो की कैटेगरी में शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वहां रहने वाले कर्मचारियों को भी 50% तक HRA छूट मिल सके.
HRA को इंडेक्स से जोड़ने का सुझाव
ईटी की रिपोर्ट में चार्टर्ड अकाउंटेंट डॉ. सुरेश सुराना का मानना है कि आने वाले समय में टैक्स सिस्टम को और तार्किक बनाने की जरूरत है. खासतौर पर जब नया इनकम टैक्स कानून 2025 अप्रैल 2026 से लागू होने वाला है. उनके मुताबिक, HRA की सीमा को किसी सरकारी हाउसिंग इंडेक्स, जैसे CPI-Housing या NHB RESIDEX, से जोड़ा जाना चाहिए. इससे किराए की महंगाई के हिसाब से HRA खुद-ब-खुद एडजस्ट हो जाएगा और बार-बार नियम बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी.
परिवार को किराया देकर HRA क्लेम करना कितना सुरक्षित?
बहुत से लोग माता-पिता या दादा-दादी को किराया देकर HRA क्लेम करते हैं. कानून इसकी इजाजत देता है, लेकिन शर्त यह है कि पूरा लेन-देन असली और साफ-सुथरा होना चाहिए. डॉ. सुरेश सुराना बताते हैं कि ऐसे मामलों में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ज्यादा जांच करता है. इसलिए लिखित रेंट एग्रीमेंट होना चाहिए, किराया बैंक के जरिए दिया जाना चाहिए और मकान मालिक को अपनी इनकम टैक्स रिटर्न में वो किराया दिखाना जरूरी है.
हालांकि, पति या पत्नी को किराया देने पर HRA क्लेम अक्सर शक के घेरे में आ सकता है, इसलिए इसमें खास सावधानी जरूरी है. HRA आज भी ओल्ड टैक्स रिजीम को मजबूत बनाता है. लेकिन बदलते समय और बढ़ते किराए को देखते हुए बजट 2026 में HRA नियमों को अपडेट करने की जरूरत है. अगर ऐसा होता है, तो करोड़ों सैलरी वाले टैक्सपेयर्स को सीधा फायदा मिल सकता है.
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