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माइक्रो स्ट्रेस क्या है? रोज़मर्रा की छोटी टेंशन कैसे बिगाड़ रही सेहत

माइक्रो स्ट्रेस क्या है? रोज़मर्रा की छोटी टेंशन कैसे बिगाड़ रही सेहत
माइक्रो स्ट्रेस क्या है? रोज़मर्रा की छोटी टेंशन कैसे बिगाड़ रही सेहत

माइक्रो स्ट्रेस Image Credit source: Getty Images

माइक्रो स्ट्रेस यानी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी चिंताएं, जो देखने में मामूली लगती हैं, लेकिन मन और शरीर पर लगातार दबाव बनाती रहती हैं. जैसे सुबह देर हो जाना, काम की डेडलाइन, फोन नोटिफिकेशन की भरमार, घर और ऑफिस की जिम्मेदारियां या किसी की छोटी-सी नाराज़गी. ये बड़ी समस्या नहीं होतीं, लेकिन बार-बार होने के कारण मानसिक तनाव बढ़ाती हैं. माइक्रो स्ट्रेस अक्सर तब होता है जब व्यक्ति पर उम्मीदों का दबाव ज्यादा हो, समय कम हो और खुद के लिए वक्त न बचे.

कई बार लोग माइक्रो स्ट्रेस गंभीर नहीं मानते, क्योंकि यह अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे बढ़ता है. इसके कारण चिड़चिड़ापन, बेचैनी, ध्यान भटकना, छोटी बात पर गुस्सा आना, नींद में कमी और हर समय व्यस्त महसूस करना जैसे लक्षण दिख सकते हैं. व्यक्ति को लगता है कि वह लगातार भागदौड़ में है, लेकिन स्पष्ट कारण समझ नहीं आता. इसलिए जानना जरूरी है कि माइक्रो स्ट्रेस से सेहत पर क्या असर होता है और इससे बचाव कैसे करें.

माइक्रो स्ट्रेस से सेहत पर क्या असर होता है?

आरएमएल हॉस्पिटल में मेडिसिन विभाग में डायरेक्टर प्रोफेसर डॉ. सुभाष गिरि बताते हैं कि लगातार बना रहने वाला माइक्रो स्ट्रेस शरीर के तनाव हॉर्मोन को बढ़ा देता है. इससे ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल पर अधिक दबाव पड़ता है. लंबे समय तक ऐसा रहने पर इम्यून सिस्टम कमजोर हो सकता है, जिससे बार-बार सर्दी-जुकाम या संक्रमण की समस्या हो सकती है. माइक्रो स्ट्रेस पाचन तंत्र को भी प्रभावित करता है, जिससे गैस, एसिडिटी और पेट दर्द जैसी परेशानियां बढ़ती हैं.

मानसिक रूप से व्यक्ति थकान, उदासी और मोटिवेशन की कमी महसूस कर सकता है. नींद पूरी न होने से दिनभर सुस्ती रहती है और काम की क्षमता घटती है. धीरे-धीरे यह स्थिति चिंता और डिप्रेशन जैसी गंभीर समस्याओं का कारण भी बन सकती है. इसलिए छोटी-छोटी टेंशन को नजरअंदाज करना सही नहीं है.

किसको है ज्यादा खतरा?

जो लोग मल्टीटास्किंग करते हैं, जैसे कामकाजी महिलाएं, स्टूडेंट्स या ऑफिस में लगातार टारगेट पूरा करने वाले कर्मचारी, उन्हें माइक्रो स्ट्रेस का खतरा ज्यादा होता है. जो लोग हर काम में परफेक्शन चाहते हैं या दूसरों की उम्मीदों पर खरा उतरने का दबाव महसूस करते हैं, वे भी इसकी चपेट में जल्दी आते हैं.

डिजिटल गैजेट्स का ज्यादा उपयोग और सोशल मीडिया की तुलना की आदत भी तनाव बढ़ाती है. जिन लोगों को आराम और खुद के लिए समय कम मिलता है, उनमें यह समस्या तेजी से बढ़ सकती है.

कैसे करें बचाव?

रोज़ 7-8 घंटे की नींद लें.

दिनभर में छोटे-छोटे ब्रेक जरूर लें.

मोबाइल नोटिफिकेशन सीमित रखें.

समय प्रबंधन की आदत डालें.

रोज़ हल्का व्यायाम या योग करें.

अपनी प्राथमिकताएं तय करें.

परिवार और दोस्तों से खुलकर बात करें.

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