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जल सूख रहा है, जंगल कट रहे हैं, ज़मीन बिक रही है और जानवर मर रहे हैं—कलेक्टर सो रहे हैं या सिस्टम बिक चुका है?

जल सूख रहा है, जंगल कट रहे हैं, ज़मीन बिक रही है और जानवर मर रहे हैं—कलेक्टर सो रहे हैं या सिस्टम बिक चुका है?
जल सूख रहा है, जंगल कट रहे हैं, ज़मीन बिक रही है और जानवर मर रहे हैं—कलेक्टर सो रहे हैं या सिस्टम बिक चुका है?

पटना/खगड़िया।
भारत में आज जो हो रहा है, वह केवल पर्यावरण संकट नहीं है। यह प्रशासनिक विफलता और संस्थागत अपराध की खुली तस्वीर है। जल, जंगल, ज़मीन और जानवर। ये चारों प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि देश के जीवन की रीढ़ हैं। लेकिन आज इन्हीं चारों की सबसे तेज़ी से लूट हो रही है।

यह कोई भावनात्मक लेख नहीं, बल्कि सरकार, कलेक्टर और पूरे प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ़ सीधी चार्जशीट है।

जल: अधिकार से माफिया का कारोबार

नदियां सूख रही हैं। तालाब पाटे जा चुके हैं। भूजल खतरनाक स्तर तक गिर चुका है। पानी अब नागरिकों का अधिकार नहीं रहा, बल्कि माफिया का प्रोडक्ट बन गया है।
हर जिले में अवैध बोरिंग, हर शहर में टैंकर माफिया और हर फाइल पर प्रशासन की चुप्पी सवाल खड़े करती है।

अगर कलेक्टर चाहें, तो एक आदेश से सैकड़ों अवैध बोरिंग बंद हो सकती हैं।
तो सवाल यह नहीं कि हो सकता है या नहीं, सवाल यह है कि किया क्यों नहीं जा रहा?

जंगल: विकास के नाम पर अपराध

पेड़ काटे जा रहे हैं, जंगल उजाड़े जा रहे हैं और बदले में पोस्टर लगाए जा रहे हैं—“स्मार्ट सिटी”, “इंडस्ट्रियल ज़ोन”, “कॉरिडोर”।
जिस देश में जंगल खत्म होंगे, वहां बाढ़, सूखा, बीमारी और भूख तय है।

जंगल बचाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है।

ज़मीन: किसान से छीनकर कॉरपोरेट को

खेती की ज़मीन अधिग्रहण में जा रही है। चारागाह रियल एस्टेट बन रहे हैं। सरकारी ज़मीन पर मॉल और कॉम्प्लेक्स खड़े हैं।
ज़मीन रिकॉर्ड में हेराफेरी, म्यूटेशन में घोटाले और नीचे से ऊपर तक सिस्टम की भागीदारी किसी से छुपी नहीं है।

क्या कोई कलेक्टर ईमानदारी से कह सकता है कि उसके जिले में एक इंच ज़मीन भी अवैध नहीं बिकी?

जानवर: विकास की सबसे बड़ी कीमत

हाथी ट्रेन से कट रहे हैं। गाय सड़कों पर दम तोड़ रही हैं। कुत्तों को ज़हर दिया जा रहा है। पक्षी मोबाइल टावरों और कंक्रीट के जंगल में गायब हो रहे हैं।

यह अमानवीयता नहीं तो क्या है?
जिस समाज में जानवर सुरक्षित नहीं, वहां इंसान भी सुरक्षित नहीं रह सकता।

प्रशासन और सरकार से सीधा सवाल

क्या जल, जंगल, ज़मीन और जानवर आपकी प्राथमिकता सूची में हैं?
या ये सिर्फ़ फाइलों में दर्ज विषय हैं?

अगर प्रशासन ईमानदार है, तो उसे सवालों से डरने की जरूरत नहीं।
लेकिन अगर वह चुप है, तो यह चुप्पी साझेदारी का संकेत है।

आख़िरी चेतावनी

यह देश केवल बजट, GDP और चुनाव से नहीं चलता।
यह देश चलता है—जल से, जंगल से, ज़मीन से और जानवरों से।

अगर इन चारों को नहीं बचाया गया,
तो न सरकार बचेगी,
न प्रशासन,
और न ही भविष्य।

यह समय है—जवाबदेही का, कार्रवाई का और चेतने का।