एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा के हालिया बयानों पर देश के कॉर्पोरेट जगत में हलचल तेज हो गई है, जिस पर रिलायंस इंडस्ट्रीज ने 28 अगस्त 2026 को आधिकारिक मीडिया बयान जारी कर सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है. रिलायंस ग्रुप ने इन बयानों को “निराधार” करार देते हुए स्पष्ट किया कि उनके मीडिया ब्रांड्स का इस्तेमाल कभी किसी पर निशाना साधने के लिए नहीं किया गया है. रिलायंस इंडस्ट्रीज के कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस की ओर से जारी इस मीडिया स्टेटमेंट में एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन के आरोपों का जवाब देते हुए संस्थागत निष्पक्षता और मर्यादा दोनों को सामने रखा गया है.

रिलायंस का आधिकारिक बयान
रिलायंस ग्रुप ने एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन सुभाष चंद्रा द्वारा की गई टिप्पणियों पर निराशा जताते हुए उन्हें पूरी तरह से आधारहीन बताया है. कंपनी ने रिलायंस ग्रुप का हिस्सा बनी अपनी मीडिया संस्थाओं पर लगाए गए सभी आरोपों और संकेतों का कड़ा खंडन किया है. रिलायंस ने साफ किया कि उनके मीडिया ब्रांड्स का इस्तेमाल न तो कभी किसी व्यक्ति या संस्था पर हमला करने के लिए हुआ है और न ही भविष्य में कभी ऐसा किया जाएगा.
RIL Media Statement pic.twitter.com/rxieVAF9Ek
— Reliance Industries Limited August 28, 2026
कड़े रुख और खंडन के बावजूद, रिलायंस ने सुभाष चंद्रा का एक उद्योगपति व उद्यमी के रूप में सम्मान करने की बात कही और उनके बेहतर भविष्य की कामना की. भारत के मीडिया और बिजनेस सेक्टर में यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. रिलायंस ने एक ओर जहां अपनी मीडिया परिसंपत्तियों की साख और संपादकीय स्वतंत्रता का बचाव किया है, वहीं दूसरी ओर किसी भी सार्वजनिक विवाद को बढ़ावा न देते हुए एक गरिमापूर्ण व्यावसायिक रुख अपनाया है.
22,006 करोड़ के दावों को लेकर विवाद
यह विवाद नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल के उस आदेश के बाद शुरू हुआ जिसमें चंद्रा की पर्सनल इनसॉल्वेंसी कार्यवाही में एक समझौते को मंजूरी दी गई थी. मंजूर किए गए प्लान के तहत, चंद्रा को 22,006 करोड़ रुपए के स्वीकार किए गए दावों के बदले अपनी पर्सनल संपत्ति से 6.25 करोड़ रुपए देने होंगे.
इसके बाद ऐसी खबरें आईं जिनमें इस समझौते को लेंडर्स के लिए 99.97 फीसदी का ‘हेयरकट’ बताया गया. हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि ऐसी व्याख्या गुमराह करने वाली है, क्योंकि 22,006 करोड़ रुपए का आंकड़ा चंद्रा के पर्सनल गारंटर के तौर पर उन पर बने दावों को दिखाता है, न कि उस पैसे को जो उन्होंने खुद उधार लिया था.
यह दिवालियापन की कार्यवाही उस पर्सनल गारंटी की वजह से शुरू हुई थी जो चंद्रा ने ‘विवेक इन्फ्राकॉन’ द्वारा ‘इंडियाबुल्स’ से लिए गए लोन के लिए दी थी. लोन का पेमेंट न हो पाने के बाद, गारंटर के तौर पर चंद्रा के खिलाफ दिवालियापन की कार्यवाही शुरू की गई.
NCLT ने किस चीज को मंजूरी दी?
NCLT की दिल्ली बेंच ने शुरू में बंटा हुआ फैसला दिया था, जिसके बाद मामले को ज्यूडिशियल मेंबर नीलेश शर्मा के पास भेजा गया. बाद में, ‘इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड’ की धारा 114 के तहत समझौते को मंजूरी दी गई. ट्रिब्यूनल ने ‘रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल’ के आकलन पर भरोसा किया, जिसमें पाया गया कि चंद्रा की पर्सनल संपत्ति उस रकम से काफी कम थी जिसका दावा किया जा रहा था. ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि उन्हें जबरदस्ती दिवालिया घोषित करने से क्रेडिटर्स को मिलने वाली रकम और भी कम हो सकती है. समझौते के तहत, चंद्रा 6.25 करोड़ रुपए का योगदान देंगे, जबकि कॉर्पोरेट बॉरोअर्स से लगभग 1,494 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है. वोटिंग शेयर का 80.81 फीसदी प्रतिनिधित्व करने वाले क्रेडिटर्स ने रिज़ॉल्यूशन प्लान का समर्थन किया.