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Premanand Maharaj: इतनी भक्ति के बाद भी दुख क्यों मिलता है? प्रेमानंद महाराज ने खोला राज

Premanand Maharaj: इतनी भक्ति के बाद भी दुख क्यों मिलता है? प्रेमानंद महाराज ने खोला राज
Premanand Maharaj: इतनी भक्ति के बाद भी दुख क्यों मिलता है? प्रेमानंद महाराज ने खोला राज

प्रेमानंद महाराज

अक्सर लोग भगवान की दिन-रात भक्ति करते हैं, उपवास रखते हैं और सत्संग करते हैं, लेकिन फिर भी उनके जीवन में परेशानियां खत्म नहीं होतीं. ऐसे में मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी भक्ति के बाद भी दुख क्यों मिल रहा है? और “क्या भगवान हमारी पुकार नहीं सुन रहे? प्रेमानंद महाराज ने हाल ही में एक भक्त के इसी सवाल का बहुत गहराई और सरलता से जवाब दिया है. उन्होंने बताया कि दुख आने पर एक भक्त का दृष्टिकोण कैसा होना चाहिए.

कष्ट भगवान नहीं, हमारे कर्म देते हैं

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, हमारे जीवन में जो भी दुख या बीमारियां आती हैं, वे हमारे पूर्व जन्मों के बुरे कर्मों का फल होती हैं, जिसे ‘प्रारब्ध’ कहा जाता है. भगवान हमें दुख नहीं देते, बल्कि वे इन कष्टों के माध्यम से हमारे पापों को काटकर हमें पवित्र करते हैं. जैसे गंदे कपड़े को साफ करने के लिए उसे रगड़ना पड़ता है, वैसे ही दुख हमें आध्यात्मिक रूप से शुद्ध करते हैं.

भगवान कहां हैं?

जब समाज या लोग पूछते हैं कि “इतनी भक्ति करते हो, फिर भी बीमार हो या गरीब हो, तुम्हारा भगवान कहां है?, तो प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि एक सच्चे भक्त को यह कहना चाहिए. मेरा भगवान मेरे साथ है, तभी तो मैं इतने बड़े कष्ट को भी हंसते हुए सह पा रहा हूं. अगर उनकी कृपा न होती, तो यह दुख मुझे तोड़ देता. प्रेमानंद महाराज कहते हैं कि भक्ति कष्टों को खत्म करने की जादू की छड़ी नहीं है, बल्कि यह कष्टों को सहने की शक्ति और विवेक देने का नाम है.

खुद का दिया उदाहरण

प्रेमानंद महाराज ने खुद का उदाहरण देते हुए एक बड़ी बात कही. उन्होंने बताया कि उनकी दोनों किडनियां फेल हैं, लेकिन वे इसे दुख नहीं बल्कि भगवान का आशीर्वाद मानते हैं. वे कहते हैं कि अगर यह कष्ट न होता, तो शायद आज वे जिस भजन-मार्ग और सेवा में हैं, वहां तक नहीं पहुंच पाते. बिना किडनी के इतने सालों से सक्रिय रहना और घंटों प्रवचन देना, यह बिना ईश्वर की शक्ति के संभव नहीं है.

महान संतों और पांडवों को भी मिला कष्ट

प्रेमानंद महाराज ने समझाया कि यह ‘कर्मभूमि’ है. यहाँ जो शरीर आया है, उसे कर्मों का हिसाब देना ही पड़ता है.

श्री रामकृष्ण परमहंस: इतने बड़े संत होने के बावजूद उन्हें गले का कैंसर हुआ.

पांडव: खुद भगवान कृष्ण जिनके साथ थे, उन्हें भी वनवास और अपनों को खोने का दुख झेलना पड़ा. यह सब भगवान का विधान है, जिसे हमें विचलित हुए बिना स्वीकार करना चाहिए.

सच्ची भक्ति का असली रंग

जब भक्ति गहरी होती है, तो व्यक्ति सुख और दुख में फर्क करना बंद कर देता है. दुख में भगवान विशेष रूप से साथ होते हैं, लेकिन इसे केवल वही महसूस कर सकता है जिसका हृदय शुद्ध हो.

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