Parkinsons Disease Symptoms: विश्व पार्किंसंस दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने इस गंभीर न्यूरोलॉजिकल बीमारी को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया है। आमतौर पर लोग पार्किंसंस को केवल हाथ कांपने वाली बीमारी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि यह सोच अधूरी है। पार्किंसंस रोग शरीर में बहुत धीमी गति से बदलाव लाता है जिसे अक्सर लोग बढ़ती उम्र का असर या सामान्य कमजोरी समझकर टाल देते हैं।

क्या है पार्किंसंस
पार्किंसंस एक न्यूरोलॉजिकल समस्या है जो सीधे हमारे दिमाग और नसों को प्रभावित करती है। इस स्थिति में मस्तिष्क के भीतर डोपामिन नामक रसायन का उत्पादन कम होने लगता है। यह केमिकल हमारे शरीर के मूवमेंट को नियंत्रित और सुचारू बनाने के लिए जिम्मेदार होता है। जब डोपामिन का स्तर घटता है तो व्यक्ति को चलने-फिरने, संतुलन बनाने और दैनिक कार्यों को करने में कठिनाई होने लगती है।
शुरुआती लक्षण
जानकारी के अनुसार इस बीमारी की शुरुआत में जरूरी नहीं कि हाथ कांपें। इसके कई अन्य सूक्ष्म संकेत होते हैं।
गति का धीमा होना: चलने के दौरान कदम छोटे हो जाना या किसी भी काम को पूरा करने में पहले से अधिक समय लगना।
लिखावट में बदलाव: लिखते समय अक्षरों का आकार पहले की तुलना में बहुत छोटा हो जाना।
मांसपेशियों में जकड़न: शरीर के अंगों में कठोरता महसूस होना और चेहरे के हाव-भाव कम हो जाना।
आवाज का धीमा होना: बोलते समय आवाज का स्तर कम हो जाना या बोलने में स्पष्टता की कमी आना।
अनदेखे और गैर-शारीरिक लक्षण
पार्किंसंस के कुछ ऐसे लक्षण भी हैं जिनका सीधा संबंध शरीर के हिलने-डुलने से नहीं होता। इनमें सूंघने की क्षमता में कमी आना, लंबे समय तक कब्ज रहना और नींद ठीक से न आना शामिल है। इसके अलावा भारत में हुए अध्ययनों से पता चलता है कि लगभग आधे से ज्यादा मरीज डिप्रेशन, एंग्जायटी और बार-बार मूड खराब होने जैसी का भी सामना करते हैं।
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कैसे करें बचाव
पार्किंसंस का जल्दी पता चलना इसके प्रभावी इलाज के लिए बहुत जरूरी है। हालांकि इसे पूरी तरह ठीक करना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन सही दवाइयों और थेरेपी के माध्यम से लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
दवाइयां और फिजियोथेरेपी
दवाइयों के साथ नियमित व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने में मदद करता है।
स्पीच थेरेपी
बोलने की क्षमता में सुधार के लिए यह काफी मददगार साबित होती है।
एडवांस तकनीक
कुछ गंभीर मामलों में डीप ब्रेन स्टिमुलेशन जैसी आधुनिक तकनीक का भी उपयोग किया जाता है। होने का मतलब जीवन की समाप्ति नहीं है। सही जानकारी परिवार का सहयोग और समय पर न्यूरोलॉजिस्ट की सलाह से मरीज एक लंबा, स्वतंत्र और सक्रिय जीवन जी सकता है।
डिस्क्लेमर: इस लेख में दिए गए सुझाव केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी स्वास्थ्य समस्या के लिए डॉक्टर से सलाह जरूर लें। नवभारत किसी भी प्रकार के दावे की पुष्टि नहीं करता है।





