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OMG! 2000 साल बाद समंदर से फिर बाहर आया ये धागा, राजा-महराजा पहनते थे इससे बने कपड़े – Khabar Monkey

OMG! 2000 साल बाद समंदर से फिर बाहर आया ये धागा, राजा-महराजा पहनते थे इससे बने कपड़े – Khabar Monkey
OMG! 2000 साल बाद समंदर से फिर बाहर आया ये धागा, राजा-महराजा पहनते थे इससे बने कपड़े

2000 साल बाद फिर समंदर से बाहर आया ये धागा Image Credit source: Social Media

समुद्र की अथाह गहराइयों से निकला एक ऐसा रेशा, जो सोने की तरह दमकता है. यह किसी कल्पना लोक की कहानी नहीं, बल्कि इतिहास का एक अनमोल अध्याय है. इसे सी सिल्क या समुद्री रेशम कहा जाता है. हजारों साल पहले यह इतना दुर्लभ और कीमती था कि इसे केवल राजा-महाराजाओं, सम्राटों और धार्मिक प्रमुखों के लिए ही तैयार किया जाता था. अब लगभग दो हजार वर्षों बाद, वैज्ञानिकों ने इस भूली-बिसरी विरासत को नए रूप में फिर से जीवित कर दिया है.

समुद्री रेशम की खासियत इसकी प्राकृतिक सुनहरी चमक है. इसमें किसी प्रकार का रंग या रसायन नहीं मिलाया जाता था. इसकी चमक पूरी तरह प्राकृतिक होती थी, जो समुद्र में पाए जाने वाले विशेष शेलफिश से प्राप्त धागों के कारण आती थी. इन धागों को बाइसस थ्रेड्स कहा जाता है. ये बेहद महीन और मजबूत रेशे होते हैं, जिन्हें कुछ मसल्स और क्लैम समुद्र की चट्टानों से चिपके रहने के लिए बाहर निकालते हैं.

कैसे बाहर आया ये सुनहरा सिल्क

इतिहास में मुख्य रूप से मेडिटेरेनियन क्षेत्र में पाई जाने वाली बड़ी क्लैम प्रजाति Pinna nobilis से ये धागे इकट्ठा किए जाते थे. गोताखोर समुद्र में उतरकर इन रेशों को सावधानी से निकालते थे. बाद में इन्हें साफ किया जाता, सुखाया जाता, हाथ से काता जाता और फिर बुनकर शानदार कपड़े तैयार किए जाते थे. यह कपड़ा न केवल रेशम से हल्का होता था, बल्कि अधिक गर्म और टिकाऊ भी माना जाता था. इसकी सबसे अद्भुत विशेषता थी इसकी सुनहरी आभा, जो सदियों तक फीकी नहीं पड़ती थी. कहा जाता है कि इसकी चमक हजार साल तक बरकरार रह सकती थी.

रोमन साम्राज्य के दौर में इसे गोल्डन फाइबर ऑफ द सी यानी समुद्र का सुनहरा रेशा कहा जाता था. यह इतना दुर्लभ था कि एक छोटा सा वस्त्र तैयार करने में महीनों लग जाते थे और सैकड़ों बार गोताखोरी करनी पड़ती थी. प्राचीन लेखों में ऐसे वस्त्रों का वर्णन मिलता है जो धूप में शुद्ध सोने की तरह चमकते थे. कुछ विद्वानों का मानना है कि ग्रीक मिथक गोल्डन फ्लीस की प्रेरणा भी संभवतः इसी समुद्री रेशम से मिली हो.

इटली और सार्डिनिया जैसे क्षेत्रों में यह कला पीढ़ियों तक जीवित रही. वहां के कुछ परिवारों ने इस परंपरा को संजोकर रखा. हालांकि 20वीं सदी में हालात बदल गए. समुद्री प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक दोहन और परजीवी संक्रमण के कारण Pinna nobilis की संख्या तेजी से घटने लगी. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि 1990 के दशक में यूरोपीय संघ ने इसके शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया. 2019 में इसे संकटग्रस्त प्रजाति घोषित कर दिया गया. इसके साथ ही समुद्री रेशम की यह प्राचीन कला लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गई. सार्डिनिया की चियारा विगो जैसी कुछ हस्तशिल्प विशेषज्ञों ने इसे जीवित रखने की कोशिश की, लेकिन वे भी इसे बेचने के बजाय केवल उपहार के रूप में ही देती रहीं.

कोरिया के वैज्ञानिकों ने फिर की खोज

अब इस कहानी में एक नया मोड़ आया है. दक्षिण कोरिया के पोहांग यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (POSTECH) के वैज्ञानिकों ने इस पारंपरिक रेशम को एक नए और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से दोबारा बनाने में सफलता हासिल की है. प्रोफेसर डॉन्ग सू ह्वांग और जिमिन चोई की टीम ने Pinna nobilis के बजाय कोरिया के तटों पर बड़ी मात्रा में पाली जाने वाली Atrina pectinata नामक क्लैम का उपयोग किया. यह क्लैम मुख्य रूप से भोजन के लिए उगाई जाती है, और इसके बाइसस थ्रेड्स पहले बेकार समझकर फेंक दिए जाते थे.

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वैज्ञानिकों ने इन्हीं त्यागे गए धागों को इकट्ठा किया और पारंपरिक तकनीकों की मदद से उन्हें प्रोसेस किया. धागों को समुद्री पानी से धोया गया, सुखाया गया और फिर सावधानीपूर्वक कातकर बुना गया. परिणाम चौंकाने वाला था—एक बार फिर वही प्राकृतिक सुनहरी चमक वाला रेशा तैयार हुआ, जो मजबूत, टिकाऊ और फीका न पड़ने वाला है.

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