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अब फर्जी इश्योरेंस और NPS बेचा तो खैर नहीं! RBI ने जारी की नई गाइडलाइन

अब फर्जी इश्योरेंस और NPS बेचा तो खैर नहीं! RBI ने जारी की नई गाइडलाइन
अब फर्जी इश्योरेंस और NPS बेचा तो खैर नहीं! RBI ने जारी की नई गाइडलाइन

भारतीय रिजर्व बैंक

भारतीय रिजर्व बैंक ने फाइनेंशियल प्रोडक्ट से जुड़ी मिस-सेलिंग रोकने के लिए बड़ी गाइडलाइन जारी की है, जिसमें आरबीआई ने बैंकों को मिस-सेलिंग रोकने के लिए सख्त आदेश दिए हैं. अगर आप भी बैंक से इंश्योरेंस लेते हैं या फिर एनपीएस, म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं तो यह खबर आपके लिए ही है. आइए आपको पूरी गाइडलाइन के बारे में डिटेल से बताते हैं.

आरबीआई ने मिस-सेलिंग रोकने के लिए जारी की गई अपनी गाइडलाइन में कहा है कि बैंक ब्रांच के अंदर फाइनेंशियल प्रोडक्ट बेचने वाले एजेंट और बैंक स्टाफ साफ तौर पर अलग होने चाहिए. बैंकों को एक सेल्स कोड ऑफ कंडक्ट लागू करना होगा, जिसका उल्लंघन करने पर सजा हो सकती है. इसके साथ ही कई प्रोडक्ट और सर्विस के लिए सहमति अलग-अलग लेनी होगी, उन्हें एक साथ नहीं मिलाना होगा. बैंकों को यूजर इंटरफेस ऐसा डिजाइन करना होगा कि कस्टमर टर्म्स एंड कंडीशंस पढ़े बिना सहमति न दे सकें. बैंक थर्ड-पार्टी प्रोडक्ट को अपना बताकर मार्केट नहीं कर सकते. एजेंट बैंक कर्मचारी बनकर नहीं रह सकते. साथ ही स्टाफ और एजेंट बिना पहले से मंजूरी के कस्टमर को कॉल या उनसे मिल नहीं सकते हैं.

मिस-सेलिंग के खतरें

मिस-सेलिंग का मतलब यही है कि ऐसा प्रोडक्ट बेचना है जो कस्टमर की प्रोफाइल उम्र, इनकम, फाइनेंशियल जानकारी या रिस्क लेने की क्षमता के हिसाब से न हो. इसमें अधूरी या गुमराह करने वाली जानकारी देना, कस्टमर से साफ मंजूरी लिए बिना सर्विस बेचना, एक ऑफर को बढ़ाने के लिए दूसरी इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदना जरूरी बनाना और कस्टमर को ऑनलाइन धोखा देने के लिए डार्क पैटर्न का इस्तेमाल करना शामिल है.

इन पर है सख्त रोक

बैंक ऐसे प्रोडक्ट नहीं बेच पाएंगे जो कस्टमर की प्रोफाइल के लिए सही या ठीक न हों, भले ही उनकी साफ मंजूरी हो. इससे गलती करने वाले बैंकों के बचने के रास्ते बंद हो जाते हैं. वे गलत बेचने के दावों को मना करने के लिए एग्रीमेंट में कस्टमर के साइन का इस्तेमाल नहीं कर सकते है.

कभी-कभी, बैंक रिलेशनशिप मैनेजर भोले-भाले कस्टमर को यूनिट-लिंक्ड इंश्योरेंस पॉलिसी को म्यूचुअल फंड के तौर पर बेचने की कोशिश करते हैं. अब बैंकों को अलग एप्लीकेशन फॉर्म इस्तेमाल करने पड़ सकते हैं और अपने एप्लीकेशन फॉर्म में प्रोडक्ट का टाइप जैसे इंश्योरेंस, म्यूचुअल फंड, हाइब्रिड के बारे में साफ-साफ बताना पड़ सकता है.

मिस-सेलिंग होने पर क्या होगा?

मिस-सेलिंग साबित होने पर बैंकों को कस्टमर का पेमेंट रिफंड करना पड़ सकता है और ट्रांजैक्शन कैंसिल करना पड़ सकता है. साथ ही फाइनेंशियल नुकसान के लिए एक्स्ट्रा मुआवजा भी देना पड़ सकता है. प्रस्तावित नियमों के मुताबिक बैंकों को बिक्री के 30 दिनों के अंदर बिना किसी भेदभाव के सर्वे के जरिए कस्टमर का फीडबैक इकट्ठा करना होगा. मौजूदा पॉलिसी और सर्विस के तरीकों के रिव्यू में मदद के लिए बैंकों को नतीजों पर हर छह महीने में एक रिपोर्ट तैयार करनी होगी.

कस्टमर को क्या करना चाहिए

संबंधित फाइनेंशियल सेक्टर रेगुलेटर की टाइमलाइन के हिसाब से या साइन किया हुआ एग्रीमेंट मिलने के 30 दिनों के अंदर बैंक में मिस-सेलिंग की शिकायत दर्ज करें. ये RBI की ओर से पब्लिक फीडबैक के लिए जारी किए गए ड्राफ्ट गाइडलाइन हैं. स्टेकहोल्डर के कमेंट्स के रिव्यू के बाद फाइनल नियम 1 जुलाई से लागू किए जाएंगे.

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