
राजा मरुत का दैवीय खजानाImage Credit source: AI-ChatGpt
Mahabharata ka khajana: महाभारत के युद्ध के बाद जब पांडवों ने जीत हासिल की, तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती खजाना खाली होने की थी. कुरुक्षेत्र के विनाशकारी युद्ध ने न केवल योद्धाओं को खत्म किया था, बल्कि हस्तिनापुर की संपत्ति भी स्वाहा कर दी थी. ऐसे में एक प्राचीन राजा का त्यागा हुआ खजाना पांडवों के काम आया. आइए जानते हैं कौन थे राजा मरुत और क्या था उनके उस दिव्य खजाने का रहस्य.
कौन थे राजा मरुत?
महाभारत और पुराणों के अनुसार, राजा मरुत प्राचीन काल के एक महान और धर्मपरायण राजा थे. वे अपने न्याय, दानशीलता और भव्य यज्ञों के लिए प्रसिद्ध थे. कहा जाता है कि राजा मरुत देवताओं के समान वैभवशाली थे और उनकी संपत्ति इतनी अधिक थी कि बड़े-बड़े राजाओं की संपत्ति भी उनके सामने छोटी लगती थी. मान्यता है कि राजा मरुत ने अपने जीवनकाल में धर्म और प्रजा के कल्याण को सबसे ज्यादा महत्व दिया. इसी कारण उन्होंने एक ऐसा विशाल यज्ञ कराया, जिसकी चर्चा आज भी धार्मिक कथाओं में होती है.
हिमालय पर क्यों पड़ा था सोने का ढेर?
राजा मरुत ने अपने शासनकाल में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था. यह यज्ञ इतना भव्य था कि इसमें इस्तेमाल होने वाले बर्तन और साज-सज्जा की वस्तुएं भी शुद्ध सोने की थीं. यज्ञ के आखिर में राजा मरुत ने ब्राह्मणों को इतनी भारी मात्रा में सोना, रत्न और आभूषण दान किए कि उसे ले जाना असंभव हो गया. ब्राह्मणों ने अपनी जरूरत भर सोना लिया, लेकिन बाकी इतना अधिक था कि वे उसे उठा नहीं सके. आखिर में वह सारा सोना हिमालय की गुफाओं और घाटियों में वहीं पड़ा रह गया. समय बीतने के साथ वह खजाना मिट्टी में दब गया, लेकिन उसकी चर्चा पारंपरिक लोककथाओं में जीवित रही.
महर्षि व्यास की सलाह
कुरुक्षेत्र युद्ध के बाद महाराज युधिष्ठिर मानसिक शांति और अपने पापों के प्रायश्चित के लिए अश्वमेध यज्ञ करना चाहते थे. लेकिन इस विशाल यज्ञ के लिए अपार धन की आवश्यकता थी. राजकोष खाली था और पांडव दुविधा में थे. तब महर्षि व्यास ने उन्हें राजा मरुत के उस प्राचीन खजाने के बारे में बताया. व्यास जी ने कहा, हिमालय की गोद में आज भी राजा मरुत का स्वर्ण दबा हुआ है, जो अब किसी का नहीं है. तुम उसे लाकर धर्म के कामों में लगा सकते हो.
हजारों ऊंट और हाथियों पर लदकर आया सोना
महर्षि व्यास के मार्गदर्शन में पांडव हिमालय पहुंचे. वहां खुदाई करने पर उन्हें जो मिला, उसने सबकी आंखें चौंधिया दीं. वहां सोने की मुद्राएं, कलश, थालियां और अद्भुत आभूषणों का अंबार लगा था. पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, यह खजाना इतना विशाल था कि इसे ढोने के लिए 60 हजार ऊंटों और हजारों हाथियों की फौज लगानी पड़ी थी. इसी धन के बल पर युधिष्ठिर ने एक ऐसा भव्य अश्वमेध यज्ञ किया, जिसकी मिसाल सदियों तक दी गई.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और महाभारत कथा की जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.






