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Gen-Z नहीं, यूपी चुनाव का खेल पलटेंगे ये 3 वर्ग… इनकी संख्या 67 प्रतिशत​

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मुकाबला सिर्फ युवाओं, सोशल मीडिया और GenZ के भरोसे तय नहीं होता. जमीन पर ऐसे बड़े वर्ग भी हैं, जिनकी मौजूदगी घरघर और गांवगांव में दिखाई देती है. CSDSLokniti के उत्तर प्रदेश पोस्टपोल सर्वे के आंकड़ों को देखें तो गृहिणी, मजदूरकिसान और घर पर रहने वाले बुजुर्ग मिलकर करीब […]

उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी मुकाबला सिर्फ युवाओं, सोशल मीडिया और GenZ के भरोसे तय नहीं होता. जमीन पर ऐसे बड़े वर्ग भी हैं, जिनकी मौजूदगी घरघर और गांवगांव में दिखाई देती है. CSDSLokniti के उत्तर प्रदेश पोस्टपोल सर्वे के आंकड़ों को देखें तो गृहिणी, मजदूरकिसान और घर पर रहने वाले बुजुर्ग मिलकर करीब 67 प्रतिशत बैठते हैं. यानी चुनावी राजनीति में इन वर्गों की भूमिका को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए आसान नहीं होगा. सर्वे में 30.2 प्रतिशत उत्तरदाता गृहिणी थीं.

वहीं मजदूर, किसान और कृषि मजदूरों को जोड़ने पर यह हिस्सेदारी करीब 29.4 प्रतिशत पहुंचती है. इसके अलावा 56 वर्ष और उससे ज्यादा उम्र के लोगों की अलग श्रेणी भी 19.2 प्रतिशत थी, जबकि घर पर रहने वाले बुजुर्ग बतौर प्रोफेशनल कैटेगरी 7.7 प्रतिशत दर्ज किए गए. अब सवाल यह है कि ये तीन वर्ग चुनाव में इतना असर क्यों डाल सकते हैं?

क्यों असर डालते हैं ये वर्ग?

इसकी सबसे बड़ी वजह इनका सीधा जुड़ाव घर की अर्थव्यवस्था, खेती, रोजमर्रा की जरूरतों और सरकारी योजनाओं से है.गृहिणी के लिए राशन, महंगाई, गैस, परिवार की आमदनी और सरकारी मदद जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं. किसान और मजदूर के लिए फसल का दाम, रोजगार, खेती की लागत और आय से जुड़े सवाल ज्यादा मायने रखते हैं. बुजुर्गों के लिए घर की सुरक्षा, सरकारी सहायता और परिवार की आर्थिक स्थिति जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हो सकते हैं.

CSDS के 2022 सर्वे में महंगाई को लेकर 63.4 प्रतिशत वैध उत्तरदाताओं ने कहा कि इसका उनके मतदान फैसले पर बहुत या काफी असर पड़ा. विकास के मुद्दे पर यह आंकड़ा 73.8 प्रतिशत और बेरोजगारी पर करीब 70.7 प्रतिशत रहा. यानी वोटर के फैसले में सीधे जीवन से जुड़े मुद्दों की बड़ी भूमिका थी.

चुनावी गणित में क्यों खास हैं ये तीन वर्ग?

  1. गृहिणियां: 30.2 प्रतिशत उत्तरदाता गृहिणी थीं, जो किसी भी चुनावी रणनीति के लिए बड़ा वोट बैंक बन सकता है.
  2. किसान और मजदूर: किसान, खेतिहर मजदूर और सामान्य मजदूरों को जोड़ने पर हिस्सेदारी करीब 29.4 प्रतिशत बैठती है.
  3. घर पर रहने वाले बुजुर्ग: सर्वे में 7.7 प्रतिशत लोगों ने खुद को घर पर रहने वाले बुजुर्ग के रूप में बताया.
  4. GenZ की तुलना: सर्वे में 25 साल तक की उम्र वाले उत्तरदाता 12.3 प्रतिशत थे.

यूपी का असली वोट गणित

गृहिणियों के हाथ में घर की राय का असर

राजनीतिक दलों के लिए महिलाओं का वोट लगातार महत्वपूर्ण होता गया है. गृहिणियां खुद चुनाव में वोट डालने के साथ परिवार के भीतर मुद्दों पर चर्चा और राय बनाने में भी भूमिका निभा सकती हैं. हालांकि यह कहना सही नहीं होगा कि हर महिला एक ही मुद्दे पर या एक ही पार्टी को वोट देती है. फिर भी घरेलू खर्च और परिवार की जरूरतों से जुड़े सवाल उनके लिए सीधे महत्व रखते हैं.

2022 के सर्वे में मुफ्त राशन का लाभ मिलने की बात भी बड़ी संख्या में लोगों ने बताई. 28.8 प्रतिशत ने राज्य सरकार, 16.6 प्रतिशत ने केंद्र और 28.5 प्रतिशत ने दोनों सरकारों से मुफ्त राशन मिलने की बात कही. इससे समझ आता है कि कल्याणकारी योजनाएं मतदाताओं के अनुभव का हिस्सा बन चुकी थीं.

किसानमजदूर: चुनाव की जमीन से जुड़ा वर्ग

उत्तर प्रदेश की राजनीति में किसान और मजदूर हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं. CSDS के आंकड़ों में 13.6 प्रतिशत लोग किसान, 8.4 प्रतिशत भूमिहीन कृषि मजदूर और 7.4 प्रतिशत सामान्य मजदूर बताए गए हैं. इन तीनों को जोड़ने पर यह करीब 29.4 प्रतिशत बैठता है.

किसानों के लिए फसल का दाम और खेती की स्थिति जैसे सवाल भी चुनावी फैसले से जुड़े रहे हैं. सर्वे में किसानों से जब सरकारी तय फसल कीमतों को लेकर पूछा गया तो 21.7 प्रतिशत पूरी तरह और 18.5 प्रतिशत कुछ हद तक संतुष्ट थे, जबकि 12.6 प्रतिशत कुछ हद तक और 29.6 प्रतिशत पूरी तरह असंतुष्ट थे.

गृहिणी, किसानमजदूर और बुजुर्ग क्यों अहम?

यही कारण है कि किसान और मजदूर वर्ग को साधने के लिए राजनीतिक दल सिर्फ बड़ी रैलियों पर निर्भर नहीं रह सकते. उन्हें रोजगार, फसल भुगतान, महंगाई और खेती से जुड़े स्थानीय सवालों पर भी बात करनी पड़ती है.

बुजुर्ग वोटर क्यों बन सकते हैं निर्णायक?

घर पर रहने वाले बुजुर्गों की हिस्सेदारी 7.7 प्रतिशत थी. यह वर्ग संख्या में भले गृहिणियों या किसानमजदूरों से छोटा हो, लेकिन परिवार के फैसलों में इसकी भूमिका कई जगह महत्वपूर्ण हो सकती है. इसके अलावा सर्वे में 56 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों की कुल हिस्सेदारी 19.2 प्रतिशत थी.

बुजुर्ग मतदाताओं के लिए सरकार का काम, सुरक्षा, परिवार की आर्थिक स्थिति और सरकारी योजनाओं का लाभ जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं. इसलिए किसी भी चुनाव में केवल युवा वोटर की चर्चा करना पूरी तस्वीर नहीं बताता.

GenZ महत्वपूर्ण, लेकिन पूरी कहानी नहीं

25 साल तक की उम्र वाले उत्तरदाता सर्वे में 12.3 प्रतिशत थे. इसका मतलब यह नहीं कि युवा वोटर महत्वपूर्ण नहीं हैं. सोशल मीडिया, रोजगार, शिक्षा और भविष्य से जुड़े मुद्दों पर युवाओं की भूमिका अहम है. लेकिन आंकड़े यह भी बताते हैं कि चुनावी गणित को समझने के लिए युवा वर्ग के साथ उन लोगों को देखना जरूरी है जो परिवार की रोजमर्रा की अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े हैं.

एक और अहम बात यह है कि 2022 के सर्वे में 70 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने कहा कि वोट तय करते समय उन्होंने उम्मीदवार के बजाय पार्टी को ज्यादा महत्व दिया. यानी सामाजिक वर्गों के साथ पार्टी की रणनीति और मुद्दों की भूमिका भी चुनावी परिणाम पर असर डाल सकती है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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