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Face Transplant: टिश्यू ही नहीं, नसें तक नई… डॉक्टर कैसे बदल देते हैं पूरा चेहरा, एसिड अटैक पीड़ितों के लिए वरदान है ये सर्जरी

Face Transplant: टिश्यू ही नहीं, नसें तक नई… डॉक्टर कैसे बदल देते हैं पूरा चेहरा, एसिड अटैक पीड़ितों के लिए वरदान है ये सर्जरी
Face Transplant: टिश्यू ही नहीं, नसें तक नई... डॉक्टर कैसे बदल देते हैं पूरा चेहरा, एसिड अटैक पीड़ितों के लिए वरदान है ये सर्जरी

फेस ट्रांसप्लांट

आपने किडनी, लिवर और हार्ट ट्रांसप्लांट के बारे में तो सुना होगा ही, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन अंगों की तरह ही चेहरे का ट्रांसप्लांट भी हो सकता है. इसको मेडिकल की भाषा में फेस ट्रांसप्लांट कहते हैं. इसमें किसी दुर्घटना, हादसे में खराब हुए चेहरे को पूरा या आंशिक रूप से बदल दिया जाता है. यह सुविधा दुनिया के चुनिंदा अस्पतालों में है. भारत में भी कुछ अस्पतालों को ही सरकार ने फेस ट्रांसप्लांंट की अनुमति दी है. इसमें खर्च भी करोड़ों रुपये तक का है. लेकिन अब दिल्ली एम्स मरीजों के लिए इसको शुरू कर रहा है. जहां इलाज का खर्च लगभग शून्य ही होगा.

फेस ट्रांसप्लांट एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी व्यक्ति के चेहरे में डोनर ( डेड व्यक्ति) के चेहरे को लगाया जाता है. ये महज प्लास्टिक सर्जरी नहीं है. इसमें मरीज की स्किन से लेकर मांसपेशियां, नसें, खून की नसें और कभी-कभी हड्डियों से लेकर जबड़ा तक बदला जाता है .यह प्रोसीजर इतना मुश्किल होता है कि इसमें 20 घंटे तक का समय भी लग सकता है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि ट्रांसप्लांट चेहरे के कितने हिस्से का हो रहा है. फेस ट्रांसप्लांट मुख्य तौर पर उन लोगों का होता है जिनका चेहरा आग, तेजाब, गोली लगने या किसी सड़क दुर्घटना में बुरी तरह खराब हो चुका होता है. ये प्रक्रिया काफी मुश्किल होती है और सामान्य प्लास्टिक सर्जरी से बिलकुल ही अलग है.

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(चेहरे का ट्रांसप्लांट)

फेस ट्रांसप्लांट और चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी में क्या अंतर है?

फेस ट्रांसप्लांट कुछ वैसा ही है जैसे किसी ऑर्गन का ट्रांसप्लांट किया जाता है. फेस ट्रांसप्लांट में भी एक डोनर ( ब्रेड डेड व्यक्ति) की जरूरत होती है. इसमें सर्जरी से मरीज के खराब हो चुके चेहरे की नसों तक को जोड़ दिया जाता है. जबकि प्लास्टिक सर्जरी में सिंथेटिक मैटेरियल का इस्तेमाल करके चेहरे की बनावट को ही सुधारा जाता है, जैसे किसी की नाक की शेप खराब है तो उसको ठीक कर दिया या किसी के होंथ की शेप खराब है तो वह ठीक हो गई. इसमें चेहरे को बदला नहीं जाता है.

प्लास्टिक सर्जरी में कभी भी चेहरे की हड्डियों या टिश्यू को नहीं बदला जाता है. फेस ट्रांसप्लांट में खराब हो चुके चेहरे को नए चेहरे से बदल दिया जाता है, जबकि प्लास्टिक सर्जरी में मूल बनावट में हल्का सुधार होता है. प्लास्टिक सर्जरी फेस ट्रांसप्लांट की तुलना में काफी आसानी से हो जाती है.

दुनिया में कब हुआ था पहला फेस ट्रांसप्लांट?

दुनिया का पहला आंशिक फेस ट्रांसप्लांट नवंबर 2005 में फ्रांस के एमिएन्स-पिकार्डी विश्वविद्यालय अस्पताल में इसाबेल डिनोइरे पर किया गया था.15 घंटे के सर्जिकल ऑपरेशन में एक ब्रेड डेड व्यक्ति के नाक, होंठ और ठोड़ी को मरीज में ट्रांसप्लांट किया गया था. दुनिया का पहला पूरा फेस ट्रांसप्लांट साव 2010 में स्पेन के बार्सिलोना में वल डी’हेब्रोन विश्वविद्यालय अस्पताल की एक टीम ने किया था. भारत की बात करें तो यहां 2017 में Kochi के Amrita Institute of Medical Sciences में देश का पहला पूर्ण फेस ट्रांसप्लांट हुआ था.

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(ट्रांसप्लांट के बाद ऐसे बदल जाता है चेहरा)

फेस ट्रांसप्लांट कैसे होता है?

फेस ट्रांसप्लांट एक ऐसी सर्जरी है जिसमें एनेस्थिसियोलॉजी, पेन मेडिसिन एंड क्रिटिकल केयर, एनाटॉमी, ओरल एंड मैक्सिलोफेशियल सर्जरी, ऑर्गन रिट्रीवल बैंकिंग ऑर्गनाइजेशन (ओआरबीओ), ओटोरिनोलैरिंगोलॉजी, पैथोलॉजी, प्लास्टिक, रिकंस्ट्रक्टिव एंड बर्न्स सर्जरी, साइकियाट्री, सर्जिकल डिसिप्लिन, ट्रांसप्लांट इम्यूनोलॉजी के विशेषज्ञ डॉक्टर अलग- अलग तरीकों से शामिल होते हैं.यह सर्जरी 10 से 30 घंटे तक भी चल सकती है.

फेस ट्रांसप्लांट के लिए एक ब्रेड डेड डोनर चाहिए होता है, जिसका चेहरा मरीज की फेस से हल्का मिलता हो. इसके बाद डोनर के चेहरे से स्किन और नसों का निकाला जाता है. फिर सर्जरी करके मरीज के चेहरे के खराब हिस्से को पहले हटाते हैं और इसके बाद डोनर के टिश्यू से लेकर अन्य हिस्सों को मरीज के चेहरे में ट्रांसप्लांट करते हैं. इसमें मांसपेशियां (Muscles) का ट्रांसप्लांट इसलिए होता है ताकि मुस्कुरा सके, बोल सके, नसों की मदद सेमहसूस करने और चेहरे के भाव लौटाने में मदद मिलती हैं और खून की नसों से ब्लड का फ्लो चेहरे पर बना रहता है.

क्यों मुश्किल होता है फेस ट्रांसप्लांट

एम्स में सर्जरी विभाग में हेड और प्रोफेसर डॉ सुनील चुम्बर बताते हैं कि शरीर का इम्यून सिस्टम किसी दूसरे के चेहरे के टिश्यू को रिजेक्ट कर सकता है. इस कारण इस सर्जरी में काफी रिस्क होता है. सर्जरी के बाद मरीज को एंटी रिजेक्शन ड्रग्स दिए जाते हैं. अगर रिजेक्शन कंट्रोल नहीं होता है तो मरीज के लिए जानलेवा भी हो सकता है. यही कारण है कि फेस ट्रांसप्लांट काफी मुश्किल होता है और दुनियाभर में आजतक केवल 50 ट्रांसप्लांट ही हो पाए हैं.

क्या पूरा चेहरा ही डोनर जैसा दिखने लगता है

ऐसा नहीं है कि फेस ट्रांसप्लांट में किसी व्यक्ति का पूरा चहरा ही डोनर जैसा नहीं दिखता है. यह मिक्स होता है. कुछ हिस्सा ओरिजनल होता है और कुछ डोनर जैसा दिखता है.

एम्स में कैसे मिलेगी ये सुविधा

एम्स में फेस ट्रांसप्लांट के लिए पहले मरीज को अपना रजिस्ट्रेशन कराना होगा. इसके बाद जब भी कोई डोनर होगा तब सर्जरी के लिए डेट मिलेगी. उससे पहले कई तरह के टेस्ट होंगे, जिनकी रिपोर्ट सही आने के बाद ही आगे का प्रोसीजर किया जाएगा.

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