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शेयर बाजार में 20 साल का सबसे बड़ा मौका, बेहद सस्ते हुए इन टॉप कंपनियों के शेयर​

भारतीय शेयर बाजार में इस वक्त एक बेहद दिलचस्प स्थिति बन रही है. पिछले दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारत की टॉप 10 सबसे बड़ी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी सबसे निचले स्तर पर कर दी है. यह हिस्सेदारी साल 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के समय से […]

भारतीय शेयर बाजार में इस वक्त एक बेहद दिलचस्प स्थिति बन रही है. पिछले दो दशकों में ऐसा पहली बार हुआ है जब विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारत की टॉप 10 सबसे बड़ी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी सबसे निचले स्तर पर कर दी है. यह हिस्सेदारी साल 2008 के वैश्विक आर्थिक संकट के समय से भी नीचे जा चुकी है. बाजार के जानकारों की मानें तो यह पैसा बनाने का एक बड़ा मौका है. दिग्गज कंपनियों के शेयर इस वक्त अपनी लंबी अवधि की औसत वैल्यूएशन से भी काफी सस्ते मिल रहे हैं. आइए समझते हैं कि विदेशी निवेशकों की इस बिकवाली से आपके लिए निवेश का क्या गणित बन रहा है.

दिग्गज शेयरों में विदेशी निवेश का सूखा

डीएसपी म्यूचुअल फंड के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत की टॉप 10 लिस्टेड कंपनियों में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर उनके फ्रीफ्लोट मार्केट कैप का मात्र 34 प्रतिशत रह गई है. इसका सीधा असर बाजार के आकार पर भी दिख रहा है. कुल मार्केट कैप में इन टॉप 10 कंपनियों की हिस्सेदारी भी घटकर 17 प्रतिशत पर आ गई है, जो दिसंबर 2019 में 39 प्रतिशत के उच्चतम स्तर पर थी. आंकड़ों के मुताबिक, एक्सिस बैंक में विदेशी हिस्सेदारी जून 2014 के 68 प्रतिशत से गिरकर मार्च 2026 में 44 प्रतिशत रह गई है. इसी तरह कोटक महिंद्रा बैंक में यह 59 से 36 प्रतिशत, टीसीएस में 63 से 34 प्रतिशत और एचडीएफसी बैंक में 44 से 38 प्रतिशत पर आ गई है. रिलायंस और आईसीआईसीआई बैंक में भी विदेशी निवेश में कमी दर्ज की गई है.

डिस्काउंट पर मिल रहे क्वालिटी शेयर

माना जाता है कि जब बाजार में कोई अच्छी चीज सस्ती मिलती है, तो उसे खरीदने का यह सही वक्त होता है. इस वक्त निफ्टी टॉप 10 इक्वल वेट इंडेक्स की हर कंपनी पिछले 10 साल के अपने औसत वैल्यूएशन से नीचे या उसके बराबर ट्रेड कर रही है. उदाहरण के लिए, इन्फोसिस का पीई रेशियो 13.5 गुना है, जबकि इसका 10 साल का औसत 23.3 गुना रहा है. टीसीएस का पीई भी 26.9 के ऐतिहासिक औसत के मुकाबले 14 पर आ गया है. एचडीएफसी बैंक और भारती एयरटेल जैसे दिग्गज शेयर भी अपनी औसत वैल्यू से काफी सस्ते में उपलब्ध हैं. खास बात यह है कि कम कीमत के बावजूद इनमें से 70 प्रतिशत कंपनियों का रिटर्न ऑन इक्विटी 10 साल के औसत से ज्यादा है. टीसीएस का ROE 52 प्रतिशत और इन्फोसिस का 32 प्रतिशत है, जो इनकी बुनियादी मजबूती दर्शाता है.

भीड़ से अलग चलने का दांव

ग्लोबल मार्केट में भी भारतीय बाजार इस वक्त एक ‘कॉन्ट्रारियन बेट’ के रूप में उभर रहा है. इमर्जिंग मार्केट्स इंडेक्स में केवल भारत और चीन ही अपने 10 साल के औसत पीई से डिस्काउंट पर मिल रहे हैं, जबकि ताइवान और दक्षिण कोरिया काफी महंगे हो चुके हैं. डीएसपी म्यूचुअल फंड के रणनीतिकार साहिल कपूर का मानना है कि रुपये की स्थिति सुधरने और भूराजनीतिक तनाव कम होने के बाद विदेशी निवेशक एक बार फिर इन बड़े शेयरों की ओर लौटेंगे. शेयर बाजार के दिग्गज फंड मैनेजर प्रशांत जैन का भी तर्क है कि विदेशी बिकवाली की सबसे ज्यादा मार लार्जकैप शेयरों ने झेली है. ऐसे में जब बाजार का रुख बदलेगा, तो लार्जकैप शेयर, स्मॉलकैप के मुकाबले कहीं बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, क्योंकि दिग्गज कंपनियों की आय में स्थिरता होती है.

निवेशकों को अब क्या करना चाहिए

अब सवाल यह है कि एक निवेशक को इस स्थिति में क्या करना चाहिए. क्वांटम एएमसी के इक्विटी फंड मैनेजर जॉर्ज थॉमस सलाह देते हैं कि छोटी अवधि में भले ही बाजार में उतारचढ़ाव रहे, लेकिन लंबी अवधि में अच्छे बिजनेस की वैल्यू नहीं घटती. निवेशकों को इन सस्ते वैल्युएशन का फायदा उठाने के लिए किस्तों में निवेश करने पर विचार करना चाहिए. वहीं, एक्सिस सिक्योरिटीज ने स्मॉल और मिड कैप शेयरों को लेकर सतर्क किया है. उनका मानना है कि छोटी कंपनियों में मूल्यांकन काफी ऊंचे हैं और वहां गलती की गुंजाइश कम है.

Disclaimer: ये आर्टिकल सिर्फ जानकारी के लिए है और इसे किसी भी तरह से इंवेस्टमेंट सलाह के रूप में नहीं माना जाना चाहिए. TV9 भारतवर्ष अपने पाठकों और दर्शकों को पैसों से जुड़ा कोई भी फैसला लेने से पहले अपने वित्तीय सलाहकारों से सलाह लेने का सुझाव देता है.
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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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