
आज यानी 25 जुलाई 2026 को देवशयनी एकादशी का व्रत रखा जा रहा है। आज के दिन से भगवान विष्णु योग निद्रा में चले जाते हैं और इस दिन चातुर्मास की शुरुआत होती है। चातुर्मास की अवधि 4 महीने तक चलती है और इस दौरान किसी भी तरह के मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। क्योंकि भगवान विष्णु क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। जिसके बाद सृष्टि का सारा कार्यभार भगवान शिव संभालते हैं। आइए आपको इस लेख में देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व।
देवशयनी एकादशी का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी सिर्फ भगवान सोने का दिन नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मनुष्य को विश्राम और आत्ममंथन का संदेश देती है। जब जगत के स्वामी ठहरते हैं, तो हमें भी अपनी भागदौड़ रोककर भक्ति में लीन होना चाहिए।
इस तिथि का संबंध भगवान विष्णु के एक महान युद्ध और उसके बाद विश्राम की कथा से भी जुड़ा है। माना जाता है कि भगवान विष्णु शंखापुर नामक दैत्य का वध करने के बाद थककर चार महीने के लिए क्षीरसागर में सोने चले गए।
भगवान के इस शयन काल को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है, जिसके बाद से पूरे चार महीनों के लिए सृष्टि के संचालन की गति भी बदल जाती है और सांसारिक कार्यों पर विराम लग जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से क्यों खास है देवशयनी एकादशी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस समय का एक बहुत बड़ा मौसमी महत्व भी बताया गया है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण के मुताबिक यह वर्षा ऋतु का समय होता है, जब वातारण में नमी बढ़ने के कारण कई प्रकार की संक्रामक बीमारियां तेज से बढ़ जाती है। वैसे इस मौसम में शरीर की पाचन की शक्ति भी कमजोर हो जाती है। इसलिए माना जाता है कि इन 4 महीनों में व्रत रखने और संयमित जीवन जीने की सलाह दी जाती है ताकि हेल्थ ठीक बेहतर रहे।
किन चीजों का परहेज करें
चातुर्मास में खानपान और जीवनशैली में कुछ खास नियमों का पालन करना बेहद जरुरी है।
तामसिक भोजन जैसे कि मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन से दूरी बना लें।
गौरतलब है कि सावन में री पत्तेदार सब्जियों से परहेज, भाद्रपद में दही का त्याग, आश्विन में दूध का सेवन कम करना और कार्तिक में कुछ दालों का सेवन न करना।
क्या करना अनिवार्य है?
इस दौरान भूमि पर शयन, ब्रह्मचर्य का पालन, सत्य बोलना और मौन रहना सबसे जरुरी है।
चातुर्मास में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, जनेऊ संस्कार और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे कार्य वर्जित होते हैं। इस दौरान भूलकर भी न करें।
इस अवधि में व्यक्ति को अनुशासन, संयम और आध्यात्मिक उन्नति के रास्ते में जरुर जाना चाहिए।