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EU से डील और मर्कसुर असर, भारत के लिए खुल सकता है 5 अरब डॉलर का नया बाजार

EU से डील और मर्कसुर असर, भारत के लिए खुल सकता है 5 अरब डॉलर का नया बाजार
EU से डील और मर्कसुर असर, भारत के लिए खुल सकता है 5 अरब डॉलर का नया बाजार

इंडिया-यूरोपीय यूनियन के बीच डील

भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच संभावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट देश के लिए एक बड़ा गेमचेंजर साबित हो सकता है. मौजूदा वैश्विक ट्रेड हालात भारत के पक्ष में बनते दिख रहे हैं और अगर डील सही तरीके से लागू हुई, तो भारत करीब 5 अरब डॉलर के नए एक्सपोर्ट मौके हासिल कर सकता है. यह फायदा ऐसे समय में मिल सकता है जब यूरोप अपने पुराने ट्रेड पार्टनर्स पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है.

दरअसल, EU और दक्षिण अमेरिका के मर्कसुर देशों के बीच हुए ट्रेड समझौते के बाद ट्रेड बैलेंस में बदलाव देखने को मिल रहा है. इसी बीच भारत EU के साथ एक व्यापक ट्रेड एग्रीमेंट को अंतिम रूप देने के करीब है. भारत EU के साथ एक कॉम्प्रिहेंसिव ट्रेड एग्रीमेंट पर एडवांस्ड बातचीत कर रहा है, जिसे उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ब्लॉक के लिए एक प्रायोरिटी एंगेजमेंट बताया है. यह टाइमिंग महत्वपूर्ण है.

ऐसे होगा फायदा

जैसे-जैसे EU अपने ट्रेड संबंधों को रीबैलेंस कर रहा है और सप्लायर्स के एक सीमित सेट पर बहुत ज्यादा निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है, कॉम्पिटिटिव डायनामिक्स बदल रहे हैं, जिससे भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए उन क्षेत्रों में मौके बन रहे हैं जहां अभी मर्कसुर देश हावी हैं. यूरोप अब अपनी सप्लाई चेन को ज्यादा सुरक्षित और विविध बनाना चाहता है. किसी एक रीजन पर ज्यादा निर्भर रहने की बजाय EU नए भरोसेमंद सप्लायर्स की तलाश में है. भारत इस जरूरत पर बिल्कुल फिट बैठता है.

कृषि और फूड सेक्टर में खुलेंगे बड़े दरवाजे

इस डील का सबसे बड़ा फायदा एग्रीकल्चर और फूड प्रोडक्ट्स को मिल सकता है. अभी तक भारतीय उत्पादों को यूरोप में ऊंचे टैरिफ और कड़े नियमों का सामना करना पड़ता है, लेकिन ट्रेड एग्रीमेंट के बाद हालात बदल सकते हैं. फ्रोजन झींगा भारत के लिए बड़ा अवसर बनकर उभर रहा है. यूरोप में इस कैटेगरी की मांग बहुत ज्यादा है और भारत को यहां करीब 50 करोड़ डॉलर से ज्यादा के बाजार तक पहुंच मिल सकती है. इसके अलावा, अंगूर जैसे फलों में भी भारत की पकड़ मजबूत हो सकती है, जहां लाखों डॉलर का एक्सपोर्ट संभावित है.

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मिलेगा बूस्ट

सिर्फ खाना ही नहीं, बल्कि गारमेंट्स, लेदर प्रोडक्ट्स और लाइट इंजीनियरिंग जैसे सेक्टरों को भी इस डील से फायदा मिल सकता है. मर्कसुर देशों की तुलना में भारत के पास बेहतर स्केल, अनुभवी वर्कफोर्स और अपेक्षाकृत कम लॉजिस्टिक्स लागत है. अगर EU अपनी सोर्सिंग पॉलिसी में थोड़ा सा भी बदलाव करता है और भारत के साथ डील से टैरिफ कम होते हैं तो भारतीय फैक्ट्रियों के लिए नए ऑर्डर्स की बाढ़ आ सकती है. इससे रोजगार और घरेलू उत्पादन दोनों को मजबूती मिलेगी.

केमिकल्स और इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स में भारत को बढ़त

यूरोप पर्यावरण और सस्टेनेबिलिटी नियमों को लेकर काफी सख्त है. इन नियमों के चलते कुछ दक्षिण अमेरिकी सप्लायर्स की लागत बढ़ सकती है. वहीं, भारत पहले से ही कई ग्लोबल मानकों के अनुसार खुद को ढाल रहा है, जिससे केमिकल्स और इंडस्ट्रियल इंटरमीडिएट्स में उसकी स्थिति मजबूत हो सकती है.

भारत के लिए बड़ा मौका

कुल मिलाकर भारत के लिए यह मौका करीब 5 अरब डॉलर के ट्रेड को अपनी ओर मोड़ने का है. हालांकि यह फायदा अपने आप नहीं मिलेगा. सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत-EU ट्रेड डील को कैसे डिजाइन किया जाता है और जमीन पर कितनी प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है. अगर सरकार और इंडस्ट्री मिलकर सही रणनीति अपनाते हैं, तो यह डील ऐसे वक्त पर भारत के एक्सपोर्ट सेक्टर को रफ्तार दे सकती है, जब यूरोप अपने ट्रेड पार्टनर्स को लेकर नए सिरे से सोच रहा है.

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