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बिहार में स्कूली छात्रों की अपार आईडी (Automated Permanent Academic Account Registry) को लेकर बड़ी चिंता सामने आई है. राज्य में करोड़ों बच्चों का शैक्षणिक रिकॉर्ड डिजिटल रूप से सुरक्षित करने के लिए यह आईडी जरूरी मानी जा रही है, लेकिन इसके निर्माण की रफ्तार बेहद धीमी है. बिहार शिक्षा परियोजना परिषद की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, लाखों छात्रों की अब तक अपार आईडी नहीं बन पाई है. दूसरी ओर, सीबीएसई ने अपार आईडी को अनिवार्य कर दिया है, जिससे बिहार के छात्रों और स्कूलों पर दबाव बढ़ गया है.
बिहार शिक्षा परियोजना परिषद ने राज्य में अपार आईडी निर्माण की धीमी प्रगति पर गहरी नाराजगी जताई है. परिषद ने सभी जिला शिक्षा पदाधिकारियों को इस मामले में फटकार लगाते हुए तेजी लाने के निर्देश दिए हैं. जारी पत्र में बताया गया है कि वर्ष 2025 में राज्य के केवल 58.50 प्रतिशत छात्रों की ही अपार आईडी बन पाई है. इसका मतलब है कि अभी भी लगभग 85 लाख बच्चों का अपार आईडी निर्माण होना बाकी है, जो शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है.
अपार आईडी निर्माण की रफ्तार बेहद धीमी
परियोजना परिषद की रिपोर्ट के अनुसार, 30 दिसंबर 2025 से 5 जनवरी 2026 के बीच पूरे बिहार में सिर्फ 11,410 अपार आईडी ही बनाई जा सकीं. परिषद ने इस आंकड़े को खेदजनक बताया है. खासतौर पर कुछ जिलों में स्थिति और भी खराब है. समस्तीपुर, मधुबनी, खगड़िया, पूर्णिया, शेखपुरा, नालंदा, रोहतास, अरवल और कैमूर जैसे जिलों में एक सप्ताह में 100 से भी कम बच्चों की अपार आईडी बन पाई. यह दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर काम की गति बेहद सुस्त है.
क्या है अपार आईडी और क्यों जरूरी?
अपार आईडी का मकसद छात्रों से जुड़ा शैक्षणिक डेटा एक जगह सुरक्षित रखना है, ताकि नीति निर्माण, योजना और विश्लेषण बेहतर तरीके से किया जा सके. यह व्यवस्था राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत लागू की गई है. शिक्षा मंत्रालय और केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से जुड़े स्कूलों को निर्देश दिए गए हैं कि वे सभी छात्रों का अपार आईडी पंजीकरण सुनिश्चित करें. सीबीएसई ने इसे अनिवार्य भी कर दिया है.
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