
भीष्म अष्टमी व्रत कथाImage Credit source: AI ChatGpt
Bhishma Ashtami Vrat Katha: हर साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्म अष्टमी के रूप में मनाया जाता है. आज भीष्म अष्टमी मनाई जा रही है. इसका संबंध महाभारत काल के पितामह भीष्म से है. मान्यता है कि माघ माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन ही उन्होंने प्राण त्यागे थे. उनकी पुण्य तिथि के रूप में भीष्म अष्टमी मनाई जाती है. सनातन धर्म में इसे बेहद ही भाग्यशाली दिन माना जाता है.
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भीष्म अष्टमी का दिन पितृ दोष को समाप्त करने का उत्तम दिन होता है. इस दिन लोग संतान प्राप्ति के लिए व्रत भी रखते हैं. संतानविहिन दंपत्ति को इस व्रत से लाभ मिलता है. माना जाता है कि भीष्म पितामह के दिव्य आशीर्वाद से संतानविहिन दंपत्तियों को अच्छे चरित्र वाली और आज्ञाकारी संतान प्राप्त होती है. इस दिन पितरों का तर्पण किया जाता है. पूजा के समय व्रत कथा का पाठ अवश्य किया जाता है. ऐसे में आइए पढ़ते हैं व्रत कथा.
भीष्म अष्टमी की व्रत कथा (Bhishma Ashtami Vrat Katha)
पौराणिक कथा के अनुसार, पितामह भीष्म हस्तिनापुर के महाराज शांतनु और मां गंगा के आठवें पुत्र थे. उनका नाम देवव्रत था. देवव्रत का पालन-पोषण माता गंगा ने किया. बाद में उन्होंने महर्षि परशुराम से शास्त्र विद्या और गुरु बृहस्पति से राजनीति का ज्ञान हासिल किया. शिक्षा पूरी करने के बाद, मां गंगा ने देवव्रत को उनके पिता महाराज शांतनु को सौंप दिया. फिर उन्हें हस्तिनापुर का राजकुमार घोषित कर दिया गया.
इसी दौरान राजा शांतनु सत्यवती नाम की एक महिला को अपना ह्रदय दे बैठे, लेकिन सत्यवती के पिता ने शर्त रख दी कि उनकी पुत्री का पुत्र ही हस्तिनापुर की राजगद्दी पर बैठेगा. स्थिति को देखते हुए देवव्रत ने अपने पिता के लिए अपना राज्य छोड़ दिया और अपनी पिता की खुशी के लिए उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा कर ली. इस कठोर प्रतिज्ञा की वजह से ही उनको भीष्म के नाम से जाना गया.
उनकी प्रतिज्ञा संसार में भीष्म प्रतिज्ञा के नाम से प्रसिद्ध हुई. यह सब देखकर, राजा शांतनु भीष्म से बहुत प्रसन्न हुए और उनको इच्छा मृत्यु का वरदान दे दिया. यानी जब तक भीष्म न चाहें मृत्यु उनके पास नहीं आ सकती थी. महाभारत के युद्ध में वो कौरवों के पहले प्रधान सेनापति थे. उनके नेतृत्व में कौरवों की सेना ने 10 दिनों तक युद्ध किया था.
अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके पितामह भीष्म पर बाणों की वर्षा की थी. पितामह ने अर्जुन के आगे शिखंडी को देखकर शस्त्र इसलिए रख दिए थे, क्योंकि वो जानते थे कि शिखंडी एक नारी है. फिर बाद में भीष्म अर्जुन के बाणों से घायल होकर शय्या पर गिर पड़े थे, लेकिन उस समय सूर्य देव दक्षिणायन में थे, इसलिए पितामह भीष्म ने प्राण नहीं त्यागे थे.
पितामह भीष्म 58 दिनों तक बाणों की शय्या पर लेटे रहे और सूर्य देव के उत्तरायण आने का इंतजार किया था. उन्होंने माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन अपने प्राण त्यागे थे.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.






