
एआई ने बिगाड़ी आईटी कंपनियों के शेयर की चाल
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बढ़ते दखल ने अमेरिका से लेकर एशियाई बाजारों तक कोहराम मचा दिया है. शुक्रवार को भारतीय शेयर बाजार में जो भारी गिरावट देखने को मिली, उसके पीछे एक बड़ा डर छिपा है क्या एआई पारंपरिक आईटी कंपनियों की जगह ले लेगा? इसी आशंका के चलते आईटी सेक्टर के शेयरों में जबरदस्त बिकवाली हावी रही और निवेशकों के पोर्टफोलियो लाल निशान में डूब गए.
आईटी कंपनियों में एआई का डर
बाजार में इस समय सबसे बड़ी चर्चा इस बात की है कि एआई तकनीकी दुनिया का नक्शा बदल रहा है. निवेशकों के मन में यह आशंका घर कर गई है कि जो काम भारतीय आईटी कंपनियां भारी भरकम टीम, ज्यादा लागत और अधिक समय में करती हैं, वही काम एआई टूल्स अब चुटकियों में और बेहद कम खर्च में कर रहे हैं. यही कारण है कि टीसीएस (TCS), इंफोसिस (Infosys), टेक महिंद्रा और विप्रो जैसी दिग्गज कंपनियों के शेयरों में 6 फीसदी तक की बड़ी गिरावट दर्ज की गई. अमेरिका का नैसडैक इंडेक्स, जो आईटी शेयरों का प्रमुख सूचकांक है, वह भी 2 फीसदी से ज्यादा टूट गया.
इसका सीधा असर भारतीय बाजार पर दिखा. निफ्टी 50 ने 25,571 के स्तर पर गैप-डाउन ओपनिंग दी और देखते ही देखते 25,558 के निचले स्तर को छू लिया. सेंसेक्स का हाल भी कुछ ऐसा ही रहा; 82,902 पर खुलने के बाद यह लुढ़ककर 82,846 पर आ गया और कुछ ही देर में बाजार में 800 अंकों से ज्यादा की गिरावट आ गई. बाजार बंद होने तक और गिरवाट देखने को मिली. सेंसेक्स 1,048.16 प्लाइंट यानी (-1.25%) गिरकर 82,626.76 पर बंद हुआ. निफ्टी 336.11 (-1.30%) गिरकर 25,471.10 पर बंद हुई.
AI के अलावा इन वहजों से लाल हुआ बाजार
सिर्फ एआई ही नहीं, बल्कि बाजार की इस गिरावट के पीछे कुछ और भी महत्वपूर्ण कारण रहे हैं. मार्केट एक्सपर्ट अविनाश गोरक्षकर बताते हैं कि निफ्टी में आईटी कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 10 फीसदी है, इसलिए जब आईटी शेयर गिरते हैं, तो पूरा बाजार नीचे आता है. इसके अलावा, अमेरिका में आने वाले महंगाई के आंकड़ों (CPI Data) को लेकर भी निवेशक घबराए हुए हैं. एनालिस्ट अनुज गुप्ता का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था इस समय संघर्ष कर रही है और रूस, चीन व ब्राजील द्वारा डॉलर का वर्चस्व कम करने की कोशिशें भी निवेशकों की चिंता बढ़ा रही हैं.
मुनाफा वसूली से मार्केट में बना प्रेशर
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुई ट्रेड डील के बाद बाजार में जो उत्साह और तेजी आई थी, अब निवेशक उस पर मुनाफावसूली (Profit Booking) कर रहे हैं. इसके साथ ही, एक बड़ी चुनौती एक्सपोर्ट को लेकर सामने आ रही है. जानकारों का कहना है कि इस डील के बाद भारत का एक-तिहाई एक्सपोर्ट अब सिर्फ अमेरिका और चीन पर निर्भर हो गया है. चूंकि इन दोनों महाशक्तियों के बीच पहले से ही ट्रेड वॉर चल रहा है, ऐसे में भारत के लिए दोनों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा. इस भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर के मुकाबले रुपये में आई कमजोरी ने विदेशी निवेशकों के भरोसे को डगमगा दिया है, जिससे बाजार पर दबाव और बढ़ गया है.






