नई दिल्ली: BRICS आज उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं का एक प्रमुख मंच है, लेकिन इसकी कहानी एक दिन में नहीं बनी। इसकी शुरुआत आर्थिक विचार से हुई और धीरेधीरे यह राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के महत्वपूर्ण मंच में बदल गया। भारत की इसमें शुरुआत से अहम भूमिका रही है।

2001 में आया BRIC शब्द
सबसे पहले 2001 में Goldman Sachs के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने BRIC शब्द का इस्तेमाल ब्राजील, रूस, भारत और चीन जैसी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए किया था। उनका अनुमान था कि आने वाले दशकों में ये अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में बड़ी ताकत बनेंगी।
रूस ने भारत के सामने क्यों रखा विचार?
BRIC को केवल आर्थिक अवधारणा से आगे ले जाने की पहल रूस की तरफ से हुई। भारत और रूस के बीच पहले से मजबूत रणनीतिक संबंध थे और दोनों देश बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक प्रभावी भूमिका के पक्षधर रहे हैं। सितंबर 2006 में रूस की पहल पर BRIC देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में हुई और समूह को औपचारिक रूप देने की दिशा में कदम बढ़ा।
2006 से 2009 तक क्या हुआ?
2006 में रूस, भारत और चीन के नेताओं की सेंट पीटर्सबर्ग में G8 आउटरीच बैठक के दौरान मुलाकात हुई। उसी वर्ष न्यूयॉर्क में BRIC विदेश मंत्रियों की पहली बैठक ने सहयोग को औपचारिक आधार दिया। इसके बाद करीब तीन साल की तैयारी और बातचीत के बाद 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला BRIC शिखर सम्मेलन हुआ।
फिर BRIC से BRICS कैसे बना?
2010 में दक्षिण अफ्रीका को समूह में शामिल करने पर सहमति बनी। इसके बाद 2011 में सान्या शिखर सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका ने पूर्ण सदस्य के रूप में भाग लिया और BRIC का नाम BRICS हो गया।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
BRICS भारत को उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक सहयोग बढ़ाने और वैश्विक शासन व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने का मंच देता है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, BRICS में अब 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं और यह वैश्विक आबादी का लगभग 49.5%, वैश्विक GDP का करीब 40% और वैश्विक व्यापार का लगभग 26% प्रतिनिधित्व करता है।