: में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा डीएम के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई है। ये टिप्पणी दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा और एक्टिविस्ट आकृति चौधरी की NSA हिरासत के मामले में आई है।

‘पहली जिम्मेदारी संविधान के प्रति होनी चाहिए’
हाईकोर्ट ने कहा कि IAS और IPS अधिकारियों की पहली जिम्मेदारी संविधान के प्रति होनी चाहिए। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर अफसर अपनी शक्तियों का मनमाना इस्तेमाल करते रहे तो लोगों का प्रशासन से भरोसा कम हो सकता है।
आकृति चौधरी की हिरासत पर बड़ा फैसला
अदालत ने 2 सितंबर को आकृति चौधरी की NSA हिरासत रद्द कर दी थी। अब सामने आए 15 पेज के आदेश में कोर्ट ने पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर कई सवाल उठाए हैं। आकृति को अप्रैल 2026 में नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन से जुड़े मामले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया। कोर्ट ने कहा कि हिरासत के लिए पेश की गई सामग्री पर्याप्त नहीं थी और कार्रवाई में गंभीर कानूनी कमियां थीं।
सबूतों को लेकर पुलिस पर उठे सवाल
कोर्ट के मुताबिक आकृति के खिलाफ भीड़ को उकसाने या हिंसा में भूमिका निभाने का कोई ठोस सबूत रिकॉर्ड में नहीं मिला। पुलिस की ओर से ऐसा कोई भरोसेमंद मैसेज, वीडियो या ऑडियो पेश नहीं किया गया, जिससे आरोप साबित हो सकें। अदालत ने गिरफ्तारी के समय और रिकॉर्ड में अंतर को लेकर भी सवाल उठाए। इस मामले में नोएडा डीएम मेधा रूपम की जिम्मेदारी को अहम माना गया, क्योंकि NSA जैसे सख्त कानून में आदेश देने से पहले तथ्यों की पूरी जांच जरूरी होती है।
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डीएम के वेतन से मुआवजे का आदेश
अदालत ने आकृति चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस रकम की वसूली जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से की जाए। आदेश में SHO समेत संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने की बात भी कही गई है। साथ ही अधिकारियों के सर्विस रिकॉर्ड में कोर्ट की नाराजगी दर्ज करने का निर्देश दिया गया है। इस फैसले से नोएडा जिलाधिकारी के कामकाज पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं।
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संविधान के प्रति वफादारी जरूरी
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को मिली शक्तियां जनता के अधिकार, सम्मान और सुरक्षा की रक्षा के लिए हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस और नौकरशाही संविधान की जगह किसी और दबाव में काम करने लगी तो हालात खराब हो सकते हैं। अदालत ने इसे तानाशाही और निगरानी वाली व्यवस्था की ओर बढ़ने जैसा बताया। उत्तर प्रदेश के लिए यह टिप्पणी प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर एक कड़ा संदेश है।