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जंग के बमबारी मिशन में कैसे मौत को मात देकर लौटे थे नील आर्मस्ट्रॉन्ग? फिर चांद पर रखा कदम​

नील आर्मस्ट्रांग का नाम पूरी दुनिया बड़े गौरव से लेती है. वे चांद पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति थे. 20 जुलाई 1969 को उन्होंने चांद पर पहला कदम रखा था. पूरी दुनिया उन्हें एक महान अंतरिक्ष यात्री के रूप में जानती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अंतरिक्ष में जाने से पहले […]

नील आर्मस्ट्रांग का नाम पूरी दुनिया बड़े गौरव से लेती है. वे चांद पर कदम रखने वाले पहले व्यक्ति थे. 20 जुलाई 1969 को उन्होंने चांद पर पहला कदम रखा था. पूरी दुनिया उन्हें एक महान अंतरिक्ष यात्री के रूप में जानती है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि अंतरिक्ष में जाने से पहले वे नौसेना के जांबाज पायलट भी थे. उन्होंने अमेरिकी नौसेना की तरफ से एक भीषण युद्ध में भाग लिया था.

आइए, उनकी पुण्य तिथि के बहाने जानते हैं कि नील ने किस युद्ध में भाग लिया था? उन्हें बहादुरी के कितने पुरस्कार मिले थे? किस उम्र में वे फाइटर प्लेन उड़ाने लगे थे?

कोरियाई युद्ध में आर्मस्ट्रांग की एंट्री

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दुनिया में शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी. 1950 में उत्तर कोरिया ने दक्षिण कोरिया पर अचानक हमला कर दिया. संयुक्त राष्ट्र और संयुक्त राज्य अमेरिका ने दक्षिण कोरिया का साथ देने का फैसला किया. उस समय नील आर्मस्ट्रांग पर्ड्यू विश्वविद्यालय में वैमानिकी इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे. वे नौसेना छात्रवृत्ति योजना का हिस्सा थे, जिसके तहत उन्हें सैन्य सेवा देना अनिवार्य था. 1949 में आर्मस्ट्रांग ने नौसेना में उड़ान प्रशिक्षण शुरू किया था. अगस्त 1950 में उन्हें औपचारिक रूप से नौसेना एविएटर का बैज मिला. उस समय उनकी उम्र मात्र बीस वर्ष थी. इसके तुरंत बाद उन्हें सक्रिय युद्ध क्षेत्र में भेजने का आदेश मिला.

1949 में आर्मस्ट्रांग ने नौसेना में उड़ान प्रशिक्षण शुरू किया था. Photo: US Navy

लड़ाकू स्क्वाड्रन 51 और विमान वाहक पोत

नील आर्मस्ट्रांग को फाइटर स्क्वाड्रन 51 में तैनात किया गया. यह अमेरिकी नौसेना का एक प्रमुख जेट फाइटर स्क्वाड्रन था. उनके स्क्वाड्रन को विमान वाहक पोत यूएसएस एसेक्स पर तैनात किया गया था. यूएसएस एसेक्स कोरियाई प्रायद्वीप के पास समुद्र में तैनात था. वहां से अमेरिकी लड़ाकू विमान लगातार उड़ान भरकर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाते थे. आर्मस्ट्रांग ग्रुम्मन एफ9 एफ पैंथर नामक जेट विमान उड़ाते थे. यह विमान उस दौर के शुरुआती और बेहद शक्तिशाली लड़ाकू जेट विमानों में से एक था.

युद्ध में आर्मस्ट्रांग की भूमिका और मिशन

कोरियाई युद्ध के दौरान नील आर्मस्ट्रांग ने अत्यंत खतरनाक मिशनों को अंजाम दिया. उनका मुख्य काम टोही उड़ानों का संचालन करना और दुश्मन के जमीनी ठिकानों पर बमबारी करना था. वे उत्तर कोरियाई सेना के सप्लाई डिपो, रेल लाइनों, पुलों, सड़क संपर्कों और सैन्य चौकियों पर सटीक हमले करते थे. इन मिशनों का उद्देश्य उत्तर कोरियाई सेना की रसद आपूर्ति को पूरी तरह तोड़ना था. यह काम बेहद जोखिम भरा था क्योंकि जमीन से दुश्मन की एंटीएयरक्राफ्ट तोपें लगातार आग उगलती थीं.

नील आर्मस्ट्रांग अपने X151 हाइपरसोनिक रिसर्च एयरक्राफ्ट के साथ. फोटो: NASA

मौत को मात देने वाला खतरनाक हादसा

युद्ध के दौरान आर्मस्ट्रांग ने एक ऐसा भयानक हादसा झेला, जिसमें उनकी जान बालबाल बची. 3 सितंबर 1951 को वे एक खतरनाक कम ऊंचाई वाले बमबारी मिशन पर थे. वे वोनसान शहर के दक्षिण में स्थित मुख्य रेल मार्ग पर हमला कर रहे थे. जब वे करीब 350 मील प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भर रहे थे, तभी उनके विमान का दाहिना पंख जमीन पर लगे एक एंटीएयरक्राफ्ट केबल से टकरा गया. इस टक्कर से उनके जेट का लगभग छह फीट पंख कटकर अलग हो गया. विमान का संतुलन बिगड़ गया और वह तेजी से नीचे गिरने लगा. आर्मस्ट्रांग ने अविश्वसनीय धैर्य और तकनीकी कौशल दिखाया. उन्होंने क्षतिग्रस्त विमान को दुश्मन के इलाके से बाहर निकाला और सुरक्षित समुद्री क्षेत्र की ओर ले गए. जब विमान को नियंत्रित करना असंभव हो गया, तब उन्होंने सुरक्षित रूप से खुद को विमान से इजेक्ट किया. वे जमीन पर उतरे और कुछ ही देर में अमेरिकी नौसेना के बचाव हेलीकॉप्टर ने उन्हें सुरक्षित बचा लिया.

चांद पर पहला कदम रखा. फोटो: NASA

युद्ध का रिकॉर्ड और मिले अनेक सम्मान

नील आर्मस्ट्रांग ने कोरियाई युद्ध में कुल 78 युद्धक मिशन पूरे किए. उन्होंने युद्ध क्षेत्र में 120 से अधिक घंटे हवा में बिताए. उनका आखिरी मिशन 5 मार्च 1952 को हुआ था. उनके असाधारण साहस, निष्ठा और उत्कृष्ट युद्ध कौशल के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सैन्य पदकों से सम्मानित किया गया.

  • एयर मेडल: युद्ध में 20 सफल कॉम्बैट मिशन पूरे करने के लिए.
  • गोल्ड स्टार्स: अगले सफल मिशनों और असाधारण सेवा के लिए.
  • कोरियाई सेवा पदक: कोरियाई संघर्ष में महत्वपूर्ण योगदान के लिए.
  • संयुक्त राष्ट्र सेवा पदक: संयुक्त राष्ट्र की ओर से अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा में सहयोग के लिए.

चांद पर उतरने के बाद की तस्वीर.

नौसेना से नासा तक का रोमांचक सफर

युद्ध समाप्त होने के बाद आर्मस्ट्रांग ने अपनी अधूरी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद वे नेशनल एडवाइजरी कमेटी फॉर एरोनॉटिक्स में शामिल हुए, जो बाद में नासा बनी. वे एक शीर्ष परीक्षण पायलट बने और उन्होंने अत्याधुनिक रॉकेट विमान उड़ाए. कोरियाई युद्ध में मिले दबाव प्रबंधन, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और संकट के समय शांत रहने के अनुभव ने उन्हें नासा के सबसे बेहतरीन अंतरिक्ष यात्रियों में शामिल किया. इन्हीं खूबियों के कारण नासा ने उन्हें ऐतिहासिक अपोलो 11 मिशन का कमांडर चुना.

5 अगस्त 1930 को अमेरिका में पैदा हुए नील आर्मस्ट्रांग की पहचान केवल अंतरिक्ष यात्री तक सीमित नहीं थी. वे एक अनुशासित सैनिक और सच्चे देशभक्त भी थे. चांद पर मानवता की एक बड़ी छलांग लगाने से पहले उन्होंने कोरिया के युद्ध मैदान में अपने जीवन को दांव पर लगाया था. कोरियाई युद्ध में झेली गई चुनौतियों ने ही उनके व्यक्तित्व को वह मजबूती दी, जिसने आगे चलकर उन्हें ब्रह्मांड के सबसे कठिन मिशन को सफल बनाने के योग्य बनाया. 25 अगस्त 1912 को उन्होंने अमेरिका के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली. उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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