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फिर भड़के कच्चे तेल के दाम! क्या 100 डॉलर के करीब पहुंच जाएगा क्रूड?​

कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है. ब्रेंट क्रूड फिर से 8788 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो आने […]

कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी देखने को मिल रही है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक तेल बाजार की चिंता बढ़ा दी है. ब्रेंट क्रूड फिर से 8788 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात नहीं सुधरे तो आने वाले दिनों में कीमतें 95 डॉलर प्रति बैरल या उससे भी ऊपर जा सकती हैं. इसका सीधा असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों की अर्थव्यवस्था, महंगाई, रुपये और शेयर बाजार पर पड़ सकता है.

शांति समझौते की राहत ज्यादा दिन नहीं चली

कुछ समय पहले अमेरिका और ईरान के बीच हुए अंतरिम शांति समझौते के बाद उम्मीद जगी थी कि कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट बनी रहेगी. अप्रैल में युद्ध के दौरान ब्रेंट क्रूड 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, लेकिन बाद में इसमें करीब 42% की गिरावट आई. हालांकि, दोनों देशों के बीच फिर से सैन्य कार्रवाई शुरू होने और तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों ने दोबारा तेजी पकड़ ली है.

95 डॉलर तक जा सकता है कच्चा तेल

JM Financial के कमोडिटी विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल युद्धविराम के संकेत नहीं दिख रहे हैं. ऐसे में ब्रेंट क्रूड निकट भविष्य में 70 से 95 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रह सकता है. यदि मध्य पूर्व में संघर्ष और बढ़ता है या होरमुज जलडमरूमध्य से तेल की सप्लाई प्रभावित होती है, तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार भी जा सकती हैं.

कोटक सिक्योरिटीज के विशेषज्ञों का भी मानना है कि बाजार अभी भूराजनीतिक जोखिम को देखते हुए तेल की कीमत तय कर रहा है. अगले कुछ महीनों तक बाजार में उतारचढ़ाव बना रह सकता है.

भारत के लिए क्यों है चिंता?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर बढ़ जाता है.

इसके अलावा भारत के 40% से ज्यादा कच्चे तेल का आयात होरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते होता है. अगर इस मार्ग पर लंबे समय तक तनाव बना रहता है, तो तेल की सप्लाई और शिपिंग लागत दोनों प्रभावित हो सकती हैं.

रुपये, महंगाई और शेयर बाजार पर असर

महंगा कच्चा तेल भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ा सकता है क्योंकि तेल आयात के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे. इससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है और आयातित महंगाई में भी इजाफा हो सकता है. ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक के लिए ब्याज दरों में कटौती करना आसान नहीं होगा.

शेयर बाजार की बात करें तो ऊंचे तेल दाम कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ा सकते हैं. इसका सबसे ज्यादा असर एविएशन, पेंट, केमिकल, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर पड़ सकता है. वहीं, तेल एवं गैस क्षेत्र की कंपनियों को इससे फायदा मिल सकता है.

निवेशकों को क्या करना चाहिए?

विशेषज्ञों का कहना है कि निवेशकों को फिलहाल वैश्विक घटनाक्रम पर नजर रखनी चाहिए. अगर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता है तो बाजार में उतारचढ़ाव तेज हो सकता है. ऐसे समय में घबराकर निवेश के फैसले लेने के बजाय लंबी अवधि की रणनीति अपनाना बेहतर होगा. वहीं, तेल की कीमतें अगर लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था के साथसाथ आम लोगों की जेब पर भी दिखाई दे सकता है.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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