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इंसान के लिए कितना खतरनाक है खेतों में इस्तेमाल होने वाला पैराक्वाट डाइक्लोराइड?​

किसानों के लिए बड़ी खबर है. भारत सरकार ने जानलेवा केमिकल पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर बैन लगा दिया है. इस खरपतवारनाशक के निर्माण, आयात, बिक्री और वितरण को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. दुनिया के 70 से अधिक देशों में यह पहले से बैन है. केंद्र सरकार ने इसको लेकर ऐलान किया है. […]

किसानों के लिए बड़ी खबर है. भारत सरकार ने जानलेवा केमिकल पैराक्वाट डाइक्लोराइड पर बैन लगा दिया है. इस खरपतवारनाशक के निर्माण, आयात, बिक्री और वितरण को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है. दुनिया के 70 से अधिक देशों में यह पहले से बैन है. केंद्र सरकार ने इसको लेकर ऐलान किया है. मेडिकल सेक्टर में पैराक्वाट डाइक्लोराइड को जानलेवा केमिकल माना जाता है.

भारत में लम्बे समय से वैज्ञानिक इसके बैन की मांग कर रहे थे. इस केमिकल का एंटीडोट तैयार न होने के कारण यह और भी ज्यादा खतरनाक साबित होता है. अब सवाल है कि क्या है पैराक्वाट डाइक्लोराइड, यह इंसान के लिए कब और कैसे जानलेवा बन जाता है.

जानलेवा पैराक्वाट डाइक्लोराइड कैसे इस्तेमाल करते हैं?

आसान भाषा में समझें तो पैराक्वाट डाइक्लोराइड एक खरपतवारनाशक है. यानी इसका इस्तेमाल खेतों में घास और खरपतवार को खत्म करने में किया जाता है. इसका इस्तेमाल फसल को बोने से पहले किया जाता है ताकि खेती से पहले खेत को साफ किया जा सके.

खास बात है कि यह सिर्फ खरपतवार ही नहीं, इसके सम्पर्क में आने वाले हर पौधे खत्म भी हो जाते हैं. यह पौधों में प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को बाधित करता है, नतीजा पत्तियां हो या तना, हर हिस्सा रसायन से झुलसकर सूख जाता है. इसका तेज असर और कम कीमत के कारण दशकों से किसानों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ.

किसानों को फायदा फिर बैन क्यों?

अब सवाल है जब यह किसानों को इससे फायदा होता है तो फिर इस पर बैन क्यों लगाया गया? इसका सीधा सा जवाब कि इसका असर सिर्फ खरपतवार और पौधों तक सीमित नहीं है. पैराक्वाट खेतों में असरदार जरूर है, लेकिन कृषि मंत्रालय की चिंता है कि यह इंसानों और जानवरों के लिए जानलेवा है. जब किसी केमिकल का कोई एंटीडोट ही न हो, तो थोड़ी सी भी लापरवाही जानलेवा साबित हो सकती है. दुनिया के 70 से अधिक देश इससे सबक ले चुके हैं.

कैसे इंसान के लिए जानलेवा?

खेतों में छिड़काव के दौरान इसके स्किन के सम्पर्क में आने या सांस के जरिए शरीर में जाने का खतरा रहता है. सुरक्षा उपकरणों की कमी के कारण गांवों में किसान अक्सर बिना सावधानी के छिड़काव करते हैं. गलती से शरीर में पहुंचने वाली इसकी थोड़ी सी मात्रा भी जान ले सकती है.

क्लीवलैंड क्लीनिक की रिपोर्ट कहती है, इसका सबसे पहलाअसर आहारनाल और रेस्पिरेट्री सिस्टम पर दिखता है. गले मेंसूजन, डायरिया, नाक से खूनआना, मुंह और गले में लालिमा दिखना, पेट में दर्दऔर खूनी उल्टी के लक्षणदिखते हैं.

लक्षण दिखने के कुछ घंटों केअंदर दिल की धड़कन तेज हो सकती हैं. मांसपेशियों मेंकमजोरी के साथ दौरे पड़ना,ब्लड प्रेशर गिरना, सांस लेनेमें तकलीफ होने जैसे लक्षणदिख सकते हैं और मौत होसकती है. यही वजह है कि इसका सीधा असर हार्ट, किडनी, लिवर और फेफड़ों पर पड़ता है.

केंद्र सरकार का नोटिफिकेशन.

कैसे पता लगाते हैं शरीर में यह केमिकल है या नहीं?

ब्लड टेस्ट, यूरिन टेस्ट, सीटी स्कैन और इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम जैसी जांचें कराई जाती हैं.इसका सटीक इलाज न होने पर शरीर के जिस अंग में दिक्कत होती है उसे कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है.भारत में यह प्रतिबंध कीटनाशक अधिनियम, 1968 की धारा 27 के तहत लगाया गया है. 13 जुलाई से 30 दिनों की अवधि तय की गई है, जिसमें इच्छुक पक्ष इस पर अपनी आपत्तियां या सुझाव दर्ज करा सकते हैं, अगर इस दौरान कोई ठोस आपत्ति सामने नहीं आती, तो 30 दिन बाद पैराक्वाट डाइक्लोराइड भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित हर्बिसाइड्स की सूची में शामिल हो जाएगा.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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