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जापान के कितने दुश्मन, 80 साल बाद क्यों बना रहा नई खुफिया एजेंसी?​

जापान ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव शुरू किया है. वह एक नई केंद्रीय खुफिया व्यवस्था बना रहा है. इसका उद्देश्य देश के भीतर और बाहर से आने वाले सुरक्षा खतरों को समय पर पहचानना है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने सैन्य और जासूसी ढांचे को सीमित रखा था. वह लंबे […]

जापान ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में बड़ा बदलाव शुरू किया है. वह एक नई केंद्रीय खुफिया व्यवस्था बना रहा है. इसका उद्देश्य देश के भीतर और बाहर से आने वाले सुरक्षा खतरों को समय पर पहचानना है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद जापान ने सैन्य और जासूसी ढांचे को सीमित रखा था. वह लंबे समय तक अमेरिका की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया सहयोग पर निर्भर रहा, लेकिन अब क्षेत्रीय तनाव बढ़ गया है. साइबर हमले बढ़ रहे हैं. तकनीक की चोरी का खतरा भी बढ़ा है, इसलिए टोक्यो को लगता है कि पुरानी व्यवस्था अब पर्याप्त नहीं है.

नई व्यवस्था में नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो और नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल जैसे ढांचे शामिल होने की बात सामने आई है. काउंसिल की अध्यक्षता प्रधानमंत्री के स्तर पर होगी. इसका मतलब है कि बड़े सुरक्षा मामलों की जानकारी सीधे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच सकेगी. जापान के कितने दुश्मन और क्यों, अब क्यों बना रहा खुफिया एजेंसी, ये कैसी होगी, अब इसकी जरूरत क्यों महसूस हुई? यह कब तक सक्रिय होगी? आइए, जानते हैं विस्तार से.

जापान के सामने कौनकौन से खतरे हैं?

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में देश अक्सर एकदूसरे को औपचारिक रूप से दुश्मन नहीं कहते. फिर भी जापान जिन देशों से सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती महसूस करता है, उनमें चीन, रूस और उत्तर कोरिया प्रमुख हैं.

चीन से क्यों चिंतित है जापान?

जापान और चीन के बीच पूर्वी चीन सागर में द्वीपों को लेकर विवाद है. जापान इन द्वीपों को सेनकाकू कहता है. चीन इन्हें दियाओयू कहता है. यह विवाद कई वर्षों से चल रहा है. जापान को चिंता है कि चीन इस समुद्री क्षेत्र में अपनी सैन्य और तटरक्षक गतिविधियां बढ़ा रहा है. चीन की नौसेना तेजी से मजबूत हुई है. उसके जहाज और विमान जापान के आसपास के समुद्री इलाकों में अधिक दिखाई देते हैं. ताइवान का मुद्दा भी जापान के लिए अहम है.

चीन के राष्ट्रपति जिनपिंग.

ताइवान जापान के दक्षिणपश्चिमी द्वीपों के पास है. अगर ताइवान को लेकर बड़ा संघर्ष होता है, तो उसका असर जापान की सुरक्षा, समुद्री व्यापार और अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर पड़ सकता है. जापान को औद्योगिक जासूसी की भी चिंता है. वह सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा तकनीक और उन्नत मशीनों में मजबूत देश है. ऐसी तकनीकों की चोरी या गलत हाथों में पहुंचना उसके लिए आर्थिक और सुरक्षा दोनों प्रकार का खतरा है.

रूस से क्यों खतरा मानता है जापान?

जापान और रूस के बीच उत्तरी द्वीपों को लेकर पुराना विवाद है. रूस इन्हें कुरील द्वीप कहता है. जापान इन्हें अपना उत्तरी क्षेत्र मानता है. इस विवाद के कारण दोनों देशों के बीच अब तक औपचारिक शांति संधि नहीं हो पाई है. रूस की सैन्य गतिविधियां भी जापान की चिंता का कारण हैं. रूस के पास प्रशांत क्षेत्र में नौसैनिक और हवाई क्षमता है.

रूसी राष्ट्रपति पुतिन.

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ा है. जापान अमेरिका और पश्चिमी देशों का करीबी साझेदार है, इसलिए रूसजापान संबंधों में भी तनाव बढ़ा है. जापान को यह भी डर है कि रूस साइबर हमले, गलत सूचना और जासूसी जैसे तरीकों का उपयोग कर सकता है. आधुनिक दौर में युद्ध केवल सीमा पर नहीं लड़ा जाता. इंटरनेट, मीडिया, डेटा और वित्तीय नेटवर्क भी संघर्ष का हिस्सा बन चुके हैं.

उत्तर कोरिया से सबसे ज्यादा खतरा

उत्तर कोरिया जापान के लिए सीधा मिसाइल खतरा माना जाता है. उसने कई बार बैलिस्टिक मिसाइलों का परीक्षण किया है. कुछ मिसाइलें जापान के ऊपर या उसके पास के समुद्री क्षेत्रों में जा चुकी हैं. उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम ने भी जापान की चिंता बढ़ाई है. किसी मिसाइल परीक्षण की सूचना देर से मिले, तो प्रतिक्रिया देना मुश्किल हो सकता है. इसलिए जापान को तेज और भरोसेमंद खुफिया जानकारी चाहिए.

शी जिनपिंग और किम जोंग

उत्तर कोरिया साइबर अपराध के लिए भी जाना जाता है. डिजिटल चोरी, क्रिप्टो संपत्तियों की हैकिंग और कंप्यूटर नेटवर्क पर हमले जैसे आरोप उस पर लगते रहे हैं. जापान के बैंक, कंपनियां, बंदरगाह, बिजली व्यवस्था और सरकारी नेटवर्क ऐसे हमलों के निशाने पर आ सकते हैं.

पुरानी खुफिया व्यवस्था में क्या समस्या थी?

जापान के पास पहले से कई खुफिया संस्थाएं हैं. पुलिस, रक्षा मंत्रालय, विदेश मंत्रालय और अन्य विभाग अपनेअपने स्तर पर सूचनाएं जुटाते रहे हैं. समस्या यह थी कि ये जानकारियां अलगअलग जगहों पर रहती हैं. कई बार एक विभाग के पास जरूरी सूचना होती हैं, लेकिन वह समय पर दूसरे विभाग तक नहीं पहुंचती. इससे खतरे की पूरी तस्वीर बनाना कठिन हो जाता है.

नई एजेंसी का मुख्य काम इसी कमी को दूर करना होगा. वह अलगअलग विभागों से मिली जानकारी को एक जगह जोड़ेगी. फिर उसका विश्लेषण करेगी. इसके बाद सरकार को समय पर चेतावनी और सलाह देगी. यह एजेंसी केवल जासूस भेजने वाली संस्था नहीं होगी. इसका बड़ा काम डेटा का अध्ययन करना, साइबर संकेतों को समझना और जोखिम का अनुमान लगाना भी होगा.

जापान की पीएम सनाए ताकाइची.

नई खुफिया एजेंसी कैसी होगी?

नई केंद्रीय व्यवस्था का लक्ष्य सूचना जुटाना, उसका विश्लेषण करना और विभिन्न विभागों के बीच तालमेल बनाना है. इसमें साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, भाषा विशेषज्ञ, डेटा विश्लेषक, रक्षा मामलों के जानकार और विदेश नीति विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं. नई व्यवस्था में सैकड़ों अधिकारीकर्मचारी काम कर सकते हैं. यह सरकार के पास पहले से उपलब्ध खुफिया तंत्र एवं संबंधित अधिकारियों के बीच समन्वय बनाने का प्रयास करेगी. नेशनल इंटेलिजेंस काउंसिल को सरकार का कमान केंद्र माना जा सकता है. इसका काम बड़े खतरों की समीक्षा करना होगा. नेशनल इंटेलिजेंस ब्यूरो सूचना और विश्लेषण से जुड़ा संचालन संभाल सकता है. इसका लक्ष्य किसी एक मंत्रालय की जगह लेना नहीं है. इसका उद्देश्य सभी संस्थाओं को बेहतर ढंग से एक तार में पिरोना है.

जापान सायबर सिक्योरिटी को आज की जरूरत मानता है.

साइबर सुरक्षा सबसे बड़ी वजहों में से एक

आज किसी देश को कमजोर करने के लिए केवल सैनिक भेजना जरूरी नहीं है. साइबर हमला भी बड़ा नुकसान कर सकता है. बिजली व्यवस्था बंद हो सकती है. बैंकिंग नेटवर्क प्रभावित हो सकता है. अस्पतालों की सेवाएं रुक सकती हैं. रेलवे और हवाई यातायात व्यवस्था बाधित हो सकती है. जापान तकनीकी रूप से बहुत उन्नत देश है, इसलिए उसका डिजिटल ढांचा भी बड़ा है. जितना अधिक डिजिटल नेटवर्क होगा, साइबर हमले का जोखिम भी उतना ही बढ़ेगा. नई खुफिया एजेंसी संदिग्ध डिजिटल गतिविधियों को जल्दी पहचानने में मदद कर सकती है. यह फर्जी सूचना फैलाने वाले नेटवर्क पर भी नजर रख सकती है.

नई केन्द्रीय खुफिया एजेंसी कब सक्रिय होगी?

जापान की प्रस्तावित नई केंद्रीय खुफिया एजेंसी के दिसंबर 2026 तक काम शुरू करने की उम्मीद है. शुरुआती चरण में इसका ध्यान अलगअलग सरकारी विभागों की खुफिया सूचनाओं को एक साथ लाने, उनका विश्लेषण करने और साइबर सुरक्षा मजबूत करने पर होगा. एजेंसी के पूरी तरह सक्रिय और व्यापक क्षमता से काम करने में अधिक समय लग सकता है. क्योंकि इसके लिए विशेषज्ञों की भर्ती, तकनीकी ढांचा, कानूनी प्रक्रियाएं और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय तैयार करना होगा. इसका अर्थ यह भी हुआ कि दिसंबर 2026 से शुरुआती परिचालन भले ही शुरू हो जाएगी लेकिन इसका पूरा ढांचा बनकर तैयार होने में वक्त लगेगा. यह एजेंसी अपनी पूर्ण क्षमता चरणबद्ध तरीके से विकसित करेगी.

कौनकौन से देश जापान की मदद कर रहे?

जापान लंबे समय से अमेरिका का सुरक्षा सहयोगी है. अमेरिका के पास खुफिया, साइबर सुरक्षा और आतंकवादरोधी काम का व्यापक अनुभव है. जापान नई एजेंसी के ढांचे, प्रशिक्षण और सूचनासाझाकरण के लिए अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा जर्मनी जैसे साझेदारों से सलाह ले रहा है. हालांकि, जापान केवल बाहरी मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहता. उसका उद्देश्य अपनी स्वतंत्र क्षमता बढ़ाना है. बदलती विश्व राजनीति में कोई भी देश केवल सहयोगियों की सूचना पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता.

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संपादकीय टीम

खबर मंकी की अनुभवी एडिटोरियल डेस्क। हमारे लेखक और संपादक दिन-रात निष्पक्ष, सटीक और तीव्र समाचार आप तक पहुँचाने के लिए काम करते हैं।

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