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बीमा कंपनी की मनमानी के आगे बेटे की हुई जीत, पिता को शराबी बताकर खारिज किया था क्लेम

बीमा कंपनी की मनमानी के आगे बेटे की हुई जीत, पिता को शराबी बताकर खारिज किया था क्लेम

एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर, जिसने एक हिंसक हमले में अपनी मां को खो दिया और गंभीर रूप से घायल पिता के इलाज पर 10 लाख रुपये से अधिक खर्च किए, को स्वास्थ्य बीमा कंपनी HDFC ERGO General Insurance ने क्लेम देने से इनकार कर दिया. कंपनी का दावा था कि मरीज का शराब सेवन का पुराना इतिहास था. हालांकि बेटे ने इस फैसले को कानूनी चुनौती दी और आखिरकार उपभोक्ता आयोग से जीत हासिल की. District Consumer Disputes Redressal Commission ने बीमा कंपनी को 6 लाख रुपये के साथ ब्याज देने का आदेश दिया है. आयोग ने कहा कि क्लेम खारिज करने का फैसला उचित नहीं था.

बीमा कंपनी की मनमानी के आगे बेटे की हुई जीत, पिता को शराबी बताकर खारिज किया था क्लेम
बीमा कंपनी की मनमानी के आगे बेटे की हुई जीत, पिता को शराबी बताकर खारिज किया था क्लेम

क्या था पूरा मामला?

आंध्र प्रदेश के रहने वाले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने अपने पिता के लिए 2019 से HDFC ERGO की हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी ले रखी थी. यह पॉलिसी 25 मार्च 2024 से 24 मार्च 2025 तक वैध थी और इसके लिए 42,750 रुपये का प्रीमियम चुकाया गया था.

25 जून 2024 को शिकायतकर्ता के माता-पिता पर कथित तौर पर कुछ रिश्तेदारों और अन्य लोगों ने चाकू और लोहे की रॉड से हमला कर दिया. इस हमले में उनकी मां की मौत हो गई, जबकि पिता गंभीर रूप से घायल हो गए.

पहले उनका इलाज सरकारी अस्पताल में हुआ, बाद में उन्हें हैदराबाद के Continental Hospitals में भर्ती कराया गया. इलाज के दौरान उन्हें ICU में भी रखा गया. कुल इलाज पर लगभग 10.17 लाख रुपये खर्च हुए.

बीमा कंपनी ने क्यों ठुकराया क्लेम?

विवाद तब शुरू हुआ जब अस्पताल की डिस्चार्ज समरी में “Alcohol Withdrawal Psychosis” यानी शराब छोड़ने से जुड़ी मानसिक स्थिति का उल्लेख किया गया. बीमा कंपनी ने इसे आधार बनाकर दावा किया कि मरीज ने शराब पीने का इतिहास छिपाया था. इसी वजह से कंपनी ने क्लेम खारिज कर दिया और पॉलिसी भी रद्द कर दी.

हालांकि परिवार ने स्पष्ट किया कि पिता ने कभी शराब नहीं पी थी. बाद में इलाज करने वाले डॉक्टर और अस्पताल ने भी लिखित रूप से बताया कि मरीज की भ्रम और सुस्ती की स्थिति शराब की वजह से नहीं बल्कि किडनी की गंभीर बीमारी, एनीमिया और हमले से हुए शारीरिक व मानसिक आघात के कारण थी. अस्पताल ने बाद में डिस्चार्ज समरी में संशोधन कर विवादित टिप्पणी भी हटा दी.

आयोग ने क्या कहा?

उपभोक्ता आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी ने केवल शुरुआती डिस्चार्ज समरी के आधार पर क्लेम खारिज किया, जबकि बाद में अस्पताल और डॉक्टर दोनों ने लिखित स्पष्टीकरण दे दिया था. आयोग ने बीमा कंपनी के रवैये को मनमाना, अनुचित और सेवा में कमी करार दिया. साथ ही अस्पताल को भी लापरवाही का दोषी माना, क्योंकि बिना पर्याप्त पुष्टि के ऐसी टिप्पणी दर्ज की गई थी.

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क्या मिला परिवार को?

आयोग ने HDFC ERGO को 6 लाख रुपये का मेडिकल क्लेम 9% वार्षिक ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया. इसके अलावा Continental Hospitals को मानसिक पीड़ा के लिए 1 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में 25,000 रुपये देने का निर्देश दिया गया.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला बताता है कि बीमा कंपनियां केवल अनुमान के आधार पर क्लेम खारिज नहीं कर सकतीं. यदि पॉलिसीधारक के पास सही दस्तावेज और मेडिकल रिकॉर्ड हों, तो गलत तरीके से ठुकराए गए क्लेम को कानूनी रूप से चुनौती दी जा सकती है.

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