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ब्याज दरों में राहत की उम्मीदों पर फिरेगा पानी? RBI पॉलिसी से ऐन पहले वित्त मंत्रालय ने चेताया-‘अभी टला नहीं है महंगाई का संकट’

वित्त मंत्रालय ने भारतीय रिजर्व बैंक के मॉनेटरी पॉलिसी फैसले से कुछ ही दिन पहले कहा कि भारत को महंगाई के मोर्चे पर चौकस रहने की जरूरत है. फ्यूल की बढ़ती कीमतें, कमजोर होता रुपया और सामान्य से कम मानसून का रिस्क कीमतों पर दबाव फिर से बढ़ा सकते हैं. मई महीने के अपने मासिक आर्थिक समीक्षा में, आर्थिक मामलों के विभाग ने कहा कि इकोनॉमी “सावधानी के साथ मजबूत” बनी हुई है. वैश्विक और घरेलू अनिश्चितताओं के बढ़ने के बावजूद घरेलू बुनियादी बातें काफी हद तक स्थिर हैं. मंत्रालय ने कहा कि वैश्विक ऊर्जा की ऊंची कीमतें, रुपए का गिरना, प्रोडक्शन कॉस्ट का दबाव बढ़ना और सामान्य से कम मानसून की संभावना—इन सब बातों को देखते हुए लगातार नीतिगत चौकसी की जरूरत है.

ब्याज दरों में राहत की उम्मीदों पर फिरेगा पानी? RBI पॉलिसी से ऐन पहले वित्त मंत्रालय ने चेताया-‘अभी टला नहीं है महंगाई का संकट’
ब्याज दरों में राहत की उम्मीदों पर फिरेगा पानी? RBI पॉलिसी से ऐन पहले वित्त मंत्रालय ने चेताया-‘अभी टला नहीं है महंगाई का संकट’

5 जून को होगा पॉलिसी का ऐलान

यह आकलन RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी की अगले हफ़्ते होने वाली बैठक से पहले आया है. नीतिगत फैसला 5 जून को आने वाला है. महंगाई के दबाव और रुपए को सहारा देने की कोशिशों के बीच, कड़ी मॉनेटरी पॉलिसी की उम्मीदें बढ़ गई हैं. इस महीने की शुरुआत में रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर-लगभग 97-पर पहुंच गया था. हालांकि अप्रैल में रिटेल महंगाई RBI के 4 फीसदी के लक्ष्य से नीचे रही, लेकिन मंत्रालय ने आगाह किया कि थोक कीमतों का दबाव तेजी से बढ़ा है. इससे यह जोखिम बढ़ गया है कि उत्पादन लागत में हुई बढ़ोतरी का असर आखिरकार उपभोक्ता कीमतों पर भी पड़ सकता है.

थोक महंगाई में जबरदस्त इजाफा

अप्रैल में उत्पादक महंगाई साढ़े तीन साल से भी ज्यादा के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई. इसका सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतें रही, जिसने मैन्युफैक्चरिंग कॉस्ट में इजाफा किया था. वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के आंकड़ों से पता चला कि थोक मूल्य सूचकांक (WPI) साल-दर-साल आधार पर 8.30 फीसदी बढ़ा. यह मार्च के 3.88 फीसदी के आंकड़े से काफी ज्यादा है और अर्थशास्त्रियों के 5.50 फीसदी के अनुमान से भी कहीं ऊपर है. मंत्रालय ने यह भी चेतावनी दी कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के नतीजों से भारत की महंगाई और बाहरी क्षेत्र के परिदृश्य पर काफी जोखिम पैदा हो सकता है-खास तौर पर ऊर्जा आपूर्ति में आने वाली रुकावटों के कारण.

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वित्त मंत्रालय की नसीहत

मंत्रालय ने कहा कि हॉर्मुज स्ट्रेट में आने वाली रुकावटों की अवधि ही ‘भारत के बाहरी और कीमतों से जुड़े परिदृश्य के लिए सबसे ज्यादा मायने रखने वाला एकमात्र फैक्टर ‘ बना रहेगा. समीक्षा के अनुसार, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, वैश्विक वित्तीय स्थितियों का कड़ा होना और दुनिया भर में आर्थिक विकास की गति का धीमा पड़ना-ये सभी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहे हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था को बाहरी झटकों से पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकता. मंत्रालय ने कहा कि अनिश्चितता के इस मिले-जुले दौर—चाहे वह बाहरी कारणों से हो या जलवायु से जुड़े कारणों से-से निपटने के लिए मॉनेटरी, फिस्कल और स्ट्रक्चरल, तीनों ही मोर्चों पर नीतियों को लचीला बनाए रखना होगा. साथ ही, मध्यम-अवधि के विकास लक्ष्यों को भी पूरी तरह से नजर में रखना होगा.

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