सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाई कोर्ट के 25 मार्च के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. इसके प्रयागराज के POCSO मामले में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को अग्रिम जमानत दी गई थी. ये मामला नाबालिगों के यौन शोषण से जुड़ा हुआ है. इस मामले में अविमुक्तेश्वरानंद की अग्रिम जमानत बरकरार रहेगी. जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. इस मामले में शिकायतकर्ता आशुतोष ब्रह्मचारी ने AOR सौरभ अजय गुप्ता के जरिए यह याचिका दायर की थी. याचिका में यह तर्क दिया गया था कि हाई कोर्ट ने स्वामी पर लगे आरोपों की गंभीरता पर ठीक से विचार नहीं किया.

जस्टिस सुंदरेश ने याचिकाकर्ता से पूछा कि नाबालिगों के शोषण के बारे में जानकारी होने का दावा करने के बावजूद, पुलिस के पास जाने में इतनी देरी क्यों की गई? हाई कोर्ट ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य को आंशिक रूप से इस आधार पर राहत दी थी, जिसे कोर्ट ने नाबालिग पीड़ितों का ‘असामान्य’ व्यवहार बताया था, क्योंकि पीड़ितों ने अपराधों के बारे में अपने स्वाभाविक अभिभावकों के बजाय एक अजनबी को बताने का रास्ता चुना था.
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गिरफ्तारी में क्यों हुई 6 दिन की देरी?
अपने 22 पन्नों के आदेश में हाई कोर्ट ने राज्य की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि POCSO एक्ट की धारा 29 के तहत आरोपी के खिलाफ अपराध की एक कानूनी धारणा (statutory presumption) होती है. बेंच ने साफ किया कि ये धारणा गिरफ्तारी से पहले के चरण में यानी आरोप तय होने से पहले, लागू नहीं की जा सकती. बेंच ने अपराध के बारे में पुलिस को जानकारी देने में हुई 6 दिन की देरी पर भी प्रकाश डाला. पीड़ितों ने 18 जनवरी, 2026 को ब्रह्मचारी को इस बारे में बताया था, लेकिन उन्होंने 24 जनवरी तक पुलिस से संपर्क नहीं किया. उनका दावा था कि वे एक पूजा में व्यस्त थे.
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि पूजा/यज्ञ में व्यस्त होने का दावा करने के बावजूद, शिकायतकर्ता (ब्रह्मचारी) ने 21 जनवरी को BNS की धारा 109 और अन्य धाराओं के तहत एक अलग घटना के संबंध में एक अलग अर्जी दायर की थी. कोर्ट ने इस मामले में मीडिया की दखलंदाजी पर भी कड़ी आपत्ति जताई थी.












