राजस्थान उच्च न्यायालय ने नाबालिग छात्रा से दुष्कर्म के मामले में सजा काट रहे 86 वर्षीय संत आसाराम को बड़ी राहत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने निचली अदालत द्वारा सुनाई गई उनकी आजीवन कारावास (उम्रकैद) की सजा को बरकरार रखा है।

हालांकि, हाई कोर्ट ने उन्हें सामूहिक दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया है, लेकिन पोक्सो (POCSO) और अन्य गंभीर धाराओं में उनकी दोषसिद्धि और सजा यथावत रहेगी। इसके साथ ही वर्तमान में अंतरिम चिकित्सा जमानत पर बाहर चल रहे आसाराम को तत्काल सरेंडर करने का आदेश दिया गया है।
हाई कोर्ट ने अपीलों पर सुनाया फैसला
राजस्थान उच्च न्यायालय की जोधपुर स्थित मुख्यपीठ में न्यायाधीश अरुण मोंगा और न्यायाधीश योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने बुधवार को इस बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने आसाराम, सह-अभियुक्त शिल्पी और शरतचंद्र की ओर से दायर अपीलों पर सुनवाई पूरी करने के बाद 20 अप्रैल 2026 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
बुधवार को आए फैसले में कोर्ट ने जहां आसाराम की उम्रकैद को बरकरार रखा, वहीं मामले के दो अन्य सह-आरोपियों शिल्पी और शरतचंद्र को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया। निचली अदालत ने इन दोनों को 20-20 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
सामूहिक दुष्कर्म का आरोप हटा, बाकी सजाएं रहेंगी लागू
पीड़ित पक्ष के वकील पी.सी. सोलंकी ने फैसले की जानकारी देते हुए बताया कि उच्च न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर माना कि सामूहिक दुष्कर्म और आपराधिक षड्यंत्र की धारा में दोष सिद्ध नहीं होता है, इसलिए आसाराम को उस विशेष आरोप से मुक्त किया गया है। लेकिन पीड़िता के साथ दुष्कर्म और पोक्सो एक्ट के तहत अन्य आरोप पर्याप्त रूप से साबित होते हैं, जिसके कारण उनकी बाकी की सजाओं में किसी प्रकार का बदलाव नहीं किया जाएगा।
गौरतलब है कि जनवरी 2023 में गुजरात के गांधीनगर आश्रम में एक अन्य महिला से दुष्कर्म के मामले में भी आसाराम को पहले ही एक और आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है।
क्या है पूरा मामला?
अप्रैल 2013 – एक नाबालिग छात्रा ने जोधपुर के महिला पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई थी कि आसाराम ने अपने मणाई आश्रम में उसके साथ दुष्कर्म किया है।
अगस्त 2013 – पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 31 अगस्त 2013 को इंदौर के एक आश्रम से आसाराम को गिरफ्तार किया था। नवंबर 2013 में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हुई।
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अप्रैल 2018 – लंबी सुनवाई के बाद विशेष सत्र न्यायालय ने 25 अप्रैल 2018 को आसाराम को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
जमानत और अदालती कार्यवाही का घटनाक्रम
गंभीर बीमारियों का हवाला देकर आसाराम लंबे समय से जमानत के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे:
जनवरी 2025 – सर्वोच्च न्यायालय ने आसाराम को पहली बार इलाज के लिए अंतरिम चिकित्सा जमानत मंजूर की थी।
अक्टूबर 2025 – राजस्थान उच्च न्यायालय ने उन्हें छह महीने की चिकित्सा जमानत दी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए हाई कोर्ट को तीन महीने के भीतर मुख्य अपील पर फैसला सुनाने के निर्देश दिए थे।
अप्रैल 2026 – आसाराम की ओर से दोबारा जमानत अवधि बढ़ाने की याचिका लगाई गई थी, जिस पर सुनवाई और सभी पक्षों की दलीलें पूरी होने के बाद हाई कोर्ट ने अपना अंतिम फैसला सुना दिया है।





