असम की नई भाजपा सरकार राज्य में यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड लागू करने का फैसला लिया है. इस तरह उत्तराखंड, गुजरात के बाद असम तीसरा राज्य बनने की तैयारी में है, जिसने यूसीसी लागू किया है. तीनों ही राज्यों का उद्देश्य एक है लेकिन तीनों राज्यों ने बिल में जो प्रावधान किए हैं, उनमें मामूली अंतर भी दिखाई दे रहा है. आइए, असम के संदर्भ में समझने का प्रयास करते हैं कि यह बिल उत्तराखंड एवं गुजरात से कितना अलग है? तीनों में क्या अंतर है?
Explained: शादी, तलाक, लिव-इन…असम का UCC उत्तराखंड-गुजरात से कितना अलग, कितना सख्त?
यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड, भारत में एक प्रस्तावित कानून है जो सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत मामलों को एक समान नियमों के तहत लाएगा, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 44 राज्यों को अपने नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का निर्देश देता है. हाल के वर्षों में, कई राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं. उत्तराखंड पहला राज्य है, जिसने इसे लागू किया है. उसके बाद गुजरात और अब असम ने भी इस दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं. उम्मीद की जानी चाहिए कि भाजपा शासित बाकी राज्य भी इस कानून को लागू करने पर विचार करेंगे.
असम: समान नागरिक संहिता बिल, 2026
असम, उत्तराखंड और गुजरात के बाद यूसीसी बिल पेश करने वाला तीसरा राज्य बन गया है. इस बिल का उद्देश्य भी व्यक्तिगत कानूनों में सुधार और एकरूपता लाना है. असम सरकार ने इसी महीने 13 मई, 2026 को यूसीसी बिल के मसौदे को मंजूरी दी. इसे 25 मई, 2026 को राज्य विधानसभा में पेश किया गया.इस बिल के मुख्य प्रावधान निम्नवत हैं.
विवाह: विवाह के लिए न्यूनतम आयु लड़कियों के लिए 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष है. बहुविवाह पर सख्त प्रतिबंध का प्रस्ताव है, जिसके उल्लंघन पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत 7 साल तक की कैद हो सकती है. सभी विवाहों और तलाकों का 60 दिनों के भीतर पंजीकरण अनिवार्य है.
तलाक: तलाक के लिए समान आधार प्रस्तावित हैं
लिव-इन रिलेशनशिप: लिव-इन संबंधों का एक महीने के भीतर पंजीकरण अनिवार्य होगा. पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक की कैद या 10 हजार रुपये का जुर्माना हो सकता है.
उत्तराधिकार (संपत्ति): संपत्ति के बंटवारे के लिए लिंग-समान नियम प्रस्तावित हैं, जिसमें पति-पत्नी, बच्चों और माता-पिता को श्रेणी-1 के उत्तराधिकारी के रूप में समान अधिकार मिलेंगे.
कानूनी बदलाव: यह बिल असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 2024 को निरस्त कर देगा. हालांकि, बिल में एक सेविंग क्लॉज है, जो इस कानून के लागू होने से पहले हुई बहु-विवाह वाली शादियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है.
विशेष छूट: उत्तराखंड की तरह, असम के बिल में भी राज्य के पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों की सभी अनुसूचित जनजातियों को इसके दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया है.
उत्तराखंड: समान नागरिक संहिता कानून, 2024
उत्तराखंड स्वतंत्र भारत का पहला राज्य है जिसने यूसीसी को कानून के रूप में लागू किया है. यह कानून राज्य के सभी निवासियों पर लागू है. 27 जनवरी 2025 से इसे पूरे राज्य में लागू किया गया है. राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश (सेवानिवृत्त) रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था. समिति ने 2 फरवरी, 2024 को अपनी रिपोर्ट सौंपी. बिल 7 फरवरी, 2024 को राज्य विधानसभा में पारित हुआ.
विवाह: सभी धर्मों के लिए लड़कियों की विवाह योग्य आयु 18 वर्ष और लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित की गई है. बहु-विवाह पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है. विवाह का पंजीकरण अनिवार्य है.
तलाक: तलाक के लिए सभी के लिए एक समान आधार तय किए गए हैं. कोई भी विवाह अदालत के आदेश के बिना भंग नहीं किया जा सकता. तीन तलाक, निकाह-हलाला और इद्दत जैसी प्रथाओं को प्रतिबंधित और दंडनीय अपराध बनाया गया है.
लिव-इन रिलेशनशिप: लिव-इन जोड़ों के लिए एक महीने के भीतर पंजीकरण कराना अनिवार्य है. पंजीकरण न कराने पर तीन महीने तक की कैद या दस हजार रुपये का जुर्माना हो सकता है. ऐसे संबंधों से पैदा हुए बच्चों को कानूनी वैधता दी गई है और महिला साथी को रखरखाव का अधिकार दिया गया है.
उत्तराधिकार (संपत्ति): बेटे और बेटियों को पैतृक और स्व-अर्जित संपत्ति में समान अधिकार दिए गए हैं. यह नियम गोद लिए गए और सरोगेसी से पैदा हुए बच्चों पर भी लागू होता है.
विशेष छूट: इस कानून के प्रावधान अनुसूचित जनजाति के सदस्यों पर लागू नहीं होते हैं, ताकि उनकी पारंपरिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों की रक्षा हो सके.
गुजरात: समान नागरिक संहिता पहल
गुजरात ने भी यूसीसी लागू करने का फैसला किया है. उसने उत्तराखंड के मॉडल को बेहद मामूली सुधारों के साथ अपनाया है. गुजरात सरकार ने इसके लिए एक समिति का गठन किया था. रिपोर्ट मिलने के साथ ही यह बिल विधान सभा में पेश हुआ और मार्च 2026 में इसे पास भी कर दिया गया. इसके लागू होने की प्रक्रिया चल रही है लेकिन ड्राफ्ट से पता चलता है कि गुजरात का यूसीसी कानून काफी हद तक उत्तराखंड के कानून के समान होने की उम्मीद है, जिसमें विवाह, तलाक, विरासत और लिव-इन संबंधों के लिए समान नियम शामिल होंगे.
लिव-इन रिलेशनशिप.
तीनों राज्यों के कानून में क्या है कॉमन?
एक समान लक्ष्य: तीनों राज्यों का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों को सुव्यवस्थित कर लैंगिक न्याय और समानता को बढ़ावा देना है.
मुख्य सुधार: बहुविवाह पर प्रतिबंध, विवाह के लिए एक समान आयु, और विवाह व तलाक का अनिवार्य पंजीकरण तीनों के दृष्टिकोण का केंद्र है.
लिव-इन संबंधों का विनियमन: तीनों राज्य लिव-इन संबंधों को कानूनी दायरे में ला रहे हैं ताकि ऐसे संबंधों से पैदा हुए बच्चों और महिलाओं को कानूनी सुरक्षा मिल सके.
आदिवासी छूट: सबसे महत्वपूर्ण समानताओं में से एक यह है कि तीनों राज्यों ने अपनी जनजातीय आबादी की अनूठी सांस्कृतिक और पारंपरिक प्रथाओं का सम्मान करते हुए उन्हें यूसीसी के दायरे से बाहर रखा है.
A proud and historic moment for Assam.
Tabled on the floor of the Assembly today, the UCC Bill secures equal rights, uncompromised justice and uniform protection for all citizens.
Fulfilling the legacy of our founding architects, this landmark legislation marks an pic.twitter.com/1zhxdi9nKa
कार्यान्वयन का चरण: उत्तराखंड कानून लागू कर चुका है, जबकि असम और गुजरात अभी प्रक्रिया में हैं.
विशिष्ट कानूनी संदर्भ: असम का बिल विशेष रूप से असम मुस्लिम विवाह और तलाक पंजीकरण अधिनियम, 2024 को निरस्त करता है, जो उसके राज्य-विशिष्ट कानूनी सुधारों का हिस्सा है.
लिव-इन नियमों का विकास: उत्तराखंड ने अपने लिव-इन नियमों को कानूनी चुनौती और सार्वजनिक बहस के बाद संशोधित किया है, जिससे यह निजता के प्रति अधिक संवेदनशील हो गया है. असम का बिल शुरुआती कठोर प्रावधानों जैसा दिखता है.
सेविंग क्लॉज: असम के बिल में यूसीसी लागू होने से पहले से मौजूद बहु-विवाह वाली शादियों को कानूनी संरक्षण देने का प्रावधान एक अनूठा पहलू है, जो उत्तराखंड के कानून में स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है.
असम, उत्तराखंड और गुजरात द्वारा समान नागरिक संहिता की दिशा में उठाए गए कदम भारत में व्यक्तिगत कानून सुधारों के एक नए अध्याय का संकेत देते हैं. इन पहलों का मूल आधार लैंगिक समानता, कानूनी एकरूपता और सामाजिक सुधार है. हालांकि तीनों राज्यों के दृष्टिकोण में काफी समानता है, विशेष रूप से बहुविवाह पर प्रतिबंध और जनजातीय समुदायों को छूट देने के मामले में, फिर भी कुछ सूक्ष्म अंतर मौजूद हैं, जो उनके स्थानीय सामाजिक-कानूनी संदर्भों को दर्शाते हैं.