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टाटा ग्रुप का ‘बोर्ड रूम ड्रामा’: नोएल टाटा और एन चंद्रशेखरन के बीच कहां फंसा पेंच? जानिए इनसाइड स्टोरी

मंगलवार को टाटा संस की बोर्ड मीटिंग होने वाली है. ये मीटिंग ऐसे समय में हो रही है, जब टाटा ग्रुप साइरस मिस्त्री के दौर के बाद अपने सबसे बड़े अंदरूनी उथल-पुथल का सामना कर रहा है. इस बार यह तनाव खुद टाटा ट्रस्ट्स के भीतर का है.

Khabar Monkey

टाटा ग्रुप का ‘बोर्ड रूम ड्रामा’: नोएल टाटा और एन चंद्रशेखरन के बीच कहां फंसा पेंच? जानिए इनसाइड स्टोरी
टाटा ग्रुप का ‘बोर्ड रूम ड्रामा’: नोएल टाटा और एन चंद्रशेखरन के बीच कहां फंसा पेंच? जानिए इनसाइड स्टोरी

टाटा ग्रुप के भीतर की दरारें सिर्फ लोगों तक ही सीमित नहीं हैं. इस झगड़े की जड़ में यह सवाल है कि टाटा ट्रस्ट्स का टाटा संस पर कितना अधिकार होना चाहिए, और क्या ग्रुप की पुरानी, ​​आम सहमति से चलने वाली व्यवस्था अब टूट जाएगी?

यह मीटिंग इसलिए और भी ज्यादा अहम हो जाती है, क्योंकि यह महीनों से टल रही चर्चाओं, ट्रस्टियों के आपसी झगड़ों, बोर्ड-लेवल के मतभेदों के अलावा रतन टाटा के सबसे करीबी लोगों में से एक, मेहली मिस्त्री के ट्रस्ट्स के अचानक बाहर निकलने के बाद हो रही है.

रतन टाटा के जाने के बाद कैसे बदला पॉवर स्ट्रक्चर?

टाटा ग्रुप के भीतर मौजूदा दौर की शुरुआत रतन टाटा के जाने के बाद हुई. इसके तुरंत बाद, रतन के सौतेले भाई नोएल टाटा ने टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन का पद संभाला. ये ट्रस्ट्स मिलकर टाटा संस के लगभग 66 फीसदी शेयर के मालिक हैं, जबकि कंस्ट्रक्शन और इंफ्रास्ट्रक्चर की बड़ी कंपनी SP ग्रुप के पास कंपनी के 18.4 फीसदी शेयर हैं. रतन टाटा के न रहने पर, कई ऐसे अहम फैसले जो पहले आम सहमति से लिए जाते थे, अब ट्रस्टियों की औपचारिक चर्चाओं के जरिए लिए जाने लगे. लगभग उसी समय, टाटा ट्रस्ट्स ने एक ऐसी व्यवस्था लागू की, जिसके तहत 75 साल से ज्यादा उम्र के नॉमिनी डायरेक्टर्स के काम-काज की हर साल समीक्षा होगी. इसी बात ने ट्रस्ट्स की व्यवस्था के भीतर पहले बड़े मतभेद की नींव रखी.

टाटा संस के बोर्ड में प्रतिनिधित्व को लेकर विवाद

टाटा ट्रस्ट्स की एक मीटिंग के दौरान यह तनाव साफ दिखाई दिया. इस मीटिंग में इस बात पर चर्चा होनी थी कि विजय सिंह को टाटा संस के बोर्ड में नॉमिनी डायरेक्टर के तौर पर आगे भी रखा जाए या नहीं.

ट्रस्टी मेहली मिस्त्री, डेरियस खंबाटा, प्रमित झावेरी और जहांगीर जहांगीर ने सिंह को पद पर बनाए रखने का विरोध किया. इसके बजाय, उन्होंने टाटा संस के बोर्ड में जगह के लिए मेहली मिस्त्री का समर्थन किया.

चर्चा के दौरान, कुछ ट्रस्टियों ने टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच पारदर्शिता और जानकारी के आदान-प्रदान को लेकर चिंता जताई. ईटी की रिपोर्ट के अनुसार कि इस बात पर सवाल उठाए गए थे कि क्या नॉमिनी डायरेक्टर, ट्रस्टियों को बोर्ड-लेवल के अहम मामलों के बारे में पूरी जानकारी दे रहे हैं या नहीं.

नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन ने नॉमिनी डायरेक्टर्स को उनके कार्यकाल के बीच में ही हटाने का विरोध किया. उन्होंने दलील दी कि नियुक्तियां एक तय इंस्टीट्यूशनल प्रोसेस के तहत ही होनी चाहिए. यह मीटिंग बिना किसी आम सहमति के ही खत्म हो गई.

मेहली मिस्त्री के वो बयान, जिनसे सामने आई दरार

सितंबर में हुई मीटिंग के मिनट्स के मुताबिक, मेहली मिस्त्री ने ट्रस्टियों से कहा कि उन्हें इस बात से “निराशा” हुई है कि नोएल टाटा ने, पिछली लीडरशिप चर्चाओं के दौरान उनके समर्थन के बावजूद, उनकी उम्मीदवारी का समर्थन नहीं किया. इस घटना ने रतन टाटा की मृत्यु के बाद टाटा ट्रस्ट्स के भीतर बढ़ती दरारों को उजागर किया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार कुछ ट्रस्टियों का मानना ​​था कि टाटा ट्रस्ट्स को टाटा संस के भीतर एक मजबूत आवाज की ज़रूरत है, क्योंकि ग्रुप के सामने बड़े रणनीतिक मुद्दे हैं, जिनमें गवर्नेंस से जुड़े सवाल और टाटा संस के अनलिस्टेड स्टेटस का भविष्य शामिल है.

एक महीने बाद यह टकराव और गहरा गया, जब ट्रस्टी के तौर पर मेहली मिस्त्री के कार्यकाल के नवीनीकरण का मामला सामने आया. नोएल टाटा, वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह द्वारा उनके कार्यकाल विस्तार का समर्थन किए जाने की संभावना कम थी, जिसका सीधा मतलब था कि टाटा ट्रस्ट्स में उनका कार्यकाल समाप्त हो जाएगा.

यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि टाटा ट्रस्ट्स में ट्रस्टियों की नियुक्तियां ऐतिहासिक रूप से सर्वसम्मति से की जाती रही हैं. मेहली मिस्त्री से जुड़ा यह मामला अब तक का सबसे स्पष्ट संकेत बन गया कि ट्रस्टों की स्ट्रक्चर के अंदर आंतरिक तालमेल बदल चुका है.

गवर्नेंस से जुड़ी चिंताएं बढ़ीं

अगले कुछ महीनों में, टाटा ट्रस्ट्स के भीतर होने वाली चर्चाएं बोर्ड में प्रतिनिधित्व के मुद्दे से आगे बढ़ गईं. नॉमिनी डायरेक्टर्स की भूमिका, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच बातचीत, गवर्नेंस के ढांचे, और इस बात पर बहस हुई कि क्या टाटा संस को एक अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी ही बने रहना चाहिए.

लिस्टिंग का मुद्दा इसलिए अहम हो गया, क्योंकि टाटा संस को ‘अपर-लेयर NBFC’ के तौर पर क्लासिफाई किए जाने के बाद, पहले IPO लाने की संभावनाओं पर रेगुलेटरी चर्चाएं फिर से शुरू हो गई थीं. इसी दौरान, टाटा ग्रुप एयर इंडिया, सेमीकंडक्टर्स, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल बिजनेस में भी भारी निवेश कर रहा था.

चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल का फैसला टल गया

इसके बाद, सारा ध्यान खुद टाटा संस पर आ गया. फरवरी 2026 में हुई टाटा संस की बोर्ड मीटिंग में, एन. चंद्रशेखरन को चेयरमैन के तौर पर तीसरा कार्यकाल दिए जाने का फैसला होने की उम्मीद थी. लेकिन, नए बिजनेस में हो रहे नुकसान, कर्ज के लेवल और पूंजी के बंटवारे पर हुई चर्चाओं के बाद, इस मामले को टाल दिया गया.

ईटी की रिपोर्ट के अनुसार नोएल टाटा ने एयर इंडिया को हो रहे नुकसान और नए बिजनेस में किए जा रहे निवेश को लेकर चिंता जताई. खुद चंद्रशेखरन ने ही इस चर्चा को टालने का सुझाव दिया, ताकि टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच बेहतर तालमेल बिठाया जा सके. इस फैसले के बाद, टाटा ग्रुप के ढांचे के भीतर और भी मतभेद होने की अटकलें तेज हो गईं.

इसके बाद कई बार फैसले टाले गए

अगले कुछ महीनों में, टाटा ट्रस्ट्स की कई अहम मीटिंग्स और गवर्नेंस से जुड़ी चर्चाओं को टाल दिया गया. आपसी मतभेद जारी रहने के कारण, ट्रस्टी से जुड़े मामलों, बोर्ड में नॉमिनेशन और गवर्नेंस से जुड़ी चर्चाओं में देरी की खबरें आईं. मई 2026 की शुरुआत में होने वाली टाटा ट्रस्ट्स की एक अहम मीटिंग को भी टाल दिया गया. इस मीटिंग में गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों, कानूनी चुनौतियों और ट्रस्टियों की नियुक्ति पर चर्चा होने की उम्मीद थी. रिपोर्ट के अनुसार, ट्रस्ट्स के भीतर गवर्नेंस से जुड़े मामलों पर चल रहे मतभेदों और कानूनी विवादों के चलते इस मीटिंग को टाला गया.

आज की बोर्ड मीटिंग से क्या उम्मीदें हैं?

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को होने वाली इस मीटिंग में चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल पर दोबारा चर्चा होने की उम्मीद नहीं है. इसके बजाय, ग्रुप के निवेश से जुड़े बड़े रणनीतिक मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. यह मीटिंग ऐसे समय में हो रही है, जब यह रिपोर्ट सामने आई है कि टाटा ग्रुप के अनलिस्टेड बिजनेस को वित्त वर्ष 2025 में 10,905 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है, और यह आंकड़ा अभी और बढ़ सकता है. इन चर्चाओं पर इसलिए भी सबकी नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि रतन टाटा के बाद टाटा ग्रुप के भीतर गवर्नेंस से जुड़े मुद्दों पर करीब 18 महीनों से तनाव चल रहा है, और यह मीटिंग उसी तनाव के बाद हो रही है.

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