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तुर्की ने चुपचाप बना ली ‘बिजली’ मिसाइल, निशाने पर पूरा भारत, बढ़ा दी नई दिल्ली की चिंता?

नई दिल्ली: भारत की चिंता बदमिजाज तुर्की ने बढ़ा दी है। वह एक ऐसी खतरनाक अंतर महाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल बना रहा है, जिसके निशाने पर भारत को बताया जा रहा है। दरअसल, हाल ही में तुर्की ने इस्तांबुल में SAHA 2026 रक्षा और अंतरिक्ष प्रदर्शनी में बेहद गुपचुप तरीके से अपनी नई अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल ‘यिल्दिरिमहान’ (बिजली) का अनावरण किया। यह मिसाइल तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन की इस्लामी महत्वाकांक्षा को दर्शाती है, जो पश्चिम एशिया तक ही सीमित नहीं है। एर्दोगन अक्सर पाकिस्तान का पक्ष लेते हुए कश्मीर में आतंकवाद को भी अलगाववाद बताकर जायज ठहराते रहे हैं।

तुर्की ने चुपचाप बना ली ‘बिजली’ मिसाइल, निशाने पर पूरा भारत, बढ़ा दी नई दिल्ली की चिंता?
तुर्की ने चुपचाप बना ली ‘बिजली’ मिसाइल, निशाने पर पूरा भारत, बढ़ा दी नई दिल्ली की चिंता?

तुर्की की मिसाइल के दायरे में पूरा भारत
संडे गार्जियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, 5 मई 2026 को तुर्की ने इस्तांबुल में SAHA 2026 में यिल्दिरिमहान (बिजली) अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल (ICBM) का अनावरण किया।

तुर्की के अधिकारियों ने कहा-यह नई मिसाइल 3,000 किलोग्राम का वारहेड 25 मैक की गति से ले जा सकती है। तुर्की का दावे अगर सही हैं तो वह इस साल के अंत में इस मिसाइल का परीक्षण करेगा। दावा है कि इससे यूरोप, अफ्रीका, पश्चिम एशिया और भारत का पूरा क्षेत्र तुर्की की मिसाइलों की मारक क्षमता के दायरे में आ जाएगा।

जब तैफून मिसाइल है तो फिर इसका टेस्ट क्यों
रिपोर्ट में कहा गया है कि तुर्की को इतनी मारक क्षमता की जरूरत क्यों है? जबकि तुर्की के प्रतिद्वंद्वी देश ग्रीस, साइप्रस, इजरायल, मिस्र, आर्मेनिया और ईरान सभी तुर्की की मौजूदा तैफून मिसाइलों की मारक क्षमता के दायरे में आते हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि देश अपनी सीमाओं पर हमला करने के लिए ICBM विकसित नहीं करते हैं। यिल्दिरिमहान की मारक क्षमता के भीतर एकमात्र संभावित नया लक्ष्य भारत है।

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यह संभावना नहीं है कि तुर्की को आइसलैंड या इंडोनेशिया पर हमला करने की आवश्यकता होगी। नाटो सदस्य होने के नाते तुर्की को रूस का मुकाबला करने के लिए अपनी खुद की लंबी दूरी की मिसाइलें विकसित करने की भी आवश्यकता नहीं होगी। इससे तुर्की का संभावित लक्ष्य भारत ही बचता है।

तुर्की पाकिस्तान को मानता है अपना बिरादर
डिफेंस एनालिस्ट लेफ्टिनेंट कर्नल (रिटायर्ड) जेएस सोढ़ी के अनुसार, तुर्की शुरुआत में भारत पर सीधा हमला नहीं करेगा, लेकिन वह पाकिस्तान की रक्षा करने और कश्मीर से प्रेरित आतंकवादियों के खिलाफ भारत की किसी भी जवाबी कार्रवाई को रोकने के लिए अपनी मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकता है।

एर्दोगन का इस्लामी झुकाव, किसी भी हिंदू शासन के प्रति उनकी शत्रुता, उनकी इस्लामी वर्चस्ववादी सोच और भारत को निशाना बनाने वाली मिसाइलों को विकसित करने के उनके प्रयास संकेत देते हैं कि अब तूफान मंडरा रहा है।

सोढ़ी बताते हैं कि तुर्की के इस कदम ने नई दिल्ली की चिंता जरूर बढ़ा दी होगी, क्योंकि तुर्की अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर अक्सर पाकिस्तान का सपोर्ट करता रहा है। इसके अलावा, खुद को इस्लामी खलीफा बनने की एर्दोगन की चाहत भी भारत के लिए टेंशन की बात है।

तुर्की भारत को अपना प्रतिद्वंद्वी मानता आया है। वह पाकिस्तान को अपना दोस्त मानता है। ऐसे में वह पाकिस्तान के लिए कुछ भी करेगा वाली स्थिति में है। तुर्की ने जो मिसाइल बनाई है, उनका एक मकसद कहीं न कहीं भारत को भी निशाना बनाना भी है। ऐसे में नई दिल्ली को भी इस मामले में सतर्क रहना चाहिए।

एर्दोगन ने कश्मीरी आतंकवाद को मुद्दा बनाया
एर्दोगन की इस्लामी महत्वाकांक्षा पश्चिम एशिया तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने कश्मीरी आतंकवाद को अपना मुद्दा बना लिया है। जिस तरह वे फ़िलिस्तीनियों द्वारा किए गए आतंकवाद को स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन्हें उनका मकसद जायज लगता है, उसी तरह वे कश्मीरियों को भी गलत नहीं मानते।

उनका मानना है कि कश्मीरी आतंकवाद जायज है। किसी भी सरकारी अधिकारी को, चाहे उसका धर्म कुछ भी हो, निशाना बनाना जायज है। बशर्ते वह किसी ऐसी गैर-मुस्लिम सरकार के अधीन हो जिसका मुसलमानों पर अधिकार हो। गैर-मुसलमानों की हत्या जायज है।

दरअसल, 2009 में जब एर्दोगन ने सूडानी राष्ट्रपति उमर अल-बशीर का स्वागत किया, तब उन्होंने अपनी सोच का संकेत दिया। वहीं, अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने उन पर नरसंहार का आरोप लगाया था। एर्दोगन ने जोर देकर कहा-एक मुसलमान नरसंहार नहीं कर सकता।

भारत पर मुसलमानों के शासन पर जोर देते हैं एर्दोगन
2020 में एर्दोगन ने जोर देकर कहते रहे हैं कि कश्मीर हमारे लिए उतना ही नजदीक है जितना तुर्की । बाद में उन्होंने कश्मीर को ‘ज्वलंत मुद्दा’ बताया। तुर्की कश्मीरी छात्रों को तुर्की शैली के इस्लामवाद में ढालने और संभवतः उन्हें सैन्य प्रशिक्षण देने के लिए छात्रवृत्तियां प्रदान कर रहा है। जिस तरह एर्दोगन नव-ओटोमनवाद को बढ़ावा देते हैं। उसी तरह वे नव-मुगलवाद में भी विश्वास रखते हैं। यानी यह विचार कि मुसलमानों को भारत पर शासन करना चाहिए।

इस्तांबुल के इमाम एर्दोगन की महत्वाकांक्षा
रिपोर्टों में कहा गया है कि दरअसल तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन एक कट्टर इस्लामी हैं। वह खुद को खलीफा घोषित करना चाहते हैं और इस्लाम का मसीहा बताना चाहता हैं।

इस्तांबुल के मेयर चुने जाने पर उन्होंने खुद को ‘इस्तांबुल का इमाम’ और ‘शरिया का सेवक’ बताया था। आखिर 1997 में एक रैली में धार्मिक कविता के माध्यम से सांप्रदायिक हिंसा भड़काने के कारण वे तुर्की की तत्कालीन धर्मनिरपेक्ष सरकार के शिकंजे में आ गए।

उन्होंने घोषणा की थीं-मस्जिदें हमारी बैरक हैं, गुंबद हमारे हेलमेट हैं, मीनारें हमारी संगीनें हैं और विश्वासी हमारे सैनिक हैं।
कुछ समय जेल में बिताने के बाद, उन्होंने वापसी की।
उन्होंने खुद को एक रूढ़िवादी टेक्नोक्रेट के रूप में स्थापित किया, जो अर्थव्यवस्था को सर्वोपरि मानता था।

संविधान और लोकतंत्र दोनों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमेशा अस्थिर रही। उन्होंने लोकतंत्र की तुलना एक ट्राम से की थी। उन्होंने समझाया-आप जितनी दूर जाना चाहें, जाइए और फिर उतर जाइए।

तुर्की की सत्ता में ऐसे आए एर्दोगन
नवंबर 2002 में, एर्दोगन की जस्टिस एंड डेवलपमेंट पार्टी (AKP) को तुर्की के चुनावों में 32 फीसदी वोट मिले, लेकिन चुनाव प्रणाली की एक अप्रत्याशित गड़बड़ी के कारण पार्टी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ, जिससे वह एरदोगन पर लगे चुनावी प्रतिबंध को हटाने और संविधान में बदलाव करने में सक्षम हो गई।
जबकि अमेरिकी और यूरोपीय अधिकारियों ने उनकी वापसी को कम करके आंका और तर्क दिया कि AKP किसी यूरोपीय क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी से अलग नहीं है। यह तुलना केवल एक कोरी कल्पना थी।

एर्दोगन ने इस्लामिक स्टेट का समर्थन कर फायदा उठाया
शुरुआत में धीरे-धीरे एर्दोगन ने लोकतांत्रिक नियंत्रण और संतुलन को कमजोर करना शुरू कर दिया। जैसे-जैसे उनकी स्थिति मजबूत होती गई, उन्होंने जिहाद के अलावा किसी भी प्राथमिकता का दिखावा करना छोड़ दिया।
उन्होंने तुर्की सेना को मुहम्मद की सेना बताया और इस्लामिक सहयोग संगठन की कमान तुर्कों को सौंपने की चाल चली। पर्दे के पीछे, तुर्की ने इस्लामिक स्टेट का समर्थन किया और उससे लाभ कमाया और फिर सीरिया में अल-कायदा से जुड़े एक संगठन को सहायता प्रदान की।

तुर्की ले रहा है हिजबुल्लाह की जगह
शांति लाने के बजाय अंतरिम राष्ट्रपति अहमद अल-शारा की हयात तहरीर अल-शाम सरकार ने अलावी और द्रुज जैसे धार्मिक अल्पसंख्यकों को व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया है। एर्दोगन ने कुर्दों के प्रति विशेष क्रूरता दिखाई और उन महिलाओं को मार डाला और उनके शरीर को क्षत-विक्षत कर दिया, जो मुस्लिम होते हुए भी अपने सशक्तिकरण से चरमपंथियों की भावनाओं को ठेस पहुंचाती थीं।
आज जब हिजबुल्लाह के लिए ईरान का समर्थन कमजोर पड़ रहा है, तो तुर्की ने उसकी जगह ले ली है। तुर्की हमास का नेतृत्व और समन्वय केंद्र भी बन गया है, क्योंकि हमास इजरायल के खिलाफ आतंकवाद की साजिशें रचता रहता है।

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