भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित 500 बिलियन डॉलर के ट्रेड और खरीद समझौते को लेकर नई बहस शुरू हो गई है. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दावा किया है कि भारत अगले पांच वर्षों में अमेरिका से ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर सामान खरीदेगा. रुबियो इन दिनों भारत दौरे पर हैं. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि भारत ने अमेरिका से 500 बिलियन डॉलर के सामान खरीदने की प्रतिबद्धता जताई है. उनके मुताबिक यह खरीद ऊर्जा, टेक्नोलॉजी और एग्रीकल्चर सेक्टर पर केंद्रित होगी.

ईटी की रिपोर्ट में ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि जिस ट्रेड स्ट्रक्चर के आधार पर यह डील तैयार हुई थी, वह अब लगभग खत्म हो चुका है. उनके मुताबिक भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौता एक खास टैरिफ व्यवस्था पर आधारित था, लेकिन अब वही व्यवस्था बदल गई है.
Khabar Monkey
दरअसल, फरवरी 2026 में दोनों देशों के बीच हुई बातचीत में अमेरिका ने भारतीय एक्सपोर्ट पर प्रस्तावित रेसिप्रोकल टैरिफ को 25% से घटाकर 18% करने का संकेत दिया था. बदले में भारत ने अमेरिका से बड़े पैमाने पर खरीदारी की बात कही थी, लेकिन 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने रेसिप्रोकल टैरिफ के कानूनी आधार को ही खारिज कर दिया. इसके बाद पूरा समीकरण बदल गया. ट्रंप प्रशासन ने US Trade Act 1974 के Section 122 के तहत सभी आयात पर समान 10% टैरिफ लगाने की दिशा में कदम बढ़ाया. इसका मतलब यह हुआ कि अब किसी एक देश को विशेष राहत या फायदा नहीं मिलेगा.
टैरिफ पर बात क्लीयर न होने से ट्रेड पर पड़ेगा असर
GTRI का कहना है कि जब सभी देशों पर एक जैसा टैरिफ लागू होगा, तब भारत को इस डील से मिलने वाला विशेष लाभ भी खत्म हो जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई अलग फायदा नहीं बचा, तो फिर भारत इतने बड़े खरीद समझौते के लिए क्यों तैयार होगा. रिपोर्ट में मलेशिया का उदाहरण भी दिया गया है. मार्च 2026 में मलेशिया ने भी अमेरिका के साथ अपना ट्रेड अरेंजमेंट खत्म कर दिया था. मलेशिया ने कहा था कि नई टैरिफ व्यवस्था के बाद पुराना समझौता नल एंड वॉयड यानी बेअसर हो चुका है.
GTRI ने भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर भी चिंता जताई है. रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक साल में रुपये में करीब 12% की कमजोरी आई है. इसके पीछे बढ़ती इंपोर्ट कॉस्ट, महंगे कच्चे तेल और विदेशी पूंजी निकासी जैसे कारण बताए गए हैं. ऐसे में यदि भारत अमेरिका से बड़े स्तर पर ऊर्जा, रक्षा उपकरण, विमान और कृषि उत्पाद खरीदता है, तो इससे ट्रेड डेफिसिट और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए थोड़ी चुनौती पैदा कर सकती है.
–





