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PM Modi Norway visit: नॉर्वे कैसे बना गैस का गढ़? अमेरिका-कतर के बीच पहचान बनाई, जहां पहुंचे PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश दौरे के क्रम में नार्वे पहुंच गए हैं. वहां उनका जोरदार स्वागत हुआ. 15 मई से शुरू हुए इस दौरे में पीएम पहले यूएई, नीदरलैंड, स्वीडन होते हुए नार्वे पहुंचे हैं. अमेरिका-ईरान के बीच चल रहे तनाव, डोनाल्ड ट्रम्प के चीन दौरे के बीच मोदी की यह विदेश यात्रा कई मायनों में महत्वपूर्ण होने वाली है. नॉर्वे को प्राकृतिक गैस के एक्सपोर्ट के लिए भी जाना जाता है. यह इस मामले में दुनिया में चौथे नम्बर पर है.

PM Modi Norway visit: नॉर्वे कैसे बना गैस का गढ़? अमेरिका-कतर के बीच पहचान बनाई, जहां पहुंचे PM मोदी
PM Modi Norway visit: नॉर्वे कैसे बना गैस का गढ़? अमेरिका-कतर के बीच पहचान बनाई, जहां पहुंचे PM मोदी

आइए, इस दौरे के बहाने नार्वे की आर्थिक ताकत के बारे में जानते हैं. यह छोटा सा देश कैसे गैस का गढ़ बन गया? कैसे अमेरिका, रूस और कतर के बीच अपनी पहचान को मजबूती दी? कितने देशों तक पहुंचती है नार्वे की गैस?

नॉर्थ-सी ने बदली नार्वे की किस्मत

नॉर्वे आज दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस निर्यातकों में गिना जाता है. इसका नाम अक्सर अमेरिका, रूस और कतर के साथ लिया जाता है. यह पहचान एक दिन में नहीं बनी. इसके पीछे समुद्र के नीचे छिपे संसाधन, लंबे समय की नीति और जिम्मेदार प्रबंधन है.

नॉर्वे के पास बड़ा तटीय इलाका है. इसके आसपास नॉर्थ सी और नॉर्वेजियन सी जैसे समुद्री क्षेत्र हैं. 1960-70 के दशक में यहां तेल और गैस की खोज तेज हुई. बड़े भंडार मिलने लगे. यहीं से नॉर्वे की ऊर्जा यात्रा ने रफ्तार पकड़ी. उसने समुद्र के भीतर उत्पादन की तकनीक पर ध्यान दिया. कठोर मौसम और गहरे पानी में काम करने की क्षमता विकसित की.

नॉर्वे में 1960-70 के दशक में तेल और गैस की खोज तेज हुई.

संसाधन पर देश के नियंत्रण का नियम

नॉर्वे ने शुरुआत से साफ नीति रखी. प्राकृतिक संसाधन देश की संपत्ति हैं. कंपनियां काम कर सकती हैं. पर, नियम सरकार तय करेगी. इससे दो फायदे हुए. पहला, राजस्व का बड़ा हिस्सा देश को मिला. दूसरा, सुरक्षा और पर्यावरण मानकों पर नियंत्रण बना रहा.नॉर्वे ने एक मजबूत राष्ट्रीय ऊर्जा कंपनी का ढांचा बनाया. पहले इसे स्टेट ऑयल के नाम से जाना गया. आज यह इक्विनोर कहलाती है. राष्ट्रीय कंपनी का मतलब यह नहीं था कि विदेशी कंपनियां बाहर हो जाएं. नॉर्वे ने साझेदारी का रास्ता चुना. जहां जरूरी था वहां वैश्विक विशेषज्ञता ली. जहां जरूरी था वहां राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी.

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तकनीक और इंफ्रास्ट्रक्चर का संगम बना ताकत

गैस सिर्फ निकालने से निर्यातक नहीं बनती. गैस को ग्राहक तक पहुंचाना पड़ता है. नॉर्वे ने इसी जगह पर सबसे बड़ा निवेश किया. उसने समुद्र के नीचे लंबा पाइपलाइन नेटवर्क बनाया. इस नेटवर्क ने नॉर्वे को यूरोप के बड़े गैस बाजार से जोड़ दिया. पाइप लाइन गैस का फायदा यह होता है कि सप्लाई अपेक्षाकृत स्थिर रहती है. कीमत और जोखिम पर भी बेहतर नियंत्रण रहता है.

यूरोप में गैस की मांग ने दी नार्वे को मजबूती

यूरोप लंबे समय से ऊर्जा आयात पर निर्भर रहा है. वहां उद्योग, हीटिंग और बिजली उत्पादन में गैस की भूमिका रही है. नॉर्वे समुद्री सीमा से जुड़ा है. पाइप लाइन से सीधा कनेक्शन बना सकता है. यही कारण है कि यूरोप नॉर्वे का सबसे बड़ा ग्राहक क्षेत्र बना.

ऊर्जा बाजार अक्सर भू-राजनीति से प्रभावित होता है. कई बार सप्लाई पर अनिश्चितता बढ़ती है. ऐसे समय में ग्राहक विश्वसनीय सप्लायर तलाशते हैं. नॉर्वे ने खुद को भरोसेमंद दिखाया और उसे साबित भी किया. उसने अनुबंध, डिलीवरी और गुणवत्ता पर निरंतरता रखी. इसी वजह से दुनिया में उसकी अलग तरह की पहचान बनी.

नॉर्वे की खासियत यह है कि वह यूरोप को बड़े पैमाने पर पाइप लाइन से गैस दे सकता है.

कतर और रूस से अलग है खासियत

कतर बड़े पैमाने पर तरलीकृत गैस (एलएनजी) के लिए जाना जाता है. रूस ऐतिहासिक रूप से पाइप लाइन सप्लाई का बड़ा खिलाड़ी रहा है. नॉर्वे की खासियत यह बनी कि वह यूरोप को बड़े पैमाने पर पाइप लाइन गैस दे सकता है. साथ ही वह अपने नियमों और बाजार-आधारित तरीके पर चलता है. यही संतुलन उसे अलग बनाता है.

देश हुआ मालामाल

समुद्र में उत्पादन जोखिम भरा होता है. रिसाव और दुर्घटना का खतरा रहता है. नॉर्वे ने सुरक्षा नियम कड़े रखे. उसने निगरानी प्रणालियां मजबूत की. टेक्नोलॉजी में निवेश किया. पर्यावरणीय प्रभाव कम करने की दिशा में कदम उठाए. यह पूरी तरह शून्य प्रभाव नहीं है. पर, मानक ऊंचे माने जाते हैं.

ऊर्जा से कमाई बढ़ी. कई देशों में ऐसी कमाई जल्दी खर्च हो जाती है. नॉर्वे ने अलग रास्ता चुना.उसने सरकारी निवेश फंड के जरिए बचत और निवेश की संस्कृति बनाई. उद्देश्य था कि आज की कमाई से आने वाली पीढ़ियों को भी लाभ मिले. इसने नॉर्वे की अर्थव्यवस्था को स्थिरता दी.

नॉर्वे की करंसी.

नॉर्वे गैस कितने देशों को भेजता है?

नॉर्वे की गैस मुख्य रूप से यूरोप के कई देशों तक जाती है. नॉर्वे जिन प्रमुख देशों को सीधे या यूरोपीय नेटवर्क के जरिए गैस देता है, उनमें यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी, फ्रांस, बेल्जियम, नीदरलैंड्स, डेनमार्क, पोलैंड आदि शामिल हैं. देशों का सटीक आंकड़ा साल-दर-साल बदल सकता है. कारण यह है कि कुछ गैस सीधे जाती है, कुछ यूरोप के इंटर कनेक्टेड नेटवर्क के जरिए आगे बढ़ती है. व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो नॉर्वे की गैस यूरोप के बड़े हिस्से तक पहुंचती है. देशों की संख्या कभी कुछ कम या कभी कुछ ज्यादा हो सकती है.

नॉर्वे पहुंचे पीएम मोदी

भारत के लिए क्या हैं मायने?

भारत एक बड़ा ऊर्जा आयातक देश है. भारत एलएनजी के जरिए प्राकृतिक गैस खरीदता है. नॉर्वे जैसे देश ऊर्जा के साथ-साथ तकनीक, समुद्री इंजीनियरिंग, और क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन में भी सहयोग दे सकते हैं. आज दुनिया ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा दोनों पर साथ-साथ काम कर रही है. ऐसे में नॉर्वे का अनुभव महत्वपूर्ण बनता है.

सरल शब्दों में कहें तो नॉर्वे गैस का गढ़ इसलिए बना क्योंकि उसने तीन बातों पर लगातार काम किया. स्पष्ट और स्थिर नीति, मजबूत तकनीक और पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर और भरोसेमंद सप्लायर की छवि को कायम किया. इस पर उसका फोकस लगातार बना हुआ है. नतीजे में उसे आर्थिक मजबूती मिल रही है. अपनी इन्हीं नीतियों के मिश्रण से उसने अमेरिका, रूस और कतर जैसे बड़े नामों के बीच अपनी अलग पहचान बना ली है.

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