नई दिल्ली। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अधिकारी कागजी घोड़े दौड़ाते रहे और देशभर में वाहन नियमों को रौंदते हुए सड़क दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं। यात्री सुरक्षा से जुड़े ऐसे कई नियम-कानूनों की अवहेलना का मुद्दा सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु से जुड़ी जनहित याचिका के माध्यम से पहुंचा तो सुनवाई के दौरान बेपरवाह और ढुलमुल सरकारी तंत्र बेपर्दा हो गया।

सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए आदेश दिया है कि सार्वजनिक सेवा के वाहनों में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (वीएलटीडी) और पैनिक बटन के मामले में अब कोई बहानेबाजी नहीं चलेगी। मोटर वाहन अधिनियम की धारा 56 के अंतर्गत फिटनेस प्रमाण पत्र तथा धारा 66 के अंतर्गत परमिट तभी जारी किया जाए, जब वाहन पोर्टल पर वीएलटीडी की स्थापना और कार्यशीलता का सत्यापन हो चुका हो।
कोर्ट ने आदेश दिया है कि 31 दिसंबर 2018 तक पंजीकृत पुराने वाहनों में भी वीएलटीडी और पैनिक बटन की रेट्रोफिटिंग सुनिश्चित की जाए। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को इस मामले की न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने सुनवाई की और अधिवक्ता एवं सड़क सुरक्षा कार्यकर्ता केसी जैन ने बहस की। न्यायालय द्वारा नियुक्त अमाइकस क्यूरी गौरव अग्रवाल ने भी पक्ष रखा।
कोर्ट में तथ्य रखे गए कि केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 125एच के अंतर्गत सभी सार्वजनिक सेवा वाहनों में वाहन लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस और आपातकालीन पैनिक बटन लगाना वर्षों पहले अनिवार्य किया गया था, परंतु आज भी 99 प्रतिशत से अधिक सार्वजनिक वाहन इस नियम का पालन किए बिना सड़कों पर चल रहे हैं।
वीएलटीडी और पैनिक बटन की स्थापना सुनिश्चित करें राज्य- SC
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने 19 दिसंबर, 2025 को सभी राज्यों को पत्र लिखकर कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया था। एक जनवरी 2026 से वाहन पोर्टल पर वीएलटीडी की अनिवार्य जांच भी लागू की गई है। इसके बावजूद स्थिति संतोषजनक नहीं है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि सभी राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश नए और पुराने दोनों प्रकार के सार्वजनिक सेवा वाहनों में समयबद्ध एवं सत्यापन तरीके से वीएलटीडी और पैनिक बटन की स्थापना सुनिश्चित करें।
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फिटनेस प्रमाण पत्र और परमिट तभी जारी किया जाए, जब वाहन पोर्टल पर वीएलटीडी की स्थापना और कार्यशीलता का सत्यापन हो चुका हो। साथ ही केंद्र सरकार वाहन निर्माताओं को विनिर्माण अथवा वितरण के समय ही वीएलटीडी लगाने के बाध्यकारी निर्देश जारी करे, क्योंकि यह दायित्व केवल राज्यों पर नहीं छोड़ा जा सकता। 95 प्रतिशत वाहनों में स्पीड गवर्नर न होने का मुद्दा भी आया।
2015 के बाद निर्मित सभी परिवहन वाहनों एसएलडी लगाना अनिवार्य
बताया गया कि एक अक्टूबर 2015 के बाद निर्मित सभी परिवहन वाहनों में स्पीड लिमिटिंग डिवाइस (एसएलडी) लगाना अनिवार्य है। सरकारी आंकड़े हैं कि देश के 2.18 करोड़ परिवहन वाहनों में से केवल 10.70 लाख में एसएलडी लगे हैं। यह अत्यधिक गति सड़क दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण है। इस पर न्यायालय ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार सभी वाहन निर्माताओं को निर्माण व वितरण के समय ही एसएलडी लगाने के अनिवार्य एवं बाध्यकारी निर्देश दे तथा पर्याप्त दंड के प्रविधान सहित अनुपालन सुनिश्चित करे।
राज्य सरकारों से वाहन या परिवहन पोर्टल के सत्यापित आंकड़ों सहित एक ताजा शपथ-पत्र दाखिल करने के निर्देश सहित कहा है कि विचार करें कि नियम 118 का उल्लंघन करने वाले वाहनों को फिटनेस प्रमाण पत्र देने से इन्कार किया जाए और पंजीकरण निलंबित किया जाए।
राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड गठन के लिए तीन माह का अंतिम अवसर
सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 215बी के अंतर्गत राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा बोर्ड का गठन अनिवार्य है। पिछले छह वर्षों से यह बोर्ड केवल कागजों पर ही है। न अध्यक्ष, न सदस्य, न कार्यालय, न वेबसाइट। 14 मई, 2025 को सुप्रीम कोर्ट से सरकार ने नौ महीने का समय मांगा था।
न्यायालय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए मात्र छह महीने का समय दिया और कहा था कि आगे और समय नहीं दिया जाएगा, परंतु वह 6 महीने का समय भी बीत गया। अक्टूबर 2025 में बोर्ड के नियम तो अधिसूचित हो गए, लेकिन अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति अभी भी अटकी है।
न्यायालय ने इसे गंभीर चूक बताते हुए केंद्र सरकार को अंतिम अवसर के रूप में केवल तीन महीने का समय दिया है। अगली सुनवाई तीन सितंबर, 2026 को निर्धारित की गई है।





