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इधर मुगल, उधर पुर्तगाली, छत्रपति संभाजी ने कैसे दिया मुंहतोड़ जवाब? मराठा साम्राज्य को झुकने नहीं दिया

मराठा इतिहास में छत्रपति संभाजी अजेय योद्धा थे. विश्वासघात से वे बंदी बनाए गए. औरंगजेब चाहता था कि इस्लाम कुबूल कर उसकी अधीनता स्वीकार करें. इनकार पर जुबान खिंचवा ली. आंखें फोड़ दीं. शरीर के टुकड़े करवा दिए. लेकिन आखिरी सांस तक संभाजी का जवाब इनकार का था. संभाजी का जीवन विवादों, संघर्षों और त्रासदियों से भरपूर था.

इधर मुगल, उधर पुर्तगाली, छत्रपति संभाजी ने कैसे दिया मुंहतोड़ जवाब? मराठा साम्राज्य को झुकने नहीं दिया
इधर मुगल, उधर पुर्तगाली, छत्रपति संभाजी ने कैसे दिया मुंहतोड़ जवाब? मराठा साम्राज्य को झुकने नहीं दिया

वे केवल छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र भर नहीं थे, बल्कि ऐसे योद्धा थे जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय युद्ध, राजनीतिक षड्यंत्र, पारिवारिक मतभेद और साम्राज्य से संघर्ष में बिताया. 14 मई 1657 को जन्मे संभाजी का जीवन एक ऐसे राजकुमार की कथा है जो बचपन से ही असाधारण परिस्थितियों में ढलता गया और अंततः अमानवीय यातनाओं के सामने भी नहीं झुका.

फरारी के लिए शिवाजी की मौत की झूठी खबर

नौ साल की उम्र में संभाजी के जीवन में ऐसी घटना घटित हुई, जिसने उनके मन और पिता से रिश्तों पर गहरा असर छोड़ा. 1666 में शिवाजी आगरा औरंगजेब के दरबार में पहुंचे. पुत्र संभाजी उनके साथ थे. दरबार में शिवाजी का अपमान हुआ और उन्हें नजरबंद कर दिया गया. इसके बाद शिवाजी ने एक अत्यंत साहसी योजना बनाई और फलों की टोकरियों में छिपकर आगरा से निकल भागे. संभाजी पीछे छूट गए. बाद में पिता का दरबारी रघुनाथ संभाजी को मथुरा ले आया. आगरा से शिवाजी की फरारी के दो सप्ताह पहले से संभाजी को जब भी पिता से मिलाने ले जाया गया, उन्होंने पिता को बिस्तर पर बीमार और चादर से ढका पाया था.

एक दोपहर पिता की मृत्यु की बात भी सुनी. लेकिन असलियत कुछ और थी. कवींद्र परमानंद द्वारा आमंत्रित ब्राह्मणों के साथ शिवाजी पहले से ही आगरा से निकल चुके थे. औरंगजेब और उसके सिपाहियों को भ्रम में रखने के लिए शिवाजी की बीमारी और मौत की खबर फैलाई गई थी. जब तक औरंगजेब को असलियत पता चली तब तक शिवाजी उसकी पहुंच से दूर अपने इलाके में पहुंच चुके थे.

छत्रपति शिवाजी.

वेश बदल मुश्किलों बीच संभाजी की वापसी

शिवाजी की रणनीति सफल रही. उनकी फरारी ने औरंगजेब को क्रुद्ध कर दिया. लेकिन संभाजी के बाल मन पर पिता के छोड़कर चले जाने की कसक बनी रही. हालांकि वास्तविकता ऐसी नहीं थी. औरंगजेब के कब्जे से संभाजी को साथ लेकर निकलना संभव नहीं था. उन्होंने संभाजी को सुरक्षित निकालने का दायित्व रघुनाथ को दिया. फिर केशव त्रिमल, कवि कलश उनसे जुड़े.

उधर क्रुद्ध औरंगजेब के घुड़सवार सिपाही और दूर तक फैले जासूस शिवाजी और संभाजी की तलाश में रास्ते फैले हुए थे. शिवाजी तो अब सुरक्षित थे. संभाजी को उन तक पहुंचाने की जिम्मेदारी त्रिमल भाइयों केशव और विश्वनाथ ने संभाली. संभाजी के साथ ही दोनों भाइयों ने सिर मुंडवाया. ब्राह्मण वेश धारण किया. खेतों-जंगलों के मुश्किल रास्ते वे आगे बढ़ते रहे. बाल बढ़ रहे थे. एक गांव में नाई मिला. संभाजी का सिर घोंटते मराठी में बोला. संभाजी बोल देते तो पकड़े जाते. उन्होंने और दोनों साथियों ने न समझने का अभिनय किया. वह मुगल जासूस था. मुसीबतें और भी आईं. लेकिन आखिर संभाजी सुरक्षित पिता आबा साहब के पास पहुंच गए.

छत्रपति शिवाजी महाराज और मां जीजाबाई.

दादी जीजाबाई के निधन ने संभाजी को किया उपेक्षित

शिवाजी के राज्याभिषेक के ग्यारहवें दिन राजमाता जीजा बाई का निधन हो गया. संभाजी की मां का पहले ही निधन हो चुका था. दादी राजमाता जीजा बाई का उन्हें संरक्षण था. अब सौतेली माताओं सोयला,पुतला, सकवार के वे बीच थे. राजदरबार में राजनीतिक दांवपेंच शुरू हो चुके थे. जीजा बाई के निधन के बाद महात्वाकांक्षी महारानी सोयला पर कोई अंकुश नहीं था. शिवाजी का भी सोयला के प्रति विशेष प्रेमभाव था.

सोयला अपने पुत्र राजाराम को सिंहासन का उतराधिकारी मानती थीं. उसकी कोशिश संभाजी को पिता से दूर रखने की रहती थी. औरंगजेब के कब्जे में छोड़ आने की संभाजी के मन में पहले से ही गांठ थी. विमाता सोयला बाई के बढ़ते प्रभाव के कारण संभाजी अपने को और भी उपेक्षित अनुभव कर रहे थे. संभाजी का उग्र स्वभाव भी पिता को खिन्न करता था. यद्यपि वे अत्यंत प्रतिभाशाली और साहसी योद्धा थे, किंतु अनुशासन के मामले में पिता का कठोर नियंत्रण स्वीकार नहीं करते थे. दूसरी ओर शिवाजी एक संगठित और संयमित राज्यव्यवस्था बनाना चाहते थे, जबकि संभाजी अधिक आक्रामक और आवेगी थे.

ऐसा भी समय आया जब संभाजी कुछ समय के लिए मुगल सेनापति दिलेर खान के शिविर में चले गए. यह घटना शिवाजी के लिए अत्यंत पीड़ादायक थी. हालांकि बाद में संभाजी वापस लौट आए, लेकिन इससे पिता-पुत्र के संबंधों में अविश्वास बढ़ा. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि संभाजी स्वयं को उपेक्षित महसूस करते थे. वे युद्धभूमि में अपनी क्षमता सिद्ध कर चुके थे, लेकिन दरबार में लगातार षड्यंत्रों का सामना कर रहे थे.

दूसरी ओर शिवाजी को भय था कि संभाजी का उग्र स्वभाव भविष्य में राज्य के लिए संकट पैदा कर सकता है. यही कारण था कि पिता – पुत्र के बीच आमतौर पर दूरी बनी रही. फिर भी यह कहना गलत होगा कि दोनों एक-दूसरे के विरोधी थे. शिवाजी संभाजी की प्रतिभा से परिचित थे और संभाजी अपने पिता की महानता को समझते थे. उनके मतभेद राजनीतिक और स्वभावगत अधिक थे.

संभाजी महाराज.

गद्दी पर बैठते ही चौतरफा संघर्ष

1680 में शिवाजी का निधन हुआ. इसके बाद मराठा दरबार में उत्तराधिकार का संघर्ष छिड़ गया. सोयराबाई गुट ने राजाराम को गद्दी पर बैठाने की कोशिश की. लेकिन संभाजी ने तेजी से परिस्थिति पर नियंत्रण स्थापित किया और अंततः छत्रपति बने. सत्ता संभालते ही उन्हें चारों ओर से चुनौतियां मिलीं. मुगल साम्राज्य मराठों को समाप्त करना चाहता था. दक्षिण में सिद्दी, पुर्तगाली और अन्य शक्तियां भी सक्रिय थीं. अंदरूनी षड्यंत्र अलग थे. ऐसे कठिन समय में संभाजी ने मराठा राज्य की रक्षा का दायित्व संभाला.संभाजी ने आक्रामक नीति अपनाई. उनके नेतृत्व में मराठा सेनाओं ने मुगलों पर लगातार हमले किए. उन्होंने बुरहानपुर जैसे समृद्ध मुगल नगर पर आक्रमण कर भारी क्षति पहुंचाई. यह हमला मुगलों के लिए बड़ा झटका था.

मुगल बादशाह औरंगजेब.

मुगलों से ही नहीं पुर्तगालियों से भी लिया मोर्चा

संभाजी के हमले मुगलों तक ही सीमित नहीं रहे. उन्होंने पुर्तगालियों के विरुद्ध भी आक्रामक अभियान चलाया. गोवा के आसपास मराठा दबाव बढ़ा. सिद्दियों के विरुद्ध भी उन्होंने संघर्ष जारी रखा. सबसे बड़ी बात यह थी कि संभाजी ने उस समय औरंगजेब को सीधी चुनौती दी जब मुगल साम्राज्य अपनी शक्ति के चरम पर था. स्वयं औरंगजेब दक्षिण में उतर आया था और उसने मराठा शक्ति को समाप्त करने का संकल्प ले लिया था. लेकिन संभाजी ने लगभग नौ वर्षों तक उसे निर्णायक सफलता नहीं मिलने दी. संभाजी की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि उन्होंने शिवाजी द्वारा स्थापित मराठा राज्य को टूटने नहीं दिया. यदि वे प्रारंभिक वर्षों में दृढ़ता न दिखाते तो संभव था कि मराठा शक्ति शीघ्र समाप्त हो जाती.

उनकी युद्ध क्षमता, साहस और त्वरित निर्णय लेने की शक्ति असाधारण थी. वे स्वयं युद्धभूमि में उतरते थे. सैनिकों में उनका प्रभाव था. लेकिन उनकी सीमाएं भी थीं. वे अपने पिता की तरह दीर्घकालिक कूटनीतिक संतुलन बनाने में उतने सफल नहीं रहे. कई बार उनका कठोर व्यवहार सहयोगियों को दूर कर देता था. दरबार के भीतर भी वे पूर्ण स्थिरता स्थापित नहीं कर पाए. अपने शासनकाल का अधिकांश समय उन्होंने युद्धों में बिताया. ऐसे समय में राज्य को बचाए रखना उनकी बड़ी उपलब्धि थी.

Khabar Monkey

विश्वासघात ने बनाया बंदी

1689 में संभाजी के जीवन का सबसे दुखद अध्याय शुरू हुआ. वे संगमेश्वर में थे, तभी मुगल सेना ने अचानक हमला किया. परिवार ने विश्वासघात किया. संभाजी और उनके निकट सहयोगी कवि कलश बंदी बना लिए गए.उन्हें औरंगजेब के सामने प्रस्तुत किया गया. मुगल सम्राट चाहता था कि संभाजी इस्लाम कुबूल करें और मराठा प्रतिरोध समाप्त हो जाए. लेकिन संभाजी ने झुकने से इनकार कर दिया.इसके बाद अमानवीय यातनाओं का सिलसिला शुरू हुआ.

मेधा देशमुख भास्करन ने अपनी किताब “संभाजी महाराज ” में लिखा कि अस्थायी तंबू में बैठे औरंगजेब की निगाहें जंजीरों में जकड़े संभाजी पर टिकी हुई थीं. एक मोटा व्यक्ति मिट्टी के पात्र जिसमें अंगारे दहक रहे थे, लेकर संभाजी के पास पहुंच जोर से चिल्लाया कि मुंह खोलो. संभाजी ने उसे हिकारत से देखा. अब तक इन अंगारों पर रखा चिमटा दहक कर लाल हो चुका था. बेसब्र दरबारी खुशी में शोर कर रहे थे. तब तक जुल्फिकार आगे बढ़ा. बेरहमी से उनके गाल दबाए और चिमटे के बीच दबी जुबान बाहर खींच ली.

संभाजी के बलिदान बाद मराठों का संघर्ष और तेज हुआ

संभाजी पर अमानुषिक यातनाएं यहीं नहीं थमीं. असहनीय दर्द के बीच सुरंग में एक बार वे फिर सलाखों के पीछे डाल दिए गए. होश आने पर उन्हें सलाखों के पार औरंगजेब खड़ा दिखता है. भास्करन ने लिखा, “संभाजी लड़खड़ा रहे थे लेकिन खुद को संभाल लिया. बिना डरे उन्होंने औरंगजेब से आंखें मिलाईं. औरंगजेब इसका आदी नहीं था. उसने कहा, “अभी इसके तेवर ढीले नहीं पड़े हैं. इसकी आंखें निकालने का समय आ गया है.” आगे महारानी येसु को रायगढ़ में खबर मिलती है कि मुगलों ने पति संभाजी की पहले जुबान और फिर आंखें निकाल लीं. साथी कवि कलश के साथ भी ऐसी ही क्रूरता की. बाद में कोरेगांव की छावनी में संभाजी के एक-एक अंग काट दिए. इसके साथ ही 11 मार्च 1689 को छत्रपति संभाजी का जीवन और नौ साल का शासन समाप्त हो गया.

औरंगजेब ने सोचा था कि संभाजी की मृत्यु के बाद मराठा शक्ति टूट जाएगी. लेकिन हुआ इसका उल्टा. मराठों ने और अधिक तीव्र संघर्ष शुरू कर दिया. बाद में यही संघर्ष मुगल साम्राज्य की थकान और पतन का बड़ा कारण बना. आगे राजाराम, ताराबाई और मराठा सेनानायकों ने संघर्ष जारी रखा. अंततः वही मराठा शक्ति आगे चलकर पूरे भारत में प्रभावशाली बनी. वे अपने पिता शिवाजी की विराट छाया में जन्मे, किंतु उन्होंने अपने बलिदान से स्वयं को इतिहास में अमर कर लिया.

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