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जब भी कोई देश मिडिल ईस्ट से तेल खरीदता है तो पेमेंट अमेरिकी डॉलर में ही क्यों होती है? समझिए इसके पीछे की वजह

दुनिया में सबसे ज्यादा कच्चा तेल मिडिल ईस्ट के देशों में निकलता है, लेकिन जब भारत, चीन, जापान या यूरोप जैसे देश तेल खरीदते हैं तो भुगतान अमेरिकी डॉलर में ही करना पड़ता है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर तेल अरब देशों का है, फिर अमेरिकी डॉलर का दबदबा क्यों है? इसके पीछे छिपी है दुनिया की सबसे ताकतवर फाइनेंशियल सिस्टम, जिसे पेट्रो-डॉलर सिस्टम कहा जाता है।

Khabar Monkey

जब भी कोई देश मिडिल ईस्ट से तेल खरीदता है तो पेमेंट अमेरिकी डॉलर में ही क्यों होती है? समझिए इसके पीछे की वजह
जब भी कोई देश मिडिल ईस्ट से तेल खरीदता है तो पेमेंट अमेरिकी डॉलर में ही क्यों होती है? समझिए इसके पीछे की वजह

पेट्रो-डॉलर सिस्टम की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी। उस समय अमेरिका और सऊदी अरब के बीच एक अहम समझौता हुआ। इस डील के तहत सऊदी अरब ने फैसला किया कि वह दुनिया को तेल केवल अमेरिकी डॉलर में ही बेचेगा। बदले में अमेरिका ने सऊदी अरब को सैन्य सुरक्षा और राजनीतिक सपोर्ट देने का वादा किया। यहीं से अमेरिकी डॉलर की ताकत पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ने लगी।

तेल खरीदने के लिए पहले खरीदना पड़ता है डॉलर

इस सिस्टम का सबसे बड़ा असर यह हुआ कि अब दुनिया का कोई भी देश अगर तेल खरीदना चाहता है, तो उसे सबसे पहले अमेरिकी डॉलर की जरूरत पड़ती है। उदाहरण के तौर पर भारत को अगर सऊदी अरब से तेल खरीदना है, तो पहले उसे अपने रुपये बेचकर डॉलर खरीदना होगा। यानी तेल व्यापार ने डॉलर की मांग को पूरी दुनिया में स्थायी बना दिया। यही कारण है कि अमेरिकी डॉलर आज दुनिया की सबसे मजबूत और सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली करेंसी बन चुका है।

अमेरिका को कैसे मिलता है फायदा?

पेट्रो-डॉलर सिस्टम से अमेरिका को बड़ा फाइनेंशियल फायदा मिलता है। तेल बेचकर अरब देशों को जो भारी मुनाफा होता है, उसका बड़ा हिस्सा फिर अमेरिका में ही निवेश किया जाता है। यह पैसा अमेरिकी बैंकों, बॉन्ड्स और दूसरी संपत्तियों में लगाया जाता है। इससे अमेरिका को लगातार विदेशी पैसा मिलता रहता है और वह भारी कर्ज लेने के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाए रखता है।

अब क्यों बढ़ रही है चिंता?

हाल के वर्षों में कई देशों को डर सताने लगा है कि कहीं उनका पैसा अमेरिकी फाइनेंशियल सिस्टम में फंस न जाए। अमेरिका के पास यह ताकत है कि वह किसी देश पर प्रतिबंध लगाकर उसके डॉलर आधारित लेनदेन को रोक सकता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के अरबों डॉलर के विदेशी रिजर्व फ्रीज कर दिए गए थे। ईरान पर भी लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंध लगे हुए हैं। कई देशों को SWIFT जैसे इंटरनेशनल पेमेंट सिस्टम से बाहर किया गया। इसी वजह से अब कई देश डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

दुनिया खोज रही है नया विकल्प

चीन अब कुछ देशों से अपनी मुद्रा युआन में तेल खरीद रहा है। रूस भी डॉलर से दूरी बनाने की कोशिश कर रहा है। इसके अलावा कई देश अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं ताकि भविष्य में डॉलर पर निर्भरता कम हो सके। एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया में सिर्फ तेल की नहीं, बल्कि भरोसे और फाइनेंशियल ताकत की लड़ाई होगी।

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