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Mahashivratri 2026: जब महादेव ने तोड़ा मां गंगा का अभिमान, जानें शिव पुराण की रोचक कथा

Mahashivratri 2026: जब महादेव ने तोड़ा मां गंगा का अभिमान, जानें शिव पुराण की रोचक कथा
Mahashivratri 2026: जब महादेव ने तोड़ा मां गंगा का अभिमान, जानें शिव पुराण की रोचक कथा

शिव और मां गंगा की कथाImage Credit source: Unplash

Shiv Aur Maa Ganga Ki Katha: हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है. साल 2026 में ये पर्व कल यानी 15 फरवरी को मनाया जाने वाला है. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इस दिन इन दोनों की विशेष पूजा और व्रत किया जाता है. इस दिन शिवलिंग का रुद्राभिषेक किया जाता है. महाशिवरात्रि पर रुद्राभिषेक करने से भगवान शिव अति प्रसन्न होते हैं.

मान्यताओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव का रुद्राभिषेक विशेष और बहुत पुण्य फलदायी माना गया है. महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव से जुड़ी कई कथाएं सुनाई जाती हैं. ऐसे में आइए जानते हैं भगवान शिव और मां गंगा की वो कथा जब महादेव ने मां गंगा का अभिमान तोड़ा था और वो महादेव की जटाओं में समा गईं थीं.

कथा के अनुसार…

हिंदू धर्म में गंगा को केवल एक नदी नहीं, बल्कि मां माना जाता है. कथा के अनुसार,भागीरथ इक्ष्वाकु वंश के राजा थे. उनके पूर्वजों (सगर के 60,000 पुत्रों) को कपिल मुनि ने श्राप दिया था, जिस कारण उनको मुक्ति नहीं मिल पा रही थी. उनकी आत्मा की शांति के लिए गंगाजल ही एकमात्र रास्ता था. वाल्मीकि रामायण के बाल कांड के अनुसार, भागीरथ ने मां गंगा को धरती पर लाने के लिए हजारों वर्षों तक कठिन तप किया.

भागीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर मां गंगा धरती पर आने के लिए राजी हो गईं, लेकिन उनका वेग सबसे बड़ी समस्या थी. क्योंकि अगर मां गंगा अपने वेग के साथ स्वर्ग से धरती पर सीधे गिरतीं तो धरती उनकी गति सह नहीं पाती और रसातल में समा जाती. शिव पुराण के अनुसार, मां गंगा को अपने वेग पर अभिमान भी था. उनको लगा कि वो महादेव को भी अपने वेग में बहा लेंगी. भागीरथ ये संकट देखकर शिव जी की शरण में गए.

शिव की जटाओं में ही उलझी रहीं गंगा

शिव जी जानते थे कि गंगा के वेग को नियंत्रित करना आवश्यक है. गंगा जैसे ही अहंकार के साथ स्वर्ग से नीचे गिरीं, शिव जी ने अपनी विशाल जटाएं खोल दीं. गंगा उनकी घनी जटाओं में पूरी तरह उलझ गईं. वो शिव जी की जटाओं में कैद हो गईं और बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं ढूंढ पायीं. कई वर्षों तक वो शिव की जटाओं में ही उलझी रहीं.

शिव पुराण के अनुसार, महादेव ने ये लीला इसलिए रची थी, ताकि गंगा का अहंकार चूर किया जा सके. साथ ही धरती को प्रलय से बचाया जा सके. इसके बाद भागीरथ के फिर से प्रार्थना करने पर, शिव जी ने अपनी जटाओं की एक लट खोली और गंगा की एक पतली धारा धरती पर गिरी, जिसे हम ‘भागीरथी’ कहते हैं.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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