
IT सेक्टर में AI का डर
जो निवेशक अब तक टेक्नोलॉजी शेयरों को अपने पोर्टफोलियो का सबसे सुरक्षित और मजबूत हिस्सा मान रहे थे, उन्हें 12 फरवरी को भारी निराशा हाथ लगी. बाजार खुलते ही आईटी शेयरों में जो गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ, उसने शाम होते-होते कोहराम का रूप ले लिया. स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि महज एक ही दिन में निवेशकों की गाढ़ी कमाई के करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये धुएं की तरह उड़ गए. निफ्टी आईटी इंडेक्स में 4 फीसदी से ज्यादा की यह गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह उस डर की आहट है जो अब भारतीय आईटी कंपनियों के भविष्य पर मंडरा रहा है.
अमेरिका से आई आंधी में उड़ जाएगा भारतीय आईटी सेक्टर?
बाजार में टीसीएस (TCS), इंफोसिस (Infosys), विप्रो (Wipro), एचसीएल टेक (HCL Tech) और टेक महिंद्रा (Tech Mahindra) जैसी कंपनियों को अर्थव्यवस्था का स्तंभ माना जाता है, लेकिन गुरुवार को ये दिग्गज ताश के पत्तों की तरह बिखरते नजर आए. इन शेयरों में 4 से 5 फीसदी तक की बड़ी टूट दर्ज की गई. आखिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक पूरी दुनिया में डंका बजाने वाला भारतीय आईटी सेक्टर ‘विलेन’ बन गया? इसके पीछे की सबसे बड़ी वजह सात समंदर पार अमेरिका से उठी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की एक नई लहर है. इस पूरी उथल-पुथल के केंद्र में अमेरिका की एक एआई स्टार्टअप कंपनी एंथ्रोपिक (Anthropic) है, जिसने भारतीय आईटी कंपनियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं.
बाजार के जानकारों के मुताबिक, एंथ्रोपिक ने हाल ही में कानूनी कामकाज को आसान बनाने के लिए एक नया एआई टूल लॉन्च किया है. सुनने में यह एक सामान्य तकनीकी खबर लग सकती है, लेकिन असल में यह भारतीय आईटी कंपनियों के लिए खतरे की घंटी है. यह नया टूल कॉन्ट्रैक्ट रिव्यू (Contract Review) और लीगल ब्रीफिंग जैसे जटिल कार्यों को चुटकियों में और वह भी बिना किसी मानवीय गलती के करने में सक्षम है. चिंता का विषय यह है कि भारतीय आईटी कंपनियों के राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा इन्हीं कार्यों यानी बीपीओ (BPO) और केपीओ (KPO) सेवाओं से आता है. यदि एआई ने ये काम इतनी कुशलता से और सस्ते में संभाल लिए, तो विदेशी क्लाइंट्स भारतीय कंपनियों को काम क्यों देंगे?
खत्म हो रहा है मास हायरिंग का दौर?
यह समस्या सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर नौकरियों पर पड़ रहा है. एआई अब केवल सवालों के जवाब देने तक सीमित नहीं रह गया है. नए ‘एजेंटिक एआई’ (Agentic AI) टूल्स अब कंप्यूटर पर वो सारे काम खुद कर सकते हैं जो अब तक सॉफ्टवेयर इंजीनियर करते थे. कोडिंग करना, बग्स यानी गलतियां ठीक करना और जटिल सॉफ्टवेयर को मैनेज करना अब एआई के बाएं हाथ का खेल होता जा रहा है.
रिपोर्ट्स बताती हैं कि पिछले कुछ तिमाहियों में देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टीसीएस के कर्मचारियों की संख्या में लगभग 30,000 की गिरावट आई है. यह इतिहास में पहली बार हो रहा है कि लगातार तिमाहियों में कर्मचारियों की संख्या कम हो रही है. नई भर्तियां यानी फ्रेशर्स की हायरिंग भी बेहद धीमी पड़ गई है. वह दौर अब खत्म होता दिख रहा है जब आईटी कंपनियां हजारों की तादाद में कैंपस प्लेसमेंट करती थीं. एक्सपर्ट्स इस स्थिति को ‘SaaSpocalypse’ का नाम दे रहे हैं, जिसका मतलब है सॉफ्टवेयर और सर्विस कंपनियों के लिए कयामत का समय. जो काम पहले 10 इंजीनियर मिलकर करते थे, अब वह काम एआई की मदद से शायद 2 लोग कर लेंगे. इसलिए अब ‘मास हायरिंग’ की जगह ‘स्पेशलाइज्ड स्किल्स’ (विशेष हुनर) की मांग बढ़ने वाली है.
अस्तित्व बचाने की कठिन लड़ाई
कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट इस संकट को और गहराई से समझाती है. उनके अनुसार, पुरानी तकनीक (Legacy Systems) पर चल रही भारतीय कंपनियों के लिए एआई को अपनाना इतना आसान नहीं है. यह सिर्फ कंप्यूटर में कोई नया सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने जैसा नहीं है. पुराने सिस्टम में नई एआई तकनीक को फिट करना, उसे संदर्भ समझाना और सही परिणाम प्राप्त करना एक बेहद जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है.
बाजार को अब यह चिंता सता रही है कि एंथ्रोपिक के ‘Claude Cowork’ जैसे एआई आधारित नए टूल और प्लग-इन पुराने दिग्गजों के लिए कड़ी चुनौती पेश करेंगे. ये टूल वो काम खुद कर सकते हैं जिनके लिए आईटी कंपनियां अब तक भारी-भरकम फीस वसूलती थीं.






