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Kashi Vishwanath Temple: किसने कराया था काशी में बाबा विश्वनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण? जानें कहानी

Kashi Vishwanath Temple: किसने कराया था काशी में बाबा विश्वनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण? जानें कहानी
Kashi Vishwanath Temple: किसने कराया था काशी में बाबा विश्वनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण? जानें कहानी

काशी विश्वनाथ मंदिर

Kashi Vishwanath Temple History: वाराणसी को काशी के नाम से जाना जाता है. काशी भगवान शिव की नगरी मानी जाती है. मान्यता है कि काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है. यहां देवों के देव महादेव बाबा विश्वनाथ के रूप में विराजमान हैं. ये भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. कहते हैं कि यहां मृतक आत्माओं को स्वयं भगवान शिव मोक्ष प्रदान करते हैं.

काशी विश्वनाथ मंदिर देश और दुनिया में प्रसिद्ध है. यहां बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं. बाबा विश्वनाथ का मंदिर सदियों पुराना बताया जाता है. इस मंदिर को 18 अप्रैल 1669 को क्रूर मुगल शासक औरंगजेब ने ध्वस्त करवा दिया था. इसके बाद एक बार फिर इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था. आइए जानते हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की पूरी कहानी.

औरंगजेब के फरमान के बाद मंदिर किया गया ध्वस्त

इतिहासकार बताते हैं कि औरंगजेब के फरमान के बाद 1669 में मुगल सेना ने बाबा विश्वनाथ का मंदिर ध्वस्त कर दिया था. मंदिर के महंत शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में कूद गए थे, ताकि स्वयंभू ज्योतिर्लिंग को कोई क्षति न पहुंचे. मुगल सेना ने मंदिर के बाहर स्थापित विशाल नंदी की प्रतिमा को तोड़ने की भी कोशिश की थी, लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वे नंदी की प्रतिमा को नहीं तोड़ने में असफल रहे थे.

रानी अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया पुनर्निमाण

साल 1777 में इंदौर के होल्कर राजघराने की रानी अहिल्या बाई होल्कर ने बाबा विश्वनाथ के मंदिर का पुनर्निर्माण कराने की ठानी. उन्होंने अगले तीन साल में मंदिर पुनर्निर्माण करवाया. साल 1777-80 के बीच रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर निर्माण की कोशिशें दोबारा शुरू किया और वो इसमें सफल भी हुईं.

शास्त्रसम्मत तरह से हुई मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा

रानी अहिल्याबाई ने बाबा विश्वनाथ के मंदिर के गर्भगृह का निर्माण फिर से करवाया और शास्त्रसम्मत तरीके से मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा भी करवाई. 11 शास्त्रीय आचार्यों द्वारा प्राण-प्रतिष्ठा के लिए पूजा की गई. रानी अहिल्याबाई ने शिवरात्रि के दिन मंदिर के पुनर्निमाण का संकल्प लिया था और शिवरात्रि पर ही मंदिर खोला गया.

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