
शिव के माथे पर चंद्रमा
Moon On Shiv Head: देव के महादेव सनातन धर्म में प्रमुख देवता है. उनको कालों का काल महाकाल कहा जाता है. महाशिवरात्रि महादेव को समर्पित सबसे बड़ा पर्व है. ये पर्व हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन मनाया जाता है. इस साल ये पर्व 15 फरवरी को मनाया जाएगा. भक्त इस दिन शिव पूजन और व्रत करते हैं. शिव जी के कई प्रतीक हैं. जिसमें त्रिशूल, नाग और चंद्रमा मुख्य है.
महादेव के माथे पर विराजमान चंद्रमा उनके दिव्य रूप की शोभा कई गुना बढ़ा देता है. ज्यादातर लोग जानते हैं कि समुद्र मंथन से निकले विष का पान के बाद शरीर में बढ़ी गर्मी को शांत करने के लिए शिव जी ने चंद्रमा को माथे पर विराजामान किया, ताकि उनको शितलता मिल सके. ये सही है, लेकिन शिव के द्वारा माथे पर चंद्रमा को विराजमान करने का और कारण प्रजापति दक्ष की ओर से चंद्र देव दिया गया श्राप भी बताया जाता है. आइए जानते हैं कि प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को क्या और क्यों श्राप दिया था?
पौराणिक कथाओं के अनुसार…
पौराणिक कथाओं के अनुसार, चंद्रमा का विवाह प्रजापति दक्ष की 27 पुत्रियों से हुआ था. इनको ही ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्रों के नाम से जाना जाता है. चंद्रमा को अपनी पत्नी रोहिणी से अधिक प्रेम था, जिससे उनकी बाकी पत्नियां ईर्ष्या महसूस करती थीं. अपनी बेटियों को दुखी देखकर प्रजापति दक्ष को अत्यंत क्रोध आ गया और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दे दिया.
प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को दिया था ये श्राप
उन्होंने चंद्रमा से कहा कि उनका प्रकाश धीरे-धीरे कम हो जाएगा और वे पूरी तरह समाप्त हो जाएंगे. प्रजापति दक्ष के श्राप से भयभीत होकर चंद्र देव भगवान शिव के शरण में पहुंचे. शिव जी चंद्रमा की कठिन भक्ति से प्रसन्न हुए और जीवन दे दिया. उनके मान-सम्मान की रक्षा के लिए उन्हें अपने मस्तक पर जगह दी. यही वजह है कि चंद्रमा 15 दिन घटते और 15 दिन बढ़ते हैं.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.






