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गीता उपदेश: कठिन समय में प्रेरणा देते हैं भगवान श्रीकृष्ण के ये 10 विचार

हर किसी के जीवन में कभी न कभी ऐसा दौर आता है जब सब कुछ बिखरा हुआ सा लगता है। मन बहुत भारी हो जाता है। हमारी उम्मीदें कमजोर पड़ने लगती हैं। हर दिशा में सिर्फ अंधेरा नजर आता है। ऐसे समय में न तो कोई बात दिल को सुकून देती है और न ही आसानी से कोई रास्ता समझ में आता है।

गीता उपदेश: कठिन समय में प्रेरणा देते हैं भगवान श्रीकृष्ण के ये 10 विचार
गीता उपदेश: कठिन समय में प्रेरणा देते हैं भगवान श्रीकृष्ण के ये 10 विचार

अगर आप भी इस तरह के कठिन दौर से गुजर रहे हैं या आपके आसपास कोई ऐसा है जो मानसिक रूप से संघर्ष कर रहा है, तो खुद को संभालने के लिए सही विचारों का सहारा लेना बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसी स्थिति में भगवद् गीता के उपदेश मन को स्थिर करने और सही दिशा दिखाने में मदद करते हैं। यहां हम आपके लिए गीता के 10 ऐसे प्रेरणादायक विचार साझा कर रहे हैं, जो कठिन समय में धैर्य बनाए रखने और आगे बढ़ने की ताकत दे सकते हैं।

    1- “मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।” (अध्याय 2, श्लोक 14)

    इन्द्रियों के विषयों से ही सुख-दुःख उत्पन्न होते हैं, ये स्थायी नहीं हैं। इन्हें सहन करना चाहिए।

    2- “दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।” (अध्याय 2, श्लोक 56)

    जो व्यक्ति दुख में विचलित नहीं होता और सुख में आसक्त नहीं होता, वही स्थिर बुद्धि वाला होता है।

    3- “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (अध्याय 2, श्लोक 47)

    मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल पर नहीं है।

    4- “योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनंजय।” (अध्याय 2, श्लोक 48)

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    आसक्ति छोड़कर समभाव में स्थित होकर कर्म करना चाहिए।

    5- “यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।” (अध्याय 4, श्लोक 22)

    जो बिना इच्छा के प्राप्त में संतुष्ट रहता है और द्वंद्व से परे है, वही शांत रहता है।

    6- “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।” (अध्याय 6, श्लोक 5)

    मनुष्य को स्वयं ही अपना उत्थान करना चाहिए, स्वयं को गिराना नहीं चाहिए।

    7- “असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।” (अध्याय 6, श्लोक 36)

    असंयमित मन वाले के लिए सफलता पाना कठिन है।

    8- “न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।” (अध्याय 3, श्लोक 5)

    कोई भी व्यक्ति क्षण भर भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता है।

    9- “श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।” (अध्याय 4, श्लोक 39)

    श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करता है।

    10- “आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।” (अध्याय 6, श्लोक 5)

    मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।

    डिसक्लेमर- इस लेख को विभिन्न माध्यमों जैसे ज्योतिषियों, पंचांग, मान्यताओं या फिर धर्मग्रंथों से संग्रहित कर ये जानकारियां आप तक पहुंचाई गई हैं। हमारा उद्देश्य महज सूचना पहुंचाना है। इसके सही और सिद्ध होने की प्रामाणिकता नहीं दे सकते हैं। इसके किसी भी तरह के उपयोग करने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें

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