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‘मासूम’ की मधुर यादें, शेखर कपूर-गुलज़ार की फिल्म आज की पीढ़ी को क्या सिखाती है?

‘मासूम’ की मधुर यादें, शेखर कपूर-गुलज़ार की फिल्म आज की पीढ़ी को क्या सिखाती है?
'मासूम' की मधुर यादें, शेखर कपूर-गुलज़ार की फिल्म आज की पीढ़ी को क्या सिखाती है?

कल्ट मूवी ‘मासूम’ के कलाकार

विख्यात भारतीय फिल्ममेकर शेखर कपूर ने पिछले दिनों एक्स पर साल 1983 की अपनी कल्ट मूवी मासूम का नया वर्जन नई पीढ़ी के लिए बनाने की इच्छा जाहिर करके नॉस्टेल्जिया को कुरेद दिया. फिल्म ने चार फिल्मफेयर अवॉर्ड जीतकर वाहवाहियां बटोरी थीं. शेखर कपूर की बातों से मन-मस्तिष्क मासूम-सी यादों में गोते लगाने लगा. तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं… नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी की मोहब्बत और नोक-झोंक भरी केमेस्ट्री, जुगल हंसराज और उर्मिला मातोंडकर की बाल सुलभ हरकतें, उनका गाना- लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा… वहीं दिल्ली से नैनीताल तक का मौसम और आबोहवा… सब के सब यादों की ताजा हवा के झोंके की तरह था.

‘मासूम’ फिल्म का नाम ही नहीं, अपने मिजाज से एक मासूम सा सवाल भी है. अमिताभ बच्चन के आक्रोश के दौर में कोमल अहसासों का सवाल. दांपत्य जीवन की पारदर्शिता और बच्चों की परवरिश भी मासूम होती है. जरा सा झटका उसे शीशे की तरह छिन्न-भिन्न कर सकता है. यकीनन जिंदगी में कुछ सवाल ऐसे होते हैं, जो हालात और ख्वाहिशों के हवाले होते हैं, इन्हें किसी शास्त्रों में ढाला नहीं जा सकता. ख्वाहिशों के पंख दिखाई नहीं देते, उन्हें कतरे नहीं जा सकते.

शेखर कपूर का निर्देशन और गुलजार का लेखन

फिल्म की कहानी और प्रस्तुतिकरण पर शेखर कपूर का डायरेक्शन और गुलजार की कलम की जुगलबंदी की छाप आज तक बरकरार है. वह अमिट है. शेखर कपूर अब उन्हीं अमिट यादों को फिर से जीना चाहते हैं या कि नई पीढ़ी से उन यादों को शेयर करना चाहते हैं ताकि मासूम की पॉजीटिव बातें आज के जज्बात से जुड़ सकें. आज की पीढ़ी को पता हो कि मासूमियत केवल उम्र की अवस्था नहीं होती, रिश्तों की संवेदनाएं और उन संवेदनाओं की समझ भी उतनी ही मासूम होती है, चाहे शख्स किसी भी उम्र का हो.

मासूम तब रिलीज हुई थी, जब अस्सी का दशक एंग्री यंग मैन और डिस्को डांसर के कारनामों की चकाचौंध भरा था. रिलीज के शुरुआती कुछ दिनों तक इसका असर नहीं दिखा. पहले हफ्ते के तीन-चार दिन सिनेमा हॉल की सीटें खाली थीं. शेखर कपूर समेत फिल्म के अन्य कलाकार उम्मीदें छोड़ चुके थे. इसे फ्लॉप होने से कोई बचा नहीं सकता. निराशा गहराने लगी थी. लेकिन बॉक्स ऑफिस पर मासूम के साथ भी वही करिश्मा हुआ जो कभी शोले के साथ हुआ था. अपनी पोस्ट में शेखर कपूर ने भी फिल्म देखने के लिए टिकट खिड़की पर उमड़ी भीड़ और थिएटर के अंदर खचाखच भरे दर्शकों की रोमांचक यादें शेयर कीं. कुल मिलाकर कहें तो देखते ही देखते मासूम का जादू चल गया. फिल्म सुपरहिट हो गई और यादों में बस गई.

Masoom The Next Generation

एक्शन ड्रामा के दौर में मासूम के आंसू

गौरतलब है कि मासूम जब रिलीज हुई तो अस्तित्व की जंग दोहरे स्तर पर देखने को मिली. फिल्म की कहानी में आठ साल के राहुल (जुगल हंसराज) की जंग अलग थी, वह अपनी पहचान जानने के लिए जूझ रहा था. तो बॉक्स ऑफिस पर लार्जर दैन लाइफ कैरेक्टर्स से लैस बिग बजट, सुपरस्टार्स के फुल एक्शन ड्रामा के दौर का दबाव अलग था. मासूम में कोई एक्शन नहीं था. ना किसी को मिटाने की नफरत थी और न किसी से बदला लेने का गुस्सा था. लिहाजा तब की नई पीढ़ी के लिए इस फिल्म में कोई आकर्षण नहीं था. लेकिन पूरी फिल्म प्रेम, मुस्कान, ठहाके, आंसू, करुणा, दांपत्य और वात्सल्य के भाव से भरी थी. कोई हैरत नहीं, इस भावुक कहानी को देखने के लिए पूरा परिवार थिएटर की ओर उमड़ा.

वर्तमान के हालात भी कमोबेश वैसे ही हैं. आज बॉक्स ऑफिस पर एक बार फिर बिग बजट, बिग स्टार्स के फुल एक्शन ड्रामा का बोलबाला है. दर्शक उन्हीं फिल्मों को देखने जा रहे हैं जिसकी कहानी, किरदार, एक्शन, लोकेशन, वीएफएक्स, गीत-संगीत, ग्लैमर आदि में नयापन हो. उस लिहाज से आज अस्सी के दशक से चुनौती कहीं ज्यादा बढ़ गई है. दर्शकों की कठिनाई भरे समय में शेखर कपूर का मासूम 2 बनाना नई चुनौती मोल लेने के बराबर होगा. एक कल्ट मूवी की सुनहरी यादों के बरअक्स मेरा भी एक मासूम सा सवाल है कि वैसी कहानी को देखने के लिए आज कितने दर्शक उमड़ सकेंगे, जिसमें जंग के बदले जज्बात को ज्यादा तरजीह दी गई हो. शेखर कपूर आज की पीढ़ी के मिजाज के मुताबिक कौन-सी कहानी लेकर आना चाहेंगे- जो इन चुनौतियों के बीच भी अपने पुराने जादू को दोहरा सके.

क्या है मासूम फिल्म की कहानी?

अब आपको बताते हैं- मासूम फिल्म आखिरकार क्यों क्लासिक बन गई, क्या है उसकी कहानी, जिसकी यादें आज भी दिल के कोने में जज्ब हैं. कहानी दिल्ली के एक खुशहाल मध्यवर्गीय परिवार की है. नसीरुद्दीन शाह डीके मलहोत्रा के रोल में हैं. नौकरीशुदा हैं. उनकी दो प्यारी-सी बेटियां हैं- पिंकी और मिन्नी, जिसे तब की बाल कलाकार उर्मिला मातोंडकर और आराधना श्रीवास्तव ने निभाया था. दोनों बच्चों की चुलबुली अदाएं फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी साबित हुईं.

डीके मलहोत्रा की पत्नी हैं- इंदु मलहोत्रा यानी शबाना आजमी, जो जितनी हंसमुख हैं, उतनी ही असुरक्षित और सशंकित भी; फिर भी अपनी दोनों बच्चियों और पति के प्रति पूरी तरह से समर्पित स्त्री. इंदु महानगर की आधुनिक जीवन शैली को जानती हैं, महानगर में बिना पति के अपने काम में मगन रहने वाली चंदा (तनुजा) की दोस्त है, इसके बावजूद उस पर कोई बाहरी प्रभाव नहीं. वह अपने पति और परिवार से अटूट प्रेम करती है.

इंदु के जीवन में सबसे कठिन घड़ी तब आती है जब उसे पता चलता है कि उसका पति नैनीताल में भावना (सुप्रिया पाठक) नाम की एक युवती के साथ प्रेम में थे. जिसका अब आठ साल का एक बेटा राहुल है. राहुल का किरदार तब के बाल कलाकार जुगल हंसराज ने निभाया था. भावना के अचानक देहांत के बाद राहुल अकेला हो गया. भावना ने यह राज खुद डीके से भी छुपा कर रखा था. लेकिन जब राज खुलता है तो सबसे पहले डीके चकित रह जाते हैं फिर उसकी पत्नी इंदु. मजबूरन राहुल को उसे अपने घर में पनाह देनी पड़ती है.

दोनों बच्चियां तो आसानी से राहुल के साथ घुलमिल जाती हैं, डीके भी उसे बेटे की तरह प्यार देने लगता है लेकिन इंदु आसानी से उसे स्वीकार नहीं कर पाती. फिल्म की कहानी इसी तनाव के साथ आगे बढ़ती है. हालांकि राहुल अपने स्वभाव से इतना हंसमुख और सहानुभूति के भाव बटोरने वाला साबित होता है कि आखिरकार इंदु भी उसे बेटे की तरह अपना लेती है.

लुभावनी सिनेमैटोग्राफी, मधुर गीत-संगीत

मासूम पर्दे पर यकीनन नसीरुद्दीन शाह, शबाना आजमी, तनुजा, सईद जाफरी, सुप्रिया पाठक, उर्मिला मातोंडकर, जुगल हंसराज और आराधना श्रीवास्तव की अदाकारी की बेमिसाल पेशकश है. लेकिन गुलजार की कलम से निकली कहानी, संवाद और गीतों ने इस फिल्म को कामयाब और क्लासिक बनाने में उतना ही अहम योगदान दिया है. जुगल हंसराज के राहुल वाले किरदार में लावारिस वाला जोश और आक्रोश नहीं था, वह मासूम था और उसकी मासूमियत में इंसानियत को झकझोरने वाले हजारों सवाल थे. वे सवाल यकीनन किसी को भी परेशान कर देने वाले थे. मुश्किलों में डाल देने वाले थे.

इस द्वंद्व के रचयिता गुलजार थे. जिन्होंने इस फिल्म को हुजूर इस कदर भी ना इतरा के चलिए… दो नैना और एक कहानी, थोड़ा बादल, थोड़ा सा पानी… तुझसे नाराज नहीं जिंदगी हैरान हूं मैं… या हर बच्चे की जुबान पर शुमार रहने वाला सबसे नटखट गीत लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा… दौड़ा दौड़ा घोड़ा दुम उठा के दौड़ा की लोकप्रियता ने फिल्म को अपार प्रसिद्धि दिलाई. गुलजार के इन गीतों पर आर. डी. बर्मन का संगीत जितना यादगार है, प्रवीण भट्ट की सिनेमैटोग्राफी रुपहले पर्दे पर मार्मिकता को व्याख्यायित करने में उतना ही बारीक प्रभाव पैदा करने वाली साबित हुई.

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